कॉलेज के यादगार दिन

एक दूजे से अनजाने
... खुलकर मिलने में भी
हम सब थे थोड़ा सकुचाते
नाम पूछते बतलाते थे
फिर थोडा सा मुस्काते थे
निश्चल कोमल मन से
अपने भाव जगाते थे
सुबह-सुबह उठकर मेस में
लाइन जो लगाते थे
तभी एक दूसरे का हाल चाल पूछ लेते थे
बस से कॉलेज तक
सब संग में जाते थे
रस्ते में पड़ने वाले संगम के पुल पर
गोरी विदेशी मेमों को देख कर
जोर-जोर से चिल्लाते थे
हर असाइनमेंट छाप-छाप कर
अपना ज्ञान बढाया है
और कुछ आया ना आया
नक़ल करना बखूबी आया है
पहले जाने वाली बस में
लद-लद कॉलेज से आते थे
उस चिड़िया घर जैसे कमरे में
आराम से सो जाया करते थे
mass बंक, प्रॉक्सी के जरिये
पढ़ाकुओं को गधे-घोड़े का फर्क समझाया
कॉलेज ना जाने पर भी
निशांत हिरानी क्लास में प्रेसेंट आया
कुछ का नाम बिगाड़ा
कुछ की मौज उडाई
दोस्त के जन्म दिन पर
उसे लातों से मारने पर भी दावत उड़ाई
वीपी की क्लास में हम सब
खर्राटे खूब लगाते थे
आरती मैम को देख-देख
मन ही मन हर्षाते थे
मतभेद कभी जो बढ़ गये
खुद ही सुलझाते थे
एक दूजे से घुल मिल
माहौल को मस्त बनाते थे
सुट्टे पे सुट्टा हम सब
खूब उड़ाते थे
हर ख़ुशी के मौके पर
बियर पे बियर चढाते थे
इग्जाम समय आने पर
खुद को रात रात जगाया था
समझ नहीं आने पर
'मुझे पढ़ा दे' का नारा भी खूब लगाया था
अब प्लेसमेंट टाइम आया है
टेंशन को संग में लाया है
रात-रात घिसते हैं
फिर भी कहीं नहीं हो पाया है
कुछ की लग गयी है
कुछ की लगने वाली है
नौकरी की चिंता क्यूँ करते हो
वो तो अपनी घरवाली है
आज नहीं तो कल
खुद चलके आ जानी ही है
आज भले रूठी हो जरा,
कल मान ही जानी है
कुछ को गूगल कुछ को टीसीएस
यारों मिल ही जानी है
ये मौज मस्ती की जिंदगी
फिर ना कभी आयेंगे
चार बरस जीवन के ये
सबसे सुखमय कहलाएँगे
बीबी होगी बच्चे होंगे
उनको खूब बताएँगे
चार बरस जीवन के
यारों वापस कभी नहीं आयेंगे।
लेखक परिचय- निशांत हिरानी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, इलाहाबाद में बीटेक के छात्र हैं।
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