जननी तेरे रूप अनेक

तू ही अर्धांगिनी
तू ही पुरुष समाज स्वामित्वनी
तू ही भागिनी
तू ही भामिनी
तू ही जग्दात्री
तू ही कामिनी
तू ही संगिनी
तू ही सर्व समाज प्रधायानी
तू ही अंकित है सजीव मंडल में
तू ही अंकुरित है अनंत दर्पण में
तुने ही अंगीकृत किया इस संसार को
तो कैसा ये अंकुश तेरे ही निर्माण को
तेरे ही अंग तेरा ही अंश
फिर क्यूँ नहीं है तेरा कोई वंश
तेरा आँचल सदा सुख दाई
फिर क्यूँ जमाना दिखाता तुझे खाई
तेरे ही विश्वास से क्यूँ खेलते लोग
क्यूँ हमेशा घायल करते तेरी ममता को वो।
लेखक परिचय- ऋतु राय, लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्रा हैं और लखनऊ के हुसैनगंज इलाके की निवासी हैं।
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