Sudha Murthy: सुधामूर्ति के आहार पर विचारधारा का प्रहार क्यों?
भारत जैसे देश में जहाँ पर हर किसी के पास यह संवैधानिक अधिकार है कि वह अपनी मर्जी का जीवन जी सके, अपनी विश्वासों के आधर पर वस्त्र एवं भोजन का चुनाव कर सके, ऐसे में इन्फ़ोसिस फाउण्डेशन की चेयरमैन सुधामूर्ति को इस बात पर ट्रोल किया जाना कहां तक उचित है कि वह बाहर का भोजन इसलिए नहीं करती हैं क्योंकि वह शुद्ध शाकाहारी हैं। उन्हें यह शंका रहती है कि कहीं नॉन-वेज वाला चम्मच ही तो कहीं वेज में प्रयोग नहीं कर लिया गया है।

अभिनेता एवं फूड क्रिटिक कुणाल विजयाकर के साथ "खाने में कौन हैं" कार्यक्रम में दिए गए अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने भोजन के विषय में बात की और जिस अंश को लेकर उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जा रहा है वह इस प्रकार है। उनसे यह प्रश्न किया गया कि आप अभी पेरिस से लौटी हैं, तो जब वह बाहर होती हैं तो किस प्रकार का भोजन लेना पसंद करती हैं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उन्हें बाहर का खाना पसंद नहीं है। चूंकि वह शुद्ध शाकाहारी हैं तो उनके मन में यह डर बैठ गया है कि एक ही चम्मच का प्रयोग वह दोनों में करते होंगे। इसलिए जब वह लोग बाहर जाते हैं तो प्योर वेजेटेरियन खोजते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि उनका एक कुकिंग बैग उनके साथ रहता है, जिसमें भुनी हुई सूजी, पोहा आदि रहता है और साथ ही उसमें एक छोटा कुकर भी रहता है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी नानी भी अपने भोजन का सारा सामान साथ लेकर चलती थीं और वह उनसे पूछती थीं कि यह क्या खाने का सारा सामान लेकर चलती हैं, तो वह कहती थीं कि वह बाहर का नहीं खा सकतीं। फिर उन्होंने कहा कि "अब मैं भी ऐसी ही हो गयी हूँ।"
सुधामूर्ति ने जो कहा वह उसी परम्परा का अंश है जो हमारी संस्कृति में प्रवाहित हो रही है। जिसे लेकर स्त्री जागरण की सबसे बड़ी पुरोधा वैद्य यशोदा देवी ने भी अपनी पुस्तक गृहिणी कर्तव्य शास्त्र अर्थात पाकशास्त्र में लिखा है। उन्होंने उसी शुद्धता की बात की है जिसका पालन सुधामूर्ति कर रही हैं। शुद्धता का सीधा सम्बन्ध स्वास्थ्य से होता है। जब व्यक्ति का स्वास्थ्य सही रहता है तो वह सही कार्य करता है। भोजन का अर्थ ही शरीर को वह पोषण देना है, जिससे व्यक्ति अपने कार्यों को कर सके। वैद्य यशोदा देवी अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में लिखती हैं कि "भोजन बनाने में सबसे कठिन और आवश्यक तथा उपयोगी बात यह है कि ऋतु और प्रकृति के अनुसार ही भोजन बनना चाहिए!"
वह आगे लिखती हैं कि "प्रतिदिन का आहार जिस पर जीवन का आधार है जिससे मनुष्य दीर्घायु हो सकता है, जो मनुष्य को बलवान और बुद्धिवान बनाता है, तथा इस लोक और परलोक के सुधार का मार्ग दिखाता है, उस आहार का आजकल की स्त्रियों को कुछ भी ज्ञान नहीं है।"
चूंकि उन्होंने पुस्तक स्त्रियों के लिए लिखी थी, तो उन्होंने स्त्रियों को संबोधित किया, परन्तु यदि इसे सुधामूर्ति की ट्रोलिंग के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह कहा जाएगा कि आहार के विषय में आजकल के कथित ट्रोलर्स को तनिक भी ज्ञान नहीं है। इन ट्रोल करने वालों में कथित संवेदनशील वोक हैं, साम्प्रदायिक वोक्स हैं। या कहा जाए कि शाकाहार सुनते ही यह वोक मशीनें जागृत हो जाती हैं और इस सीमा तक सक्रिय हो जाती हैं कि वह शाकाहारी व्यक्ति को पूरी तरह से नष्ट करने पर उतारू हो जाती हैं।
सुधामूर्ति के शाकाहारी होने के विकल्प को जातिवादी तक कहा जा रहा है। शाकाहारी होना या भोजन के प्रति शुद्धता रखना कैसे जातिवादी या श्रेष्ठतावादी हो सकता है? यह एक प्रश्न है! परन्तु सुधामूर्ति पर छुआछूत का आरोप लगाने वाली यह वही लॉबी है जो अखलाक के फ्रीज में गोमांस मिलने पर उसे उसके भोजन का अधिकार बता देती है। तब यही लॉबी कहती है कि कौन क्या खायेगा, इस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। सुधामूर्ति तो किसी जीव की हत्या करके उसे अपने भोजन का आधार नहीं बना रही हैं फिर भी उनके भोजन पर आरोप क्यों?
इसे लेकर कुछ लोगों का कहना है कि शाकाहारी लोग मांसाहारी लोगों को रसोई में प्रवेश नहीं करने देते हैं इसलिए यह जातिवाद और घृणा फैलाता है। यह ट्वीट आरफा खानम शेरवानी ने किया था। यह बहुत ही हैरान करने वाली बात है कि आरफा खानम शेरवानी जैसे लोग भी सुधामूर्ति की व्यक्तिगत पसंद पर हमला कर रहे हैं, जबकि उन्होंने मात्र अपनी बात की है। आरफा खानम शेरवानी चूंकि कथित प्रगतिशीलों की अगुआ मानी जाती हैं, परन्तु वह उस वृहद छुआछूत पर एक भी शब्द नहीं कहती हैं, जिसमें अहमदिया समुदाय को मुस्लिम ही मानने से इंकार कर दिया जाता है।
यह सुधामूर्ति की व्यक्तिगत पसंद पर हमला नहीं है बल्कि यह संविधान द्वारा प्रदत्त भोजन के अधिकार की मौलिक स्वतंत्रता पर हमला है। साथ ही यह भारत की सहस्त्रों वर्ष पुरानी भोजन की शुद्धता एवं आहार की शुद्धता पर आक्रमण है, जिसका उद्देश्य एक मानसिक एवं शारीरिक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करना होता था।
चूंकि शाकाहार, साड़ी, बिंदी आदि को हिन्दू धर्म के पिछड़ेपन से जोड़ दिया गया है और यह स्थापित किये जाने का प्रयास किया जा रहा था कि जो भी इन बन्धनों में फंसा रहता है वह "आधुनिक" मापदंडों के अनुपालन में नहीं होता है और वह जीवन में कुछ भी उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाता है। जबकि सुधामूर्ति इस कुप्रचारित झूठ का खंडन अपने जीवन से करती हैं और जब उन्होंने शाकाहार को लेकर अपना विचार रखा तो वह पूरी लॉबी उनके विरुद्ध हो गयी, जो अभी तक उनकी सादगी को लेकर लेख लिखा करती थी।
इसका अर्थ यह समझा जा सकता है कि लिबरल मानी जाने वाली सुधामूर्ति को कथित लिबरल लॉबी मात्र तभी तक पसंद करेगी जब तक वह उनके वैचारिक एजेंडे के अनुकूल बात करेंगी। जैसे ही वह अपनी भारतीय संस्कृति की ओर आएंगी, आहार-विचार को लेकर बात करेंगी तो उन्हें भी जातिवादी, श्रेष्ठ्तावादी आदि की उपाधि देकर उनका विरोध किया जाएगा। लिबरल लॉबी का भारत के लोक के विरोध में एजेंडा स्पष्ट है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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