Rahul Gandhi: अपनी विदेश यात्राओं से राहुल ने क्या खोया और क्या पाया?
भारत से बाहर राहुल गांधी सिर्फ वही मुद्दे ढूंढते हैं, जिन पर भारत विरोधी लॉबी से तालियां बजवाई जा सकें। राहुल वही भाषा बोलते हैं, जिसका इस्तेमाल पाकिस्तान हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर करता रहता है।

Rahul Gandhi: राहुल गांधी की हर विदेश यात्रा कोई न कोई बड़ा विवाद छोड़ जाती है| इस बार की उनकी अमेरिका यात्रा में तो इतने किस्से हो गए हैं कि उस पर एक किताब लिखी जा सकती है| उनके कार्यक्रमों के आयोजकों में ज्यादातर भारत विरोधी एनआरआई थे, जिनमें कुछ कश्मीर की आज़ादी की मांग करते हैं, तो कुछ खालिस्तान की मांग करते हैं| कार्यक्रमों के आयोजकों में एक बड़ा तबका वह था, जो पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई के साथ मिलकर अमेरिका में भारत विरोधी लॉबिंग करता है और गाहे-ब-गाहे भारतीय दूतावास के सामने प्रदर्शन करता है|

विदेश यात्राओं में भाषण देकर राहुल गांधी जब तक भारत लौटते हैं, भारत में उनके भाषणों से ज्यादा उनके कार्यक्रमों के आयोजकों की पृष्ठभूमि वाली खबरें उनकी छवि खराब कर चुकी होती है| विदेशों में राहुल गांधी के कार्यक्रम करवाने वाले सैम पित्रोदा जैसे उनके सलाहकार उनका राजनीतिक नुकसान कर रहे हैं| इन भाषणों से राहुल गांधी नकारात्मक प्रचार हासिल कर रहे हैं, जबकि भारत में 40 दिन की भारत जोड़ो यात्रा से उन्हें सकारात्मक प्रचार मिला| जिस मीडिया को वह भारत से बाहर जाकर कोसते हैं, उसी मीडिया ने उनकी भारत जोड़ो यात्रा में उन्हें सकारात्मक प्रचार दिलाया|
भारत से बाहर राहुल सिर्फ वही मुद्दे ढूंढते हैं, जिन पर भारत विरोधी लॉबी से तालियां बजवाई जा सकें| जैसे अपने शुरुआती भाषण में ही उन्होंने कहा कि इस समय भारत के हर अल्पसंख्यक की हालत खराब है| यह वही भाषा है, जिसका इस्तेमाल पाकिस्तान हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर कर रहा है| राहुल गांधी ने इस में मुसलमानों के साथ साथ सिखों और दलितों को भी जोड़ दिया| भारत में सिखों के साथ ऐसा क्या हो रहा है, जिसका उल्लेख उन्होंने अमेरिका में किया| राहुल गांधी के कार्यक्रम में खालिस्तान समर्थकों ने नारेबाजी शुरू कर दी थी, इसलिए उन्होंने उन खालिस्तानियों की हमदर्दी हासिल करने के लिए यह बात कह दी| राहुल गांधी का यह बयान खालिस्तान आन्दोलन को हवा देने वाला है कि भारत में सिखों के साथ दुर्व्यवहार या भेदभाव हो रहा है|
राहुल गांधी ने अपने भाषणों की श्रंखला जय मीम से शुरू की और जय भीम पर खत्म की| एक समय में यह बहुजन समाज पार्टी का नारा था, अब असुदुद्दीन ओवेसी की पार्टी का नारा है| उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने के लिए दलित समुदाय पर आधारित बसपा ने यह नारा लगाया था, ताकि मुस्लिम-दलित का गठबंधन बना कर सत्ता हासिल की जा सके| बसपा को इस नारे पर एक बार सत्ता हासिल हो भी गई थी, लेकिन यह नारा दुबारा नहीं चला| कर्नाटक में भी कांग्रेस इसी कॉम्बिनेशन से सत्ता हासिल करने में कामयाब रही है, इसलिए राहुल गांधी विदेशों में जाकर कांग्रेस को यह नारा लगाने के लिए कह रहे हैं|
यहां जय मीम का मतलब मोमिन यानि मुस्लिम से है, और जय भीम का मतलब भीमराव आंबेडकर से है| राहुल गांधी को पहले भीमराव आंबेडकर की इस्लाम के बारे में लिखी किताबों और लेखों को पढ़ना चाहिए। उन्हें आंबेडकर और कांग्रेस के रिश्तों के बारे में पढ़ना चाहिए, आंबेडकर की महात्मा गांधी और सावरकर के बारे में राय को पढ़ना चाहिए| राहुल गांधी की महात्मा गांधी और सावरकर के बारे में जो राय है, आंबेडकर की राय उसके ठीक उलट थी| उन्हें पढ़ना चाहिए कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने आंबेडकर को मंत्री पद से इस्तीफा देने को मजबूर किया था और फिर उन्हें लोकसभा चुनाव में हरवाने में पूरी ताकत लगा दी थी| वह इतिहास के तथ्यों को नजरअंदाज करके राजनीतिक रोटियां नहीं सेक सकते|
राहुल गांधी का मकसद भारत के दलित समाज को हिंदुओं से अलग बताने का है। वे दलितों को कह रहे हैं कि उन्हें हिन्दू पार्टी भाजपा को वोट नहीं देना चाहिए| भाजपा हिन्दू पार्टी है, यह भारत विरोधी मीडिया का भारत से लेकर दुनिया भर में प्रचार है| जब एक अमेरिकी पत्रकार ने राहुल गांधी से केजरीवाल के बारे में सवाल पूछा था, तब उसने यही कहा था कि हिन्दू पार्टी के खिलाफ वह केजरीवाल को साथ लेकर गठजोड़ क्यों नहीं बनाते|
अमेरिकी पत्रकार राहुल गांधी से जो कहलवाना चाहते थे, वह कहलवाने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी| जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किए गए भारतीय पत्रकार विवेक रघुवंशी के बारे में सवाल पूछ कर भी उन्होंने राहुल गांधी की भारतीय निष्ठा को ही कटघरे में खड़ा कर दिया| सवाल उनसे पूछा गया था कि जासूसी के आरोप में पकड़े गए भारतीय पत्रकार के बारे में उनकी राय पर, लेकिन जवाब में राहुल ने भारत में प्रेस की आज़ादी का मुद्दा उठा दिया|
इसका साफ़ मतलब यह निकलता है कि प्रेस की आज़ादी को खतरा बता कर उन्होंने जासूसी के आरोप में गिरफ्तार विवेक रघुवंशी का बचाव करने का प्रयास किया| जबकि अगर उन्हें इस केस के बारे में नहीं पता था, या पता भी था, तब भी जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किसी भी व्यक्ति के बारे में भारत के किसी भी नेता या अधिकारी को विदेशों में टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी| अगर भारत की गुप्तचर एजेंसियों के पास उसके खिलाफ ठोस सबूत नहीं होंगे, तो वह छूट जाएगा|
सिर्फ जासूसी के आरोप में गिरफ्तार विवेक रघुवंशी का समर्थन करके राहुल गांधी ने भारी गलती नहीं की है, भारत की आज़ादी के इतिहास का अधूरा ज्ञान भी उन्हें कटघरे में खड़ा कर गया है| क्या सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्र शेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, राम प्रसाद बिस्मिल, पंडित गेंदा लाल दीक्षित, लाला लाजपत राय, वीर सावरकर, लोकमान्य तिलक, राज गोपालाचारी, डा राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल सब एनआरआई थे? जिन देशभक्तों ने भारत से बाहर रहते हुए भारत की आज़ादी के लिए काम किया, वे सब वहां पढाई करने गए थे, भारत की आज़ादी में किसी एनआरआई ने कोई भूमिका नहीं निभाई? महात्मा गांधी भी भारत में लौटने के बाद कांग्रेस में शामिल हुए थे, और लंबे समय तक कांग्रेस अंग्रेजों के हित में और क्रांतिकारियों के खिलाफ काम करती रही थी| सूचना क्रान्ति के युग में आज का भारतीय समाज यह भी जान चुका है कि भारत की आज़ादी में सिर्फ कांग्रेस और सिर्फ गांधी की भूमिका नहीं थी|
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सवाल खड़ा होता है कि भारत से बाहर जाकर इतनी भ्रांतियां फैलाने वाले भाषणों की जरूरत क्या है| प्रधानमंत्री मोदी क्योंकि अपनी विदेश यात्राओं के दौरान भारतीय मूल के लोगों से मिलते हैं| उनके कार्यक्रमों में भाषण देते हैं, जिसका सीधा प्रसारण भारत में किया जाता है, तो क्या इसलिए राहुल गांधी को भी ऐसा करना चाहिए| अगर यह सोच है, तो यह यह बेतुकी सोच है, क्योंकि न उससे मोदी को भारत में लोकप्रियता बढ़ाने में कोई फायदा होता है, न राहुल गांधी को होगा| प्रधानमंत्री अपनी विदेश यात्राओं में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं, जबकि राहुल गांधी एक विपक्षी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं|
राहुल गांधी जब अपने दौरों और भाषणों की प्रधानमंत्री के विदेशों में दिए गए भाषणों की तुलना करते हैं, तो बहुत ही हास्यस्पद लगता है| जब वह अपनी विदेश यात्राओं में प्रधानमंत्री की आलोचना करते हैं, तो भले ही वहां की मोदी विरोधी भीड़ में तालियां बजती हो, लेकिन भारत में उनकी साख उतनी ही खराब हो जाती है, क्योंकि भारत का मीडिया उनकी हर बात की चीरफाड़ करके उनके खिलाफ पब्लिक ओपिनियन बना देता है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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