Pitru Paksha 2022: श्राद्ध से मृत और जीवित सभी का होता है कल्याण
नई दिल्ली, 08 सितंबर। शास्त्रों में श्राद्ध पक्ष की अत्यंत महिमा बताई गई है। पितृपक्ष में मृत स्वजन का श्राद्ध करने से न केवल मृतात्मा को शांति, संतुष्टि और मुक्ति मिलती है बल्कि श्राद्ध करने वाले को सुख-संपन्नता का आशीर्वाद मिलता है और मृत्यु के उपरांत वह व्यक्ति जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। जो प्राणी विधिपूर्वक शांतमन होकर सच्ची श्रद्धा से पितरों का श्राद्ध करता है वह सभी पापों से मुक्त होकर फिर से संसार चक्र में नहीं आता। इसलिए कहा गया है प्राणी को पितरों की संतुष्टि के साथ स्वयं के कल्याण के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

महर्षि सुमंतु का कथन है इस जगह में श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याणप्रद उपाय नहीं है अत: मनुष्य को यत्नपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। श्राद्ध करने वाले की आयु में वृद्धि होती है, पुत्र प्रदानकर कुल परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखता है, धन-धान्य के भंडार भर जाते हैं, शरीर में बल-पौरुष का संचार होता है। यश का विस्तार होते हुए सभी प्रकार के सुख प्रदान करता है।
श्राद्ध का पुण्य प्राप्त होता है
मार्कण्डेय पुराण का कथन है किश्राद्ध से संतुष्ट होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घ आयु, संतति, धन, विद्या, राज्य, सुख स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करते हैं। श्राद्ध के बारे में यहां तक कहा गया है किजो व्यक्ति श्राद्ध के विधि विधान को जानकर किसी दूसरे मनुष्य को श्राद्ध करने की सलाह देता है, श्राद्ध का अनुमोदन करता है उसे भी श्राद्ध का पुण्य प्राप्त होता है।
श्राद्ध न करने से हानि
अपनी महायात्रा में प्राणी अपना स्थूल शरीर नहीं ले जा सकता, ऐसे में उसे अन्न-जल कैसे प्राप्त होता है। उसके सगे संबंधियों द्वारा जो कुछ श्राद्धविधि से उसे दिया जाता है, वही उसे प्राप्त होता है। व्यक्ति के मरणोपरांत पिंडदान किया जाता है। सर्वप्रथम शवयात्रा के समय छह पिंड दिए जाते हैं, जिनसे भूमि के अधिष्ठाता देवताओं की प्रसन्नता होती है तथा भूत-पिशाच की बाधा दूर होती है। दशगात्र में दिए जाने वाले दस पिंडों से जीव को अतिवाहक सूक्ष्म शरीर प्राप्त होता है। अब आगे उसे पाथेय अर्थात् रास्ते में अन्न-जल की आवश्यकता होती है जो उत्तमषोडशी में दिए जाने वाले पिंडदान से उसे प्राप्त होते हैं। यदि सगे-संबंधी, पुत्र-पौत्रादि आदि न दें तो भूख प्यास से उन्हें वहां बहुत कष्ट होता है। और जब उन्हें कष्ट होता है तो वे श्राद्ध न करने वाले स्वजन को पग-पग पर कष्ट देते हैं। मृत प्राणी बाध्य होकर श्राद्ध न करने वाले स्वजनों का रक्त चूसने लगता है। ब्रह्मा पुराण के नागर खंड में कहा गया है किपीड़ित मृत प्राणी परिवार को श्राप देते हैं। फिर उस अभिशप्त परिवार को जीवनभर कष्ट झेलना पड़ते हैं। उस परिवार में पुत्र उत्पन्न नहीं होता, सब रोगी रहते हैं। किसी की लंबी आयु नहीं होती। मरने के बाद भी नरक में जाना पड़ता है।










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