Odisha: स्वामी लक्ष्मणानंद हत्याकांड की जांच को लेकर सवाल, भाजपा, कांग्रेस ने ओडिशा सरकार को घेरा
विहिप नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के 15 साल बीत जाने के बावजूद, अभी तक हिंदू संत की हत्या की न्यायिक आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की। 15वीं बरसी पर बीजेपी और कांग्रेस ने फिर से सवाल उठाए हैं।
भाजपा और कांग्रेस ने हिंदू संत स्वामी लक्ष्मणानंद हत्याकांड की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं करने के लिए बीजद सरकार की आलोचना की। विपक्षी दलों ने उस वक्त उठाया जब जलेशपेटा आश्रम के निवासियों ने जन्माष्टमी के उत्सव के साथ उनकी 15वीं बरसी मनाई।
ओडिशा के विहिप नेता एस सत्पथी ने कहा, हालांकि आयोग ने 2015 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, लेकिन राज्य सरकार ने अभी तक जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों को सार्वजनिक नहीं किया है। वहीं बीजेडी सरकार पर निशाना साधते हुए, राज्य भाजपा उपाध्यक्ष बीएन त्रिपाठी ने कहा कि लोगों को आयोग द्वारा की गई जांच के निष्कर्षों को जानने का हक है। ऐसे में सरकार को इससे सार्वजनिक करना चाहिए।

यह कहते हुए कि सरस्वती ने अपना जीवन आदिवासियों के विकास के लिए समर्पित कर दिया, भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष समीर मोहंती ने दावा किया कि दोषियों को सजा नहीं दी गई है। विधानसभा में आयोग की रिपोर्ट पेश नहीं करने के लिए राज्य सरकार पर हमला करते हुए मोहंती ने कहा, "घटना को 15 साल बीत जाने के बावजूद यह आश्चर्य की बात है कि राज्य सरकार ने स्वामीजी की हत्या के संबंध में कोई तत्परता नहीं जताई है।"
वरिष्ठ कांग्रेस नेता और विधायक तारा प्रसाद बाहिनीपति ने कहा कि जब विहिप नेता की हत्या हुई तब बीजद और भाजपा गठबंधन सरकार चला रहे थे। उन्होंने कहा, जब जांच आयोग का गठन किया गया तो भाजपा शुरू में बहुत खुश थी, लेकिन बाद में बीजद ने पार्टी को छोड़ दिया।
कांग्रेस विधायक ने आश्चर्य जताया कि राज्य सरकार रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की कोशिश क्यों कर रही है क्योंकि लोगों को न्यायिक पैनल द्वारा की गई जांच के निष्कर्षों को जानने का पूरा अधिकार है। मामले में कुल सात लोगों को गिरफ्तार किया गया था जबकि आरोप था कि वीएचपी नेता की हत्या में माओवादी शामिल थे।
दरअसल, 23 अगस्त, 2008 को जन्माष्टमी उत्सव मनाते समय आश्रम में सरस्वती और उनके चार सहयोगियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इससे जिले में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई, जिसमें 40 लोग मारे गए। ओडिशा सरकार ने न्यायमूर्ति शरत महापात्र की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया था। लेकिन न्यायमूर्ति महापात्र का जांच पूरी होने से पहले निधन हो गया। जिसके बाद हिंदू संत की हत्या की जांच के लिए गठित आयोग का नेतृत्व न्यायमूर्ति ए एस नायडू को सौंपा गया था।












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