Bhishma Dwadashi 2021:भीष्म द्वादशी आज, जानिए इसका महत्व
नई दिल्ली। माघ माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीष्म द्वादशी के नाम से जाना जाता है। आज के दिन दान-तर्पण आदि कर्म करके पितरों को प्रसन्न और संतुष्ट किया जाता है। महाभारत में भीष्म पितामह सर्वशक्तिशाली, सामर्थ्यवान और अकेले महाभारत का युद्ध जीतने की ताकत रखते थे, लेकिन गलत पक्ष से युद्ध लड़ने के कारण उन्होंने पराजय स्वीकार की। महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह ने प्रतिज्ञा की थी किवे किसी स्त्री पर हथियार नहीं चलाएंगे। चूंकिउन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था इसलिए कौरव अपनी जीत सुनिश्चित मानकर चल रहे थे और पांडवों में संशय था।

तब श्रीकृष्ण के कहने पर पांडवों की ओर से शिखंडी को भीष्म के सामने भेजा गया। चूंकि शिखंडी आधा स्त्री और आधा पुरुष था इसलिए भीष्म ने उस पर शस्त्र नहीं चलाए। इसका लाभ उठाकर अर्जुन ने शिखंडी के पीछे से भीष्म पितामह पर बाणों की वर्षा कर दी। भीष्म सैकड़ों तीरों का प्रहार सहते हुए भूमि पर गिर गए। उन्हें तीरों की शैय्या पर लिटा दिया गया। उस समय सूर्य दक्षिणायन चल रहा था इसलिए उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। भीष्म ने माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अपने प्राण त्यागे इसलिए अष्टमी को उनके निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन द्वादशी को उनकी आत्मा की शांति के लिए पांडवों ने तर्पण, पिंड दान आदि संस्कार किए इसलिए इस द्वादशी को भीष्म द्वादशी के नाम से जाना जाने लगा।
क्या करें
- भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत में कहा है जो मनुष्य भीष्म द्वादशी के दिन अपने पितरों के निमित दान-तर्पण करेगा वह पितरों को सदा के लिए प्रसन्न कर लेगा।
- इस दिन अपने-अपने पितरों के निमित्त पिंड दान, तर्पण, ब्राह्मण भोज, गरीबों-जरूरतमंदों को भोजन कराने से, उचित दान-दक्षिणा देने से पितरों की शांति होती है और वे प्रसन्न होकर अच्छे आशीर्वाद देते हैं।
- भीष्म द्वादशी के दिन व्रत रखकर तिल का दान और तिल का हवन करने से समस्त प्रकार सुख-सौभाग्य प्राप्त होते हैं।
- इस दिन को तिल बारस के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन तिल मिश्रित जल से स्नान करके भगवान विष्णु की सविधि पूजा करके तिल के लड्डू नैवेद्य के रूप में अर्पण कर स्वयं भी तिल से बने पदार्थ ग्रहण करना चाहिए। दीपक भी तेल का लगाना चाहिए।












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