Nitish Kumar: ललन सिंह से पीछा छुड़ा चुके नीतीश क्या छोड़ देंगे लालू का भी साथ?

ललन सिंह को जदयू के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के लिए बाध्य कर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर यह साबित किया है कि पार्टी पर केवल और केवल उन्हीं का नियंत्रण है। अब जबकि नीतीश कुमार ने ललन सिंह से पीछा छुड़ा लिया है तब राजनीतिक क्षेत्र में तेजी से खुसर-फुसर हो रही है कि बिहार के मुख्यमंत्री को अगर कोई सम्मानजनक रास्ता मिले तो वह लोकसभा चुनाव के पहले लालू यादव का भी दामन झटक सकते हैं।

लालू प्रसाद यादव ने बहुत पहले लोकसभा में नीतीश पर बात करते हुए कहा था कि नीतीश कुमार के पेट में दांत है। वहीं इन दिनों बिहार के गांव गली की खाक छान रहे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कभी कहा था कि नीतीश कुमार जब भी कोई दरवाजा बंद करते हैं तो खिड़की खुली रखते हैं। समझा जाता है कि पार्टी को अपने कब्जे में रखने के साथ-साथ नीतीश कुमार की नजर राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका और उसके लिए चुनाव में आधिकाधिक सीटें हासिल करने पर लगी है।

Will Nitish kumar who has got rid of Lalan Singh, leave Lalu yadav too?

पूर्व के चुनाव परिणाम बताते हैं कि नीतीश कुमार जब-जब भाजपा (पिछला चुनाव छोड़कर) के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़े तब तब उन्हें अपेक्षाकृत अधिक लाभ प्राप्त हुआ है। मालूम हो कि केंद्र में फिर से सत्ता में आने के लिए बेचैन बीजेपी को भी बिहार में बड़ी जरूरत है। इंडिया शाइनिंग की हनक में वर्ष 2004 में बीजेपी ने मौका गंवा दिया था इसलिए 2024 में पार्टी बिल्कुल सुरक्षित खेल खेलना चाहती है। बीजेपी को लगता है कि नीतीश कुमार उसके मददगार बन सकते हैं। बिहार की जातीय राजनीति के जोड़ घटाव भी इसे पुख्ता करते हैं।

मौजूदा समय में ललन सिंह को किनारे किए जाने की कथा में कई अंतर कथा भी कही सुनी जा रही है। मसलन ललन सिंह लालू यादव से मिलकर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे। ललन सिंह तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाकर खुद राज्यसभा की सीट पाना चाहते थे, आदि आदि। लेकिन नीतीश की राजनीति को नजदीक से जानने वाले सूत्रों की मानें तो विधानसभा चुनाव में सीटें घटने के बाद से ही नीतीश कुमार की नजर अपना जनाधार बढ़ाने पर है। इसीलिए पार्टी पर दबदबे को कायम रखते हुए आगामी चुनाव में खुलकर खेलने तथा जदयू को मुख्य भूमिका में लाने की कोशिश में जुटे हुए हैं।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। नीतीश कुमार पहले भी कई बार यह साबित कर चुके हैं कि पार्टी पर उनका नियंत्रण है। मई 2014 में जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाना और फिर फरवरी 2015 में उन्हें गद्दी से उतार देना इसका एक सटीक उदाहरण है। इसके अलावा जिस प्रशांत किशोर को राज्य के चुनाव में पार्टी की जीत का श्रेय दिया जाता है उन्हें 2020 में पार्टी से दूध में से मक्खी की तरह बाहर निकाल कर भी नीतीश कुमार ने जदयू के भीतर अपनी ताकत का एहसास करवा दिया था। इसी तरह चाहे उपेंद्र कुशवाहा की बात हो अथवा कभी पार्टी के नाक कान रहे आरसीपी सिंह की, हर बार नीतीश कुमार ने खुद के निर्णय को सर्वोपरि रखा।

चुनावी लाभ हानि के नजरिया से देखें तो नीतीश कुमार नवंबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने यह चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लड़ा था। उस चुनाव में जदयू को राज्य में सबसे ज्यादा 88 सीट मिली थी और बीजेपी 55 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। राजद 54 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर रही थी। इस चुनाव में जदयू को 20.46 प्रतिशत वोट मिला, बीजेपी को 15.65 प्रतिशत, जबकि तीसरे नंबर पर रही राजद को 23.45 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे।

2010 में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के हिस्से 115 सीटें आई थी। गठबंधन में उनकी साथी बीजेपी को 91 सीट मिली थी। लालू यादव की पार्टी को 22 विधानसभा सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। इस चुनाव में जदयू को 22.58 प्रतिशत, बीजेपी को 16.49 प्रतिशत और राजद को 18.84% वोट हासिल हुआ था।

वर्ष 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने राजद के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। इस चुनाव में नीतीश कुमार की 44 सीटें कम हो गई। उनकी पार्टी को 71 सीटों पर जीत हासिल हुई जबकि लालू यादव की पार्टी 58 सीट ज्यादा जीती। यानी राजद को 80 सीटों पर जीत मिली। बीजेपी को पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में 38 सीटों का नुकसान हुआ। भाजपा 53 सीट ही जीत सकी। इस चुनाव में बीजेपी को 7.94% वोट ज्यादा हासिल हुआ और उसका वोट शेयर 24.4% रहा। राजद को 18.4% और जदयू को 16.4% वोट हासिल हुआ।

वर्ष 2020 में नीतीश कुमार बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़े। बीजेपी को इस चुनाव में 74 सीटों पर जीत मिली और जदयू को सिर्फ 43 सीट हासिल हुई, जबकि राजद 75 सीटों के साथ राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इस चुनाव में राजद को 23.11% वोट मिला। बीजेपी और जदयू को क्रमशः 19.46 प्रतिशत और 15.39 प्रतिशत वोट हासिल हुआ।

इसी तरह अगर लोकसभा चुनाव का आंकड़ा देखें तो 2009 में नीतीश के नेतृत्व में एनडीए ने बिहार में कमाल का प्रदर्शन किया था। वर्ष 2009 में एनडीए ने देश के अन्य राज्यों में कोई खास प्रदर्शन नहीं किया लेकिन बिहार में जदयू को 20 और बीजेपी को 12 सीट हासिल हुई थी। यहां राजद सिर्फ चार सीटों पर ही जीत सकी थी। इसके बाद मोदी युग के आगमन के साथ ही बिहार में नीतीश का जादू धीरे-धीरे कम होने लगा। नीतीश 2014 में अकेले चुनाव लड़े और सिर्फ चार सीट जीत सके, जबकि भाजपा ने 22 सीटें जीत ली। राजद केवल चार सीट हासिल करने में कामयाब हुआ। 2019 के पहले नीतीश एक बार फिर बीजेपी के साथ आ चुके थे उन्हें लोकसभा में 16 सीटों पर जीत हासिल हुई थी भाजपा 17 सीट जीतने में सफल रही, जबकि राजद अपना खाता भी न खोल सका।

वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी ने बेहद निराशाजनक प्रदर्शन किया। उनकी पार्टी सिर्फ 45 सीट ही हासिल पाई। हालांकि कम सीट होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया। स्थानीय नेताओं के आए दिन बड़ा भाई, छोटा भाई जैसे जुमले का दंश सहते हुए भी नीतीश कुमार कुर्सी पर बने रहे। लेकिन लगे हाथ अवसर भी तलाशते रहे। इंडिया गठबंधन के जरिए राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका की खातिर नीतीश ने पलटी मार ली तथा राजद की गोद में बैठ गए। कहते हैं एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती। जल्दी ही नीतीश कुमार का भ्रम टूटने लगा। तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी।

इधर इंडिया गठबंधन में शामिल दलों ने खासकर कांग्रेस पार्टी ने नीतीश कुमार को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया। फिर क्या था नीतीश कुमार एनडीए की लाइन लेंथ पर ही राजनीति शुरू कर भविष्य का संकेत देते रहे। राजद के साथ होने के बावजूद नीतीश कुमार बहुत से मुद्दों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के करीब रहे हैं। चाहे इसराइल और हमास की लड़ाई का मुद्दा हो या फिर हिंदू ग्रंथों पर राजद के कुछ नेताओं द्वारा की जाने वाली तीखी टिप्पणियां ऐसे सभी मसलों पर नीतीश कुमार की पार्टी जदयू ने हमेशा राजद से अलग अपनी राय रखी है।

जी-20 की मीटिंग के दौरान प्रधानमंत्री का नीतीश के प्रति विशेष प्रेम दर्शाए जाने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी और अरुण जेटली से संबंधित समारोहों में बेहिचक शिरकत करना इस बात का संकेत देता है कि वैचारिक स्तर पर नीतीश कुमार और बीजेपी का रसायन कभी भी बहुत बिलगाव वाला नहीं रहा है। ऐसे में सब कुछ पाने के लिए व्यग्र नीतीश कुमार किसी दिन राजद का भी दामन झटक दें तो किसी को अधिक आश्चर्य नहीं होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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