पोडू भूमि: सीएम केसीआर ने आदिवासियों के बीच जगाई बेहतर दिनों की उम्मीद
पोडू भूमि मुद्दे को हल करने के सरकार के फैसले से आदिवासी किसान उत्साहित हैं। उन्होंने अपने लंबे समय से लंबित सपने के जल्द साकार होने पर खुशी जाहिर की।

तेलंगाना में आदिलाबाद जिले के आदिवासियों के बीच मुख्यमंत्री केसीआर की एक घोषणा ने बेहतर दिनों की उम्मीद फिर से जगा दी है। दरअसल सीएम केसीआर ने ऐलान किया है कि दलित बंधु की तर्ज पर गिरिजन बंधु के तहत वित्तीय सहायता के अलावा, फरवरी के अंत तक पात्र आदिवासियों को पोडू भूमि के पट्टे वितरित किए जाएंगे।
अधिकारियों द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक, समग्र आदिलाबाद जिले में 2.27 लाख एकड़ वन भूमि पर अधिकार के लिए 66,004 आवेदन भेजे गए हैं। इनमें से 33,885 आदिवासी किसान हैं और 32,119 गैर-आदिवासी किसान हैं। ये सभी आदिलाबाद, कुमराम भीम आसिफाबाद, निर्मल और मनचेरियल जिलों में 248 ग्राम पंचायतों के तहत 711 बस्तियों से संबंधित हैं।
यहां चार जिलों में 2,27,129 एकड़ वन भूमि की जुताई की जा रही है। इसमें आदिवासी किसान 1,24,522 एकड़ वन भूमि में फसल उगा रहे हैं, वहीं गैर आदिवासी वन विभाग की 1,02,507 एकड़ जमीन पर खेती कर रहे हैं। पोडू भूमि मुद्दे को हल करने के सरकार के फैसले से आदिवासी किसान उत्साहित हैं। उन्होंने अपने लंबे समय से लंबित सपने के जल्द साकार होने पर खुशी जाहिर की।
आदिलाबाद जिले के सिरिकोंडा मंडल के एक आदिवासी किसान के. भीमराव पटेल ने कहा कि एक के बाद एक सरकारों ने इस मुद्दे को हल करने का वादा किया, लेकिन सत्ता में आने के बाद इसे नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासी दो दशकों से अधिक समय से वन भूमि में फसलों की खेती के लिए स्वामित्व के दस्तावेज जारी करने की मांग कर रहे थे। भीमराव पटेल ने कहा कि वह कई दशकों से 2 एकड़ जमीन जोत रहे थे, लेकिन अधिकारों से वंचित थे।
वन अधिकार की मान्यता (2006) के आगमन के बाद से अब तक 37,334 आदिवासी किसानों को पासबुक प्रदान की जा चुकी है। लाभार्थियों को कुल 1,36,117 एकड़ वन भूमि आवंटित की गई। लेकिन, हजारों आदिवासी, जो पोडू खेती के रूप में स्थानांतरित खेती के हिस्से के रूप में वन भूमि को जोतते हैं, 2005 से दस्तावेजों के लिए इंतजार कर रहे हैं।
भूमिहीन आदिवासी दैनिक वेतन भोगी बनने और आजीविका की तलाश में शहरी भागों में पलायन करने के लिए मजबूर हैं। अगर उन्हें जमीन का टुकड़ा मिल जाए तो वे खुशहाल जीवन जी सकेंगे। वे अब प्रत्येक सोमवार को कलेक्टर एवं एकीकृत आदिवासी विकास अधिकारी (आईटीडीए) उटनूर के कार्यालय में दस्तावेज मंगाने नहीं जाएंगे।












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