तेलंगाना में कांग्रेस ने बदले तेवर, बीआरएस के लिए बनी सबसे बड़ी चुनौती
तेलंगाना में अपने कैडर के टूटे हुए मनोबल के साथ, कांग्रेस पार्टी कुछ महीनों पहले तक तीसरे नंबर पर पिछड़ती हुई नजर आ रही थी, लेकिन अब माहौल बदल चुका है। हालिया रुझान देखें तो भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के सामने कांग्रेस मुख्य चुनौती के तौर पर उभरकर सामने आई है।

पड़ोसी राज्य कर्नाटक में कांग्रेस को मिली धमाकेदार जीत और उसके बाद बदले सियासी घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि तेलंगाना में अगर कोई पार्टी बीआरएस का विकल्प बन सकती है, तो कांग्रेस उस दौड़ में सबसे आगे नजर आ रही है।
कांग्रेस जोर-शोर से तेलंगाना राज्य के गठन का श्रेय खुद को देती रही है, लेकिन इसके बावजूद वो दो बार सत्ता हासिल करने में नाकाम रही। हालांकि इस बार कांग्रेस नए जोश में है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कर्नाटक की जीत ने तेलंगाना में कांग्रेस को एक बूस्ट दिया है। पार्टी के मौजूदा मनोबल को देखें तो लगता है कि कांग्रेस 2018 के चुनावों के तुरंत बाद एक दर्जन विधायकों के दलबदल, सभी विधानसभा उप-चुनावों में खराब प्रदर्शन और अंदरूनी कलह जैसी समस्याओं से एक झटके में उबर गई है।
कर्नाटक में कांग्रेस की जीत ऐसे समय में हुई है, जब तेलंगाना में भाजपा खुद को सीएम केसीआर का विकल्प बता रही थी और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा हुआ था। सत्ताधारी बीआरएस के कुछ नेताओं को अपने पाले में लाने में कांग्रेस की सफलता और खम्मम में 2 जुलाई को राहुल गांधी की रैली को मिली जनता की भारी प्रतिक्रिया, इस बात के संकेत दे रही हैं कि कांग्रेस इस बार के विधानसभा चुनाव में बीआरएस को जोरदार टक्कर देगी।
अब, जब विधानसभा चुनाव में केवल 4-5 महीने बचे हैं, कांग्रेस अचानक सत्ता की दौड़ में प्रमुख चुनौती बनकर उभरी है, और उसने भाजपा को तीसरे स्थान पर धकेल दिया है। तेलंगाना में जीत की अहमियत को समझते हुए केंद्रीय नेतृत्व भी राज्य पर फोकस कर रहा है। राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य शीर्ष नेताओं ने रणनीति पर चर्चा के लिए हाल ही में एक महत्वपूर्ण बैठक भी की।












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