Jagannath Rath Yatra 2023: क्यों महाप्रसाद मिट्टी के बर्तन में बनता है? क्या है इसके पीछे का राज?
Jagannath ke Mahaprasad ki kahani: आज से दुनिया भर में प्रसिद्ध 'जगन्नाथ रथ यात्रा 2023' प्रारंभ हुई है। पुरी में इस वक्त भक्तों का जमावड़ा लगा हुआ है। चारधामों में से एक पुरी की इस यात्रा का गवाह बनने के लिए विश्व के कोने-कोने से लोग आते हैं। आज सुबह पूरे विधि-विधान से यात्रा प्रारंभ हुई है।

मालूम हो कि यात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और प्रभु बलराम की विशेष पूजा की जाती है और उन्हें महाप्रसाद का भोग लगता है। जिस तरह से ये यात्रा अलौकिक है, ठीक वैसे ही इस मंदिर का प्रसाद भी काफी खास होता है।
प्रभु को महाप्रसाद का भोग लगता है
आपको बता दें कि केवल रथ यात्रा के ही दिन नहीं बल्कि पुरी मंदिर में हर रोज भगवान को 6 टाईम महाप्रसाद का भोग लगता है, जिसमें 56 तरक व्यंजन शामिल होते हैं। मंदिर में एक खास रसोई है, जो कि दुनिया की सबसे बड़ी रसोई में गिनी जाती है। जिसमें लाखों लोगों के लिए रोज प्रसाद बनता है, जिसे कि करीब 500 रसोइये और 300 हेल्पर मिलकर बनाते हैं। अब इसे आस्था कह लीजिए या फिर भगवान का आशीष कि मंदिर का प्रसाद कभी भी भक्तों को कम नहीं पड़ता है।
मिट्टी के बर्तनों की संख्या 9 होती है
मालूम हो कि प्रसाद बेहद ही पारंपरिक ढंग से मिट्टी के चूल्हे से लकड़ी जलाकर बनाया जाता है और वो भी पूरी तरह से साफ मिट्टी के बर्तनों से, जिनकी संख्या नौ होती है। सारे बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर पकाया जाता है। सबसे पहले सबसे नीचे वाले बर्तन में भोजन पकता है और सबसे अंत में सबसे ऊपर वाले बर्तन में प्रसाद पकता है।
मिट्टी के बर्तन पूरी तरह से शुद्ध होते हैं
खास बाात ये है कि प्रसाद के लिए हर रोज नए बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता है। इनके लिए कभी भी स्टील के बर्तनों का प्रयोग नहीं होता है। दरअसल मिट्टी के बर्तन पूरी तरह से शुद्ध होते हैं और इकोफ्रेंडली होते हैं, जो कि किसी भी तरह से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं इसलिए उनका प्रयोग हमेशा अच्छा माना जाता है।
मिट्टी के बर्तनों का रंग लाल होता है
मिट्टी के बर्तन को आसानी से रोज बदला जा सकता है क्योंकि ये महंगे नहीं होते हैं। इसमें भोजन काफी देर तक गर्म रहता है क्योंकि मिट्टी ऊष्मा की कुचालक है। मिट्टी के बर्तनों का रंग लाल होता है, जो कि शुभता का रंग माना जाता है। साथ ही इन बर्तनों में खाना जल्दी बन जाता है इसलिए भी इसका मंदिर में प्रयोग किया जाता है। मंदिर की रसोई के अंदर सभी 240 चूल्हे पारंपरिक ईंट और मिट्टी से बने हुए हैं।
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