Hartalika Teej 2020: पति का प्रेम दिलाने वाला व्रत है 'हरितालिका तीज'

नई दिल्ली। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन हरितालिका तीज व्रत किया जाता है। यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति का प्रेम पाने के लिए करती हैं और अविवाहित लड़कियां योग्य पति की प्राप्ति के लिए हरितालिका तीज का व्रत रखती हैं। यह व्रत 21 अगस्त 2020, शुक्रवार को आ रहा है। इस व्रत में भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा की जाती है। दिनभर व्रत रखा जाता है और भगवान के भजन-कीर्तन, गीत गाए जाते हैं।

हरितालिका तीज व्रत का वर्णन पुराणों में...

हरितालिका तीज व्रत का वर्णन पुराणों में...

हरितालिका तीज व्रत के बारे में पुराणों में उल्लेख मिलता है कि स्वयं पार्वती ने एक जन्म में शिव को अपने पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया और वरदान में उनसे उन्हें ही मांग लिया। इसी व्रत को हरितालिका तीज व्रत के नाम से जाना जाता है। कई स्थानों पर इसे बड़ी तीज भी कहते हैं। वैसे तो पूरे भारत में सभी सुहागिनें इस व्रत को बड़े उत्साह से करती हैं, लेकिन विशेष रूप से मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान में हरितालिका तीज को बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।

हरितालिका तीज की कथा

हरितालिका तीज की कथा

एक बार पार्वती ने गंगा किनारे 12 वर्ष की आयु में कठोर तप किया। वे शिव जी को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। उनके व्रत के उद्देश्य से अपरिचित उनके पिता गिरिराज अपनी बेटी को कष्ट में देखकर बहुत दुखी हुए। ऐसे समय में एक दिन स्वयं नारद मुनि ने आकर गिरिराज से कहा कि आपकी बेटी के कठोर तप से प्रसन्न् होकर भगवान विष्णु उनसे विवाह करना चाहते हैं। उनकी बात सुनकर पार्वती के पिता ने प्रसन्न् होकर सहमति दे दी। उधर, नारद मुनि ने भगवान विष्णु से जाकर कहा कि गिरिराज अपनी बेटी का विवाह आपसे करना चाहते हैं। श्री विष्णु ने भी विवाह के लिए सहमति दे दी।

गिरिराज ने अपनी पुत्री को यह शुभ समाचार सुनाया

नारद जी के जाने के बाद गिरिराज ने अपनी पुत्री को यह शुभ समाचार सुनाया कि उनका विवाह श्री विष्णु के साथ तय कर दिया गया है। उनकी बात सुनकर पार्वती विलाप करने लगीं। यह देखकर उनकी प्रिय सखी ने विलाप का कारण जानना चाहा। पार्वती ने बताया कि वे तो शिवजी को अपना पति मान चुकी हैं और पिताजी उनका विवाह श्री विष्णु से तय कर चुके हैं। पार्वती ने अपनी सखी से कहा कि वह उनकी सहायता करे, उन्हें किसी गोपनीय स्थान पर छुपा दें अन्यथा वे अपने प्राण त्याग देंगी। पार्वती की बात मानकर सखी उनका हरण कर घने वन में ले गई और एक गुफा में उन्हें छुपा दिया। वहां एकांतवास में पार्वती ने और भी अधिक कठोरता से भगवान शिव का ध्यान करना प्रारंभ कर दिया।

पार्वती ने बालूरेत का शिवलिंग बनाया

इसी बीच भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र में पार्वती ने बालूरेत का शिवलिंग बनाया और निर्जला, निराहार रहकर, रात्रि जागरण कर व्रत किया। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न् होकर भगवान शिव ने साक्षात दर्शन देकर वरदान मांगने को कहा। पार्वती ने उन्हें अपने पति रूप में मांग लिया। शिव जी वरदान देकर वापस कैलाश पर्वत चले गए। इसके बाद पार्वती जी अपने गोपनीय स्थान से बाहर निकलीं। उनके पिता बेटी के घर से चले जाने के बाद से बहुत दुखी थे। वे भगवान विष्णु को विवाह का वचन दे चुके थे और उनकी बेटी ही घर में नहीं थी। चारों ओर पार्वती की खोज चल रही थी। पार्वती ने व्रत संपन्न् होने के बाद समस्त पूजन सामग्री और शिवलिंग को गंगा नदी में प्रवाहित किया और अपनी सखी के साथ व्रत का पारण किया। तभी गिरिराज उन्हें ढंूढते हुए वहां पहुंच गए। उन्होंने पार्वती से घर त्यागने का कारण पूछा। पार्वती ने बताया कि मैं शिवजी को अपना पति स्वीकार चुकी हूं और आप श्री विष्णु से मेरा विवाह कर रहे हैं। यदि आप शिवजी से मेरा विवाह करेंगे, तभी मैं आपके साथ घर चलूंगी। पिता गिरिराज ने पार्वती का हठ स्वीकार कर लिया और धूमधाम से उनका विवाह शिवजी के साथ संपन्न् कराया।

शिवजी से वरदान में अटल सुहाग पाती है

पार्वती की सखी उनका हरण कर उन्हें घनघोर वन में ले गई थीं। हरत यानि हरण करना और आलिका यानि सखी अर्थात सखी द्वारा हरण करने के कारण ही यह व्रत हरितालिका व्रत के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो स्त्री पूरे विधि-विधान से इस व्रत को संपन्न् करती है, वह शिवजी से वरदान में अटल सुहाग पाती है और अंत में शिवलोक गमन करती है।

व्रत की पूजा विधि

व्रत की पूजा विधि

हरितालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को किया जाता है। इस दिन बालूरेत के शंकर-पार्वती बनाए जाते हैं। उनके ऊपर फूलों का मंडल सजाया जाता है। पूजा गृह को केले के पत्तों और अन्य पत्तियों से सजाया जाता है। यह निर्जल, निराहार व्रत है, जिसमें प्रसाद के रूप में फलादि ही चढ़ाए जाते हैं। व्रती स्त्रियां रात्रि जागरण कर, भजन-कीर्तन कर पांच बार भगवान शिव की पूजा करती हैं। दूसरे दिन भोर होने पर नदी में शिवलिंग और पूजन सामग्री का विसर्जन करने के साथ यह व्रत संपन्न् होता है।

तृतीया तिथि कब से कब तक

तृतीया तिथि कब से कब तक

  • तृतीया तिथि प्रारंभ 21 अगस्त सूर्योदय पूर्व रात्रि 2.26 बजे से
  • तृतीया तिथि पूर्ण 21 अगस्त को रात्रि 11.02 बजे तक
  • 21 अगस्त को पूरे दिन तृतीया तिथि रहेगी।

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