Chhath puja: छठ पूजा के लिए क्यों नहीं होती किसी पुजारी की जरूरत, जानिए इसके पीछे की वजह

Chhath puja: छठ पूजा के लिए क्यों नहीं होती किसी पुजारी की जरूरत, जानिए इसके पीछे की वजह

Chhath Puja rituals in hindi: चार दिवसीय छठ महापर्व की शुरुआत इस साल 28 अक्टूबर को नहाए-खाए के साथ शुरू हो गई है। छठ पूजा सिर्फ बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा, नेपाल में ही नहीं मनाया जाता है, बल्कि पूर्वांचली जहां-जहां भी रहते हैं, वहां छठ पर्व मनाते हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई से लेकर एरिजोना, रैले, पोर्टलैंड, मेलबर्न, दुबई और अबू धाबी समेत अमेरिका के भी कई शहरों में छठ पूजा की धूम देखने को मिलती है। छठ पूजा के चार दिनों में क्या होता है, इस बारे में हर साल बहुत कुछ कहा जाता है लेकिन आइए हम आपको बताते हैं कि छठ पूजा में आखिर किसी पुजारी की जरूरत क्यों नहीं होती?

छठ पूजा में पुजारी की जरूरत क्यों नहीं होती?

छठ पूजा में पुजारी की जरूरत क्यों नहीं होती?

छठ पूजा के दौरान भक्त भगवान सूर्य की पूजा करते हैं। हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं के विपरीत सूर्य एक ऐसे भगवान हैं, जो प्रत्य़क्ष दिखते हैं। इसलिए कहा जाता है कि भक्त और ईश्वर के बीच इस पर् में संवाद प्रत्यक्ष होता है, इसके लिए किसी मध्यस्थ यानी पंडित या पुजारी की जरूरत नहीं होती है।

छठ ढ़लते और उगते सूर्य दोनों की पूजा की जाती है

छठ ढ़लते और उगते सूर्य दोनों की पूजा की जाती है

हालांकि छठ के दौरान सूर्य को अर्घ्य देते हुए भक्त स्वयं मंत्रों का जाप करते हैं। भक्त छठ में ढ़लते और उगते सूर्य दोनों की पूजा करते हैं। त्योहार से पता चलता है कि सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों महत्वपूर्ण हैं। इस चक्र के बिना हमारा अस्तित्व संभव नहीं है। इस लिहाज से छठ विशुद्ध धार्मिक होने के बजाय एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक त्योहार भी है।

पुजारी की मदद ना लेना प्रतिबंधित नहीं हैं

पुजारी की मदद ना लेना प्रतिबंधित नहीं हैं

हालांकि छठ अनुष्ठानों के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है कि पुजारियों की मदद नहीं ली जा सकती है। वे प्रतिबंधित नहीं हैं। लेकिन अधिकतर, भक्त स्वयं छठ की पूजा करते हैं और सूर्य देव, उनकी पत्नी उषा या छठी मैया, प्रकृति, जल और वायु की आराधना करते हैं।

प्रकृति के महत्व पर जोर देती है छठ पूजा

प्रकृति के महत्व पर जोर देती है छठ पूजा

छठ पूजा प्रकृति के महत्व और उसके संरक्षण का संदेश देती है। पूजा के लिए जलाशयों, नदी की सफाई की जाती है, जो पर्यावरण को अनुकूल बनाए रखने के लिए बहुत अहम है। यह भी माना जाता है कि मानव शरीर सूर्योदय और सूर्यास्त के दौरान सकारात्मक सौर ऊर्जा को सुरक्षित रूप से अवशोषित कर सकता है। विज्ञान कहता है कि सूर्योदय और सूर्यास्त के समय किरणों में पराबैंगनी विकिरण सबसे कम होता है। इस पर्व में शुद्धता का भी अत्यधिक महत्व है। भक्त ठंडे पानी में नहाते हैं और त्योहार के चार दिन फर्श पर सोते हैं।

ऋग्वेद में भी मिलता है छठ पूजा का उल्लेख

ऋग्वेद में भी मिलता है छठ पूजा का उल्लेख

छठ पूजा का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। ऋग्वेद ग्रंथों के कुछ मंत्रों का जाप उपासकों द्वारा सूर्य की पूजा करते समय किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि वैदिक युग के ऋषि स्वयं को सीधे सूर्य के प्रकाश में आकर पूजा करते थे।

ऐसा माना जाता है कि जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तो उन्होंने माता सीता के साथ सूर्य देवता के सम्मान में व्रत रखा था। एक कहानी ये भी है कि सूर्य देव और कुंती के पुत्र कर्ण को पानी में खड़े होकर प्रार्थना करने के लिए कहा गया था। कर्ण ने अंग देश पर शासन किया, जो बिहार में फिलहाल भागलपुर में है। माना जाता है कि द्रौपदी और पांडवों ने भी अपना राज्य वापस पाने के लिए छठ पूजा की थी।

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