Sawan shivratri 2021: सावन की शिवरात्रि आज, क्या है पूजा का समय?
नई दिल्ली, 05 अगस्त। सावन महीने में आने वाली शिवरात्रि को सावन की शिवरात्रि कहा जाता है। ये दिन बड़ा पावन है। इस बार ये पर्व 6 अगस्त को है। कहते हैं इस दिन अगर कुंवारी लड़कियां अगर व्रत करें तो उन्हें मनचाहे वर की प्राप्ति होती है और अगर सुहागिन महिलाएं इस दिन व्रत रखें तो महिलाओं के पतियों को लंबी आयु मिलती है। वैसे कहा ये भी जाता है कि सावन की शिवरात्रि में यदि पूरे विधि विधान से भगवान शिव की पूजा की जाए और व्रत रखा जाए तो जीवन में सुख-समृद्धि की कोई कमी नहीं होती है।

- सावन शिवरात्रि व्रत तिथि: शुक्रवार, 6 अगस्त 2021
- प्रदोष काल में पूजा का वक्त: शुक्रवार शाम 7 बजकर 3 मिनट से 9 बजकर 43 मिनट तक
- निशिता काल पूजा का समय : रात 12 बजकर 06 मिनट से देर रात 12 बजकर 48 मिनट तक
- शिवरात्रि व्रत पारण समय: शनिवार 7 अगस्त को सुबह 5 बजकर 46 मिनट के बाद

ऐसे करें पूजा
- इस दिन की भगवान शिव की खास पूजा का विधान है।
- भगवान शिव का गंगाजल, दूध, दही, घी, पंचामृत के साथ रूद्राभिषेक करते हैं।
- कहते हैं अगर सच्चे मन से भोलेनाथ की पूजा की जाए तो इंसान का हर कष्ट मिट जाता है।
- शिवजी की पूजा से मानसिक बल बढ़ेगा ।
शिव को प्रसन्न करने के लिए शिवाष्टक स्तोत्र का पाठ
शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं यशश्र्चारु चित्रं धनं मेरुतुल्यं
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||
कलत्रं धनं पुत्रपौत्रादि सर्वं गृहं बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||
षडङ्गादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||
विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||
क्षमामण्डले भूपभूपालवृन्दैः सदासेवितं यस्य पादारविन्दं
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||
यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापा जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात्
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||
न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ न कान्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तं
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||
अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्घ्ये
मनश्र्चेन लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे ततः किं ततः किं ततः किं ततः किं ||
गुरोरष्टकं यः पठेत्पुण्यदेही यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही
लभेद्धाञ्छितार्थं पदं ब्रह्मसंज्ञं गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नं ||












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