Chhath Puja 2022 Bamboo Soop Significance: छठ पूजा में क्यों होता है 'बांस के सूप' का प्रयोग?

बांस को शुद्धता का प्रतीक माना जाता है और इसलिए छठ पूजा में इसका खास प्रयोग होता है।

छठ पूजा में क्यों होता है 'बांस के सूप' का प्रयोग?: आस्था के महापर्व 'छठ पूजा' आज से प्रारंभ हो गई है। सू्र्यदेव की अराधना का पर्व बिहार समेत पूरे उत्तर भारत में बड़े ही जोश और प्रेम के साथ मनाया जाता है। इस पर्व में बांस के सूप या टोकरी का प्रयोग होता है जिसे लोग सिर पर रखकर घाट तक जाते हैं। इसके पीछे खास कारण है। दरअसल बांस को शुद्धता का प्रतीक माना जाता है और इसलिए पूजा में इसका खास प्रयोग होता है।

Chhath Puja 2022 Bamboo Soop Significa

बांस के सूप का प्रयोग

इसके पीछे एक और मान्यता है, दरअसल बांस धरती में बिना रुके ही आगे बढ़ता है, मूल रूप से ये पूजा संतान के लिए होती है। माना जाता है कि छठ की पूजा करने से निसंतान दंपत्ति की गोद भर जाती है या जिनकी संतान है, वो तरक्की करते हुए आगे बढ़े बिल्कुल बांस की तरह इसलिए इस पूजा में बांस के सूप का प्रयोग किया जाता है।

Chhath Puja 2022 Bamboo Soop Significa

एकता का पाठ पढ़ाता है छठ

आपको बता दें कि छठ का केवल धार्मिक महत्व ही नहीं है। बल्कि ये व्रत परिवार और समाज को भी जोड़ता है। इसलिए इसका सामाजिक महत्व भी है। पूरा परिवार और समाज वर्ग व्रती के साथ इस उपवास को सफल बनाने में जुट जाता है। प्रसाद से लेकर अर्ध्य देने तक लोग एक साथ खड़े दिखाई देते हैं इसलिए इस व्रत को लोग संकल्पमय उपवास भी मानते हैं। लोग चार दिन इस व्रत के जरिए एक उत्सवी माहौल में एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। इसलिए ये व्रत प्रेम और एकता भी मानक है।

शूरवीर योद्धा कर्ण

ऐसा माना जाता है कि छठ पर्व की शुरुआत महाभारत के शूरवीर योद्धा कर्ण ने की थी, जो कुंती और सूर्य (सूर्य देव) के पुत्र थे। चूंकि कर्ण सूर्य पुत्र थे, इसलिए वे सूर्य देव की पूजा करते थे। तो वहीं महाभारत में ही वर्णन हैं कि पांडव जब अपना सबकुछ कौरवों से जुएं में हार गए थे तब द्रोपदी ने ही कार्तिक मास में षष्ठी तिथि को सूर्य देव की उपासना की थी और इसके बाद पांडवों को अपना खोया हुआ राजपाट मिला था।

Chhath Puja 2022 Bamboo Soop Significa

माता सीता ने की थी पूजा

यही नहीं रामायण में भी छठ पूजा का जिक्र है। कहा जाता है कि रावण वध के पाप से भगवान राम को मुक्त करने के लिए मुंगेर ऋषि के आश्रम मां सीता ने कार्तिक मास में सूर्यदेव की अराधना की थी, तब से ही छठ पूजा लोग करने लगे।

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