Europe Violence: यूरोप को ‘युरेबिया’ बनाने की जिद्द

Europe Violence: अगर आप एक भारतीय के नाते फ्रांस की राजधानी पेरिस की यात्रा करते हैं तो एक दो बातें सहज ही अनुभव में आ जाती हैं। एक, पेरिस यूरोप में भारत विरोधी वैचारिक अभियान का गढ़ बन चुका है। दूसरा, पेरिस में इस्लामिक चरमपंथ का बढ़ना वहां के अपेक्षाकृत खुले कैथोलिक ईसाई समाज को अब स्वयं के अस्तित्व पर खतरा दिखने लगा है किन्तु वह इसके बचाव में कुछ करने की स्थिति में नहीं है। पेरिस जैसी स्थिति अब पूरे यूरोप को अपनी जद में ले रही है। इतिहास साक्षी है कि जिन समुदायों ने स्वयं के अस्तित्व को बचाने का प्रयास नहीं किया, उनका कोई नामलेवा नहीं बचा है। यूरोप में ईसाईयत और इस्लाम की जंग में इस्लामिक विचार अराजक होकर ईसाई समूह के अस्तित्व पर खतरा बनकर मंडरा रहा है।

उदाहरण के लिए, फ्रांस में मुस्लिम आबादी 60 लाख अर्थात कुल आबादी का नौ प्रतिशत है। दशक का सबसे बड़ा इस्लामिक दंगा झेल रहा फ्रांस 27 जून से अब तक जल रहा है। अफ़्रीकी मूल के मुस्लिम युवक नाहेल की हत्या के बाद सैकड़ों की संख्या में उपद्रवियों ने फ्रांस के शहरों में अराजकता की सीमाएं लांघ दीं। प्रसिद्ध पत्रिका शर्ली हेब्दो में पैगंबर के अपमानजनक कार्टून के प्रकाशन के बाद भी जो धर्मनिरपेक्षता फ्रांस में दिखी, वह अब नदारद है।

Violence in Europe Insistence to make Europe Eurabia

दरअसल, 2021 में फ्रांस की नेशनल असेंबली ने एक विवादित बिल पास किया था, 'इस्लामिस्ट सेपरेटिज्म'। इसके तहत कट्टरपंथ को रोकने के लिए उन शिक्षण संस्थानों को बंद करवाया जा सकेगा जो शिक्षा के बहाने ब्रेनवॉश करते हैं। दूसरे देशों से धार्मिक संगठनों के लिए आने वाले फंड पर नजर रखी जाएगी, फ्रांस में फ्रेंच इमाम होंगे और विदेश से सीखकर आने वाले या विदेशी लोगों को इमाम नहीं बनाया जाएगा जैसे कड़े प्रावधान थे। फ्रांस की अप्रवासी मुस्लिम आबादी इन प्रावधानों को लेकर अंदर ही अंदर सुलग रही थी जिसका लावा नाहेल की हत्या से फूट पड़ा। सीधे तौर पर यह फ्रांस को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का जिहाद है जिसकी जद में पूरा यूरोप है। हालांकि यूरोप में प्रतिवाद हो रहा है किन्तु क्या वह काफी है? प्रश्न बड़ा है।

2050 तक यूरेबिया के गठन का षड़यंत्र?

मुस्लिम चरमपंथ क्या यूरोप को 'यूरेबिया' बनाने की ओर बढ़ चुका है? हाल ही में फिलिस्तीन के एक मौलाना का वीडियो वायरल हुआ जिसमें वो धमकी देता हुआ दिख रहा है कि फ्रांस एक दिन मुस्लिम देश बन जाएगा। उसका कहना है कि फ्रांस को मुस्लिम देश बनाने के लिए सिर्फ संख्या से काम नहीं चलेगा। मुस्लिमों के पास अपना एक देश होना चाहिए जो अल्लाह के जेहाद के जरिए पश्चिमी देशों तक इस्लाम लेकर जाए। जब लोगों को इस्लाम का सही रूप, इस्लाम की रहमत और उसकी रोशनी दिखेगी तो लोग खुद ही इस्लाम को अपनाने के लिए आगे आएंगे।

हालांकि यह वीडियो 3 साल पुराना है किन्तु फ्रांस दंगों की आग के चलते इसने यूरोप और इस्लाम की खाई को और चौड़ा कर दिया है। अमेरिकी रिसर्च सेंटर 'प्यू रिसर्च' के अनुसार वर्ष 2050 तक यूरोप के कुछ देशों में मुस्लिम आबादी 25 प्रतिशत से अधिक होगी जिससे संघर्ष और बढ़ेगा। इसे लेकर पूरे यूरोप में मुस्लिमों को लेकर गुस्सा बढ़ा है।

यूरोप में पुनर्जागरण के पश्चात समाज के केंद्र से धर्म बाहर हो गया और धर्मनिरपेक्षता हावी हो गई जबकि मध्य एशिया में शिया-सुन्नी के संघर्ष ने इस्लामिक कट्टरपंथ को बढ़ा दिया। यही कट्टरता अब धर्मनिरपेक्ष यूरोप पर भारी पड़ती नजर आ रही है। ऐसे में क्या यूरोप में इस्लामोफोबिया बढ़ रहा है? और क्या यूरोप युद्ध प्रभावित और आतंरिक समस्याओं का सामना कर रहे खाड़ी देशों के मुस्लिमों को शरण देने की अपनी उदारवादी छवि के दौर से निकल कर अब प्रतिकार करने लगा है? दोनों ही प्रश्न परस्पर विरोधी हैं किन्तु हाल की घटनाएं देखें तो दोनों प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। वैसे भी यूरोप का इस्लाम से विरोधाभास का जटिल सा रिश्ता दिखता है जिसकी पुष्टि इतिहास में ऑटोमन साम्राज्य के दौर से होती है।

बीते कुछ वर्षों की घटनाओं पर नजर डालें तो यह प्रतीत होता है कि यूरोप अब मुस्लिम चरमपंथ से ऊब चुका है और सरकारें व समाज उनका प्रतिकार करने लगे हैं। स्वीडन में कुछ लोगों द्वारा बकरीद के दिन कुरआन में आग लगाकर संभवतः इस्लाम को नकारने और उससे लड़ने का सार्वजनिक एलान किया गया। जर्मनी में, जहां मुस्लिमों की जनसंख्या 50 लाख या कुल आबादी का पांच प्रतिशत है, वहां भी इस्लाम विरोधी प्रदर्शनों में तेजी आई है। जर्मनी में राष्ट्रवादी समूह जिसे 'पेगिडा' कहा जाता है, के समर्थक मानते हैं कि यूरोप के इस्लामीकरण से ईसाई रिलीजन की संस्कृति और मान्यताओं पर खतरा है और इसके चलते वे लाखों मुस्लिम शरणार्थियों को निशाना बनाने में लगे हैं।

आस्ट्रिया में 2020 में हुए आतंकी हमले के बाद वहां के मंत्री सुसैन राब ने मैप ऑफ इस्लाम नामक वेबसाइट ही लांच कर दी जिसमें देश में मौजूद सभी 620 मस्जिदों, इमामों, मुस्लिम अधिकारियों के नाम-पते ही सार्वजनिक कर दिए जिससे वहां के मुस्लिम समुदाय में भय व्याप्त हो गया। वेबसाइट में मुस्लिम संगठनों के विदेशी फंडिंग स्रोतों को भी सार्वजनिक किया गया। ऑस्ट्रिया में 8 प्रतिशत मुस्लिम जनसंख्या वहां का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। मैप ऑफ इस्लाम से यह ज्ञात हुआ कि ऑस्ट्रिया में मात्र 206 मस्जिदें ही अनुमति प्राप्त थीं, शेष अवैध रूप से संचालित हो रही थीं जो मुस्लिम युवाओं को कट्टरता का पाठ पढ़ाती थीं।

इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ स्कैंडिनेवियाई देश भी दिखने लगे हैं। डेनमार्क में 3 लाख 6 हजार मुस्लिम हैं और वे वहां की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी हैं। इसमें से अधिकांश मिडिल ईस्ट के आतंक से बचते हुए आए लेकिन अब वहां तेजी से मस्जिदों का निर्माण हो रहा है और स्थानीय लोग इस्लाम को स्वीकार कर रहे हैं जिसके चलते धर्मनिरपेक्ष डेनमार्क में मुस्लिमों के लिए अलग कानून की मांग हो रही है। अब जाकर डेनमार्क ने मुस्लिम चरमपंथ के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है।

ब्रिटेन में 30 लाख मुस्लिम अब बहस के केंद्र में हैं और यह बहस उनके प्रति बढ़ रहे गुस्से का प्रतीक है। 7/7 के हमले के बाद ब्रिटेन में मुस्लिम चरमपंथ की आहट को सुनकर अप्रवासी मुस्लिमों की बढ़ती संख्या के प्रति ब्रितानी नागरिक अब सचेत हैं और सरकार से इस मुद्दे पर ठोस कदम उठाने की मांग करने लगे हैं। वहीं इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने एक ड्राफ्ट तैयार किया है, जो मस्जिदों से बाहर प्रेयर करने पर रोक लगाएगा। इसके अलावा मस्जिद में किसी और भाषा की बजाए इतालवी भाषा में प्रेयर करनी होगी ताकि स्थानीय लोग भी उसे समझ सकें कि क्या कहा जा रहा है।

हालांकि एक तथ्य यह भी है कि मुस्लिम चरमपंथ के चलते हो रहे वैश्विक जिहाद के चलते पढ़े-लिखे मुस्लिम युवक सार्वजनिक तौर पर ईसाई रिलीजन भी अपना रहे हैं किन्तु इनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है। ऐसे में अब या तो 'स्व-धर्मत्याग' से यूरोप बच सकता है अथवा प्रतिकार से, अन्यथा तो यूरोप का मजहबी संघर्ष यूरोप को ही नहीं पूरी दुनिया को भारी पड़ने वाला है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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