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ख्वाबों में मिलने का वादा कर गए फराज़

By Staff
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Ahmed Faraz
"अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले" ख्वाबों में मिलने का वायदा कर हर दिल अजीज़ शायर अहमद फराज़ अपनी नज्मों और गज़लों की महक छोड़ कल दुनिया से विदा हो गए।

पाकिस्तान में रहने वाले फराज़ जितने पाकिस्तान के थे उतने ही हिंदुस्तान के भी थे। वह हमेशा हिंदुस्तान की आवाम के दिलों में रहे। उनकी ग़जलें यहां उतनी ही सुनी और पसंद की जाती हैं जितनी की पाकिस्तान में।

फराज़ की शायरी में रोमांस और इंकलाब दोनों मौजूद थे। यही वजह है कि समय-समय पर उन्होंने पाकिस्तानी हुकूमत की जन विरोधी नीतियों की मुख़ालत की और इसके लिए परेशानियां भी झेलीं। उन्हें 2004 में पाकिस्तान का सबसे बड़ा सम्मान हिलाले-इम्तियाज़ दिया गया जिसे बाद में विरोध प्रकट करते हुए उन्होंने वापस कर दिया.

नेशलन काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज के निदेशक डॉ. अली जावेद ने फराज़ को याद करते हुए कहा "आज के दौर में भारत और पाकिस्तान की बंदिशों को नहीं मानने वाले लोगों की बेहद कमी है। पाकिस्तान में रहते हुए जिस तरह की परेशानियों को उन्होंने झेला और उसके बाद भी इंसानी आजादी और मजहब के भेदभाव से ऊपर उठकर लिखा वह काबिले तारीफ है।"

नामचीन शायर मुनव्वर राणा ने कहा कि फराज़ के एक शेर " ये रसूलों की किताबें ताक़ पर रख दो फराज़, नफरतों के ये सहीफे उम्र भर देखेगा कौन" पर कट्टरपंथियों ने हंगामा कर दिया था जिसपर उन्हें ढाई साल तक वतन बदर होने को मजबूर होना पड़ा।

उन्होंने कहा रोमांटिक शायर अहमद फराज साहब की मकबूलियत का कोई सानी नहीं है। एक किस्सा याद करते हुए उन्होंने बताया कि एक दफा अमेरिका में उनका मुशायरा था जिसके बाद एक लड़की उनके पास आटोग्राफ लेने आयी। नाम पूछने पर लड़की ने कहा फराज़ा

फराज़ ने चौंककर कहा यह क्या नाम हुआ? तो बच्ची ने कहा "मेरे मम्मी पापा के आप पसंदीदा शायर हैं। उन्होंने सोचा था कि बेटा होने पर उसका नाम फराज़ रखेंगे। लेकिन बेटी पैदा हो गयी तो उन्होंने फराज़ा नाम रख दिया।"

इस बात पर उन्होंने लिखा "और फराज़ चाहिए कितनी मोहब्बतें तुझे, मांओ ने तेरे नाम से बच्चों का नाम रख दिया"

डॉ जावेद ने वर्तमान परिस्थितियों में उनके निधन को शायरी जगत के लिए बड़ा नुकसान बताते हुए उनके एक शेर का जिक्र किया "रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़कर जाने के लिए आ"

मशहूर शायर मुमताज राशिद ने कहा फराज़ उर्दू रोमांटिक शायरी का ऐसा नाम है जिसकी गज़लों और नज्मों से तीन पीढ़ियां वाकिफ है। इस वक्त उनके जितने शेर लोगों को याद है उतने शायद ही किसी अन्य शायर के हों।

उन्होंने कहा वह हमेशा चाहते रहे कि भारत और पाकिस्तान की हुकूमतें करीब आयें और उन्होंने हमेशा इसके लिए कोशिश भी की। एक अन्य रचनाकार एम. सैयदी ने फराज़ को खुली शख्सियत के तौर पर याद करते हुए कहा फराज साहब आलम ए इंसानियत को अपना घर मानते थे। भारत-पाक की दूरियां कम करने के लिए वह अदीबों और फनकारों को पास आने की गुजारिश करते रहे। उनकी शायरी में हुस्न के साथ इंकलाब भी मौजूद था।

उन्होंने कहा फराज़ साहब की नज्म और गज़ल दोनों विधाओं में गहरी पकड़ थी। उनमें जो गहराई और सच्चाई थी वही उनके प्रति कशिश पैदा करती थी। इसके कारण ही वह फैज़ अहमद फैज़ के बाद सबसे बड़े शायर बनकर उभरे।

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