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कविता: 'विटप एव्ं वसुधा'

'ये प्रथ्वी एक नगीना है ,
जिसमें सबको जीना है !
इसमें सबको खाना है,
इसी मे सबको पीना है !!'

'इस पीने की प्यास ने हमसे,
बहुत बहुत कुछ छीना है !
जीवन रूपी इस उपवन का,
हर इक पंक्षी रीना है !! '

'वृक्ष काटकर हमने इसपर,
जुल्मों को जो ढाया है !
किया उत्खनन इसका हमने,
इसको बहुत सताया है !!'

'इसी राह में न चलने को,
अब हमने बोल उठाया है !
वृक्ष लगाकर इसे संवारें ,
यही हमें अब भाया है !!'

'वृक्षों से ही पानी मिलता,
इन्हीं से हमको छाया है !
वृक्षों से है धरा ये सुन्दर,
निर्मल सबकी काया है !!'

'विटप लगाओ अरे प्रियेवर,
ये ईश्वर का इक साया है !
दुख दरिद्र्ता दूर होयेगी,
चहुं दिश होगी माया है !!'

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