तीन दशक बाद कांग्रेस लड़ रही है यूपी की सभी सीटों पर चुनाव, कार्यकर्ताओं में दिख रहा है जोश

यूं तो यूपी की सभी पार्टियां बड़े-बड़े दावों के साथ मैदान में हैं लेकिन 2022 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस में आ रहे बड़े बदलावों की कहानी लेकर आया है।

नई दिल्ली, 1 फरवरी 2022: यूं तो यूपी की सभी पार्टियां बड़े-बड़े दावों के साथ मैदान में हैं लेकिन 2022 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस में आ रहे बड़े बदलावों की कहानी लेकर आया है। इस कहानी में जीत-हार से ज़्यादा एक सपने की उड़ान का बयान है जो भविष्य में यूपी की तस्वीर बदल सकता है।

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सबसे बड़ी बात तो ये है कि कांग्रेस लगभग तीन दशकों बाद उत्तर प्रदेश की हर विधानसभा क्षेत्र मे मैदान में हैं। बीते कई चुनाव में गठबंधनों की वजह से सूबे के बड़े हिस्से में कांग्रेस का तिरंगा झंडा नज़र ही नहीं आता था। ये सिलसिला इस क़दर हावी हो गया था कि राजनीतिक जीवन में बड़ी भूमिका के लिए बेक़रार कार्यकर्ताओं की बड़ी तादाद दूसरे दलों की ओर कूच कर गयी थी। लेकिन इस बार माहौल बदला है। यूपी की हर विधानसभा में कांग्रेस का झंडा और प्रत्याशी उतारने का फैसला कार्यकर्ताओं के बीच जोश भर रहा है। पार्टी अपनी पुरानी हैसियत पाने के लिए बेक़रार नज़र आ रही है।

इसी के साथ एक बदली हुई कांग्रेस नज़र आ रही है। पार्टी ने 40 फ़ीसदी से ज़्यादा टिकट 40 साल से कम उम्र वालों को दिया है जिसने कांग्रेस में एक जवान जोश भरा है। यही नहीं, इनमें पिछड़े और दलित युवाओं की बड़ी तादाद है जो कांग्रेस के सामाजिक आधार में नया रंग भर रहा है। राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी के प्रभारी बनने के बाद जिस तरह से संगठन को नये सिरे से बनाने पर ज़ोर दिया गया, उसमें सामाजिक भागीदारी पर काफी जोर रहा। नतीजा ये है कि दलित-पिछड़े और वंचित समुदायों के बीच कांग्रेस के तमाम युवा नये नेता नज़र आने लगे हैं।

इसी के साथ 40 फ़ीसदी टिकट महिलाओं को देने के फ़ैसले ने भी राजनीतिक पंडितों को चौंकाया है। जीतने की क्षमता को लेकर तमाम सवाल उठे लेकिन मीडिया में दिये गये तमाम इंटरव्यू में प्रियंका गांधी ने जिस तरह इस फ़ैसले का बचाव किया उससे साफ़ है कि कांग्रेस इस प्रयोग को लेक काफी गंभीर है और इसे काफी आगे तक ले जाना चाहती है। जाति और धर्म के ध्रुवीकरण में फंसी यूपी की राजनीति में कांग्रेस को हमेशा बग़ैर किसी सामाजिक आधार वाली पार्टी के चिन्हित किया जाता रहा है, ऐसे में अगर महिलाओं तक कांग्रेस अपनी बात पहुंचाने में सफल रही तो उसे एक ऐसा सामाजिक आधार मिल सकता है जिसकी ओर अब तक किसी का ध्यान नहीं है। पिछले दिनों जिस तरह कई शहरों में आयोजित 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' मैराथन को लड़कियों का समर्थन मिला, उससे संकेत मिलता है कि अगर महिलाओं का मुद्दा राजनीति के केंद्र में आया तो महिलाएं जाति, धर्म और वर्ग की सीमाओं को तोड़कर कांग्रेस का नया सामाजिक आधार बन सकती हैं।

प्रियंका गांधी का दिया 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' नारा यूपी में काफ़ी लोकप्रियता हासिल कर रहा है। कोरोना की वजह से लगी पाबंदियों ने ज़मीनी अभियान पर चाहे रोक लगा दी हो, सोशल मीडिया में ये कैंपेने काफी जोरों से चल रहा है। कांग्रेस ने ये भी वादा किया है कि सरकार बनने पर 20 लाख सरकारी नौकरियां देगी जिसमें से आठ लाख महिलाओं को मिलेंगी। लड़कियों को स्कूटी से लेकर स्मार्टफोन देने तक की योजनाओं की काफी चर्चा है। जिन्हें इस बात का भरोसा नहीं है कि कांग्रेस की सरकार बनेगी वह भी मान रहे हैं कि प्रियंका गांधी राजनीति में महिलाओं की दखल बढ़ाने के लिए काफी गंभीर हैं और यह मसला विधानसभा चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा। प्रियंका गांधी ने जिस तरह चुनाव बाद भी यूपी की ज़िम्मेदारी संभाले रहने की बात कही है, उससे इस चीज़ को बल मिला है।

दरअसल, प्रियंका गांधी जिस तरह से कांग्रेस को संघर्ष की पार्टी बना रही हैं वह किसी लंबी लड़ाई की तैयारी का संकेत देता है। दलितों, महिलाओं से लेकर किसानों तक के मुद्दे पर प्रियंका गांधी लगातार सड़क पर उतरीं जिसने पार्टी कार्यकर्ताओं को भी जुझारू बनाया। सच बात तो ये है कि बीते कुछ सालों में कांग्रेस पार्टी ही विपक्षी की भूमिका में नज़र आ रही थी। क़रीब 18 हज़ार कांग्रेस कार्यकर्ता बीते दो सालों में जेल गये और पार्टी ने अनगिनत आंदोलन किये।

पार्टी जानती है कि युवाओं की बेरोज़गारी का मुद्दा बड़ा है। इसे संबोधित करने के लिए कांग्रेस भर्ती विधान लेकर आयी है जिसमें नौकरी के लिए परीक्षाओं से लेकर नियुक्ति तक का पूरा कैलेंडर जारी करने की बात है। इलाहाबाद में प्रतियोगी छात्रों पर पुलिसिया दमन के तुरंत बाद जिस तरह प्रियंका गांधी ने युवाओं से आनलाइन बातचीत की उसका भी अच्छा असर गया है।

इसके अलावा पार्टी को वैचारिक आधार पर मजबूत करने के लिए करीब 390 विधानसभा क्षेत्रों में प्रशिक्षण शिविर लगाये गये हैं। इन प्रशिक्षण शिविरो में कांग्रेस के इतिहास से लेकर आरएसएस के ख़तरे तक पर विस्तार से कार्यकर्ताओं से बात की गयी है। पार्टी का दावा है कि कांग्रेस के पास इस समय करीब दो लाख प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की सेना है जो गांव-कस्बों में मोर्चा लेने को तैयार हैं।

राजनीतिक पंडित यूपी के चुनाव नतीजों को लेकर तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं, लेकिन इसमें शक़ नहीं कि जनता के मुद्दों को राजनीति के केंद्र में लाने की कोशिशों में कांग्रेस सबसे आगे दिख रही है। बहुत दिन बाद कांग्रेस एक ज़िम्मेदार राष्ट्रीय पार्टी के भाव से चुनाव में उतरी है और नतीजे जो भी हों, कांग्रेस का इस तरह से उठ खड़ा होना यूपी के लिए शुभ संकेत है।

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