RLD in NDA: यूपी में भाजपा-रालोद के मिलन का बन गया योग
RLD in NDA: अखिलेश यादव ट्वीटर पर सांड से परेशान दिखते हैं, लेकिन उनका राजनीतिक खेत उनके अपने ही सहयोगी चरते जा रहे हैं। दरअसल, ओम प्रकाश राजभर के बाद सपा के एक और गठबंधन सहयोगी जयंत चौधरी जल्द ही एनडीए का हिस्सा बनने जा रहे हैं। खबर है कि भाजपा और रालोद के बीच गठबंधन पर सहमति बन गई है। एनडीए में शामिल होते ही रालोद को केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार में शामिल किया जायेगा। रालोद के एनडीए का हिस्सा बनते ही पश्चिमी यूपी में विपक्ष से नजदीकी चुनावी टक्कर होने की संभावना न्यूनतम हो जायेगी।
गौरतलब है कि दिल्ली सेवा बिल पर विपक्षी गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी जयंत चौधरी ने एनडीए सरकार के खिलाफ मतदान नहीं किया। उनके वोट से नतीजों पर कोई फर्क नहीं पड़ना था, लेकिन इसके जरिए उन्होंने अपनी रणनीति का संकेत दे दिया। हालांकि उन्होंने सफाई दी कि उनकी पत्नी अस्पताल में थीं, इसलिए वह मतदान करने नहीं आ सके। भाजपा खेमा लंबे समय से जयंत चौधरी को अपने पाले में लाने के लिये डोरे डाल रहा था, लेकिन जयंत भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की बजाय योगी आदित्यनाथ से आश्वासन चाह रहे थे, क्योंकि उनकी पूरी राजनीति पश्चिमी यूपी में केंद्रित है।

भाजपा नेतृत्व लंबे समय से जयंत चौधरी के संपर्क में तो है लेकिन मामला जाट बहुल मुजफ्फरनगर सीट पर आकर अटक रहा था। पार्टी के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि दोनों दलों के बीच इस सीट पर सहमति बन गई है। यहां से दो बार जीते संजीव बालियान को कहीं और शिफ्ट किया जायेगा। संजीव बालियान से जनता की नाराजगी के चलते भाजपा के लिए यह सीट मुश्किल हो चुकी है। बीते विधानसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर की छह विधानसभा सीटों में भाजपा को मात्र दो सीटों पर जीत मिली थी। उपचुनाव में खतौली सीट भी भाजपा के हाथ से निकल गई। हार के लिए बालियान से जनता की नाराजगी को जिम्मेदार माना गया।
भाजपा ने जाट नेता भूपेंद्र चौधरी को यूपी का अध्यक्ष बनाकर जयंत चौधरी से टक्कर लेने की कोशिश की, लेकिन उसकी यह रणनीति काम नहीं आई। ठीक उसी तरह जैसे अनिल राजभर को कैबिनेट मंत्री बनाकर ओम प्रकाश राजभर के सामने अपना राजभर नेता तैयार करने की भाजपा की कोशिश असफल हो गई। भूपेंद्र चौधरी जाटों के बीच अपनी लोकप्रियता उस स्तर पर नहीं ले जा सके, जिसकी उम्मीद भाजपा शीर्ष नेतृत्व को थी। भूपेंद्र चौधरी को अध्यक्ष बनाने के बावजूद जाट बहुल मुजफ्फरनगर की खतौली विधानसभा उपचुनाव में रालोद के हाथों हार ने जयंत को एनडीए में शामिल करने का सूत्रपात किया।
दरअसल, जयंत चौधरी को भी अब समाजवादी पार्टी के साथ अपना भविष्य नजर नहीं आ रहा है। रालोद को चलाने के लिये जयंत को संसाधनों की भी जरूरत है। बिना सत्ता में रहे संसाधन जुटाना आसान नहीं है। जयंत को निकट भविष्य में सपा केंद्र या राज्य में सत्ता में आती नहीं दिख रही है। अखिलेश यादव की ट्वीटर वाली राजनीति से उनकी पार्टी के लोग भी नाराज हैं। सड़क पर संघर्ष करने वाली पार्टी की पहचान रखने वाली सपा लंबे समय से जमीन पर कोई आंदोलन नहीं कर रही है। कांग्रेस से संभावित गठबंधन होने के बावजूद यूपी में सपा और कांग्रेस दोनों की राह आसान नहीं है।
जयंत चौधरी समझ चुके हैं कि उनका तथा उनकी पार्टी का भविष्य फिलहाल एनडीए के साथ ही सुरक्षित हो सकता है। जितनी जरूरत भाजपा को है, उतनी ही रालोद को भी है। एनडीए के साथ आने के बाद जाट वोटों का बिखराव रूक जायेगा। जयंत के पिता चौधरी अजीत सिंह भी एनडीए का हिस्सा रह चुके हैं। एनडीए के साथ गठबंधन के बाद ही रालोद सबसे ज्यादा विधानसभा और लोकसभा सीट जीती थी। यह महज इत्तेफाक नहीं है कि जिस दिन जयंत चौधरी ने राज्यसभा में वोटिंग के समय एनडीए सरकार के खिलाफ वोट नहीं दिया, ठीक उसी दिन उनकी पार्टी के विधायक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लखनऊ में मुलाकात कर रहे थे।
जयंत चौधरी के एनडीए का हिस्सा बनने के बाद आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर रावण के भी शामिल होने की संभावना बन जायेगी। कभी इमरान मसूद के खास रहे चंद्रशेखर की नजदीकी आजकल जयंत चौधरी के साथ है। चंद्रशेखर इस बार लोकसभा चुनाव नगीना सुरक्षित सीट से लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। चंद्रशेखर अगर एनडीए का हिस्सा बनते हैं तो भाजपा को पश्चिम की कई सीटों पर दलित वोटों का प्रतिशत बढ़ने की संभावना बनेगी। सहारनपुर के आसपास के जिलों के युवाओं में चंद्रशेखर की अच्छी लोकप्रियता है। मायावती के बाद चंद्रशेखर ही दलितों में लोकप्रिय हैं।
भाजपा और रालोद के बीच जो सहमति बनी है, उसके अनुसार जयंत चौधरी को केंद्र सरकार में मंत्री बनाया जायेगा। साथ ही उनके दो विधायकों को यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार में शामिल किया जायेगा। विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश में 15 अगस्त के बाद संक्षिप्त मंत्रिमंडल विस्तार किया जायेगा। इसी विस्तार में रालोद और सुभासपा को शामिल करने के साथ 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए कुछ पुराने चेहरों को हटाकर नये चेहरों को शामिल किया जायेगा। दूसरी तरफ, सपा के कई विधायक भी भाजपा के संपर्क में हैं, जो अक्टूबर-नवंबर में शामिल हो सकते हैं।
बहरहाल, समय रहते जयंत चौधरी ने समझ लिया है कि यूपी में सपा के साथ रहकर फिलहाल सत्ता तक नहीं पहुंचा जा सकता। इसलिए संभवत: उन्होंने एनडीए में शामिल होने का फैसला किया होगा। उम्मीद की जा रही है कि 15 अगस्त के बाद जब मंत्रिमंडल का संभावित विस्तार होगा तब जयंत चौधरी और उनके कुछ विधायकों को केन्द्र से लेकर राज्य तक मंत्री पद मिल जाएगा, और भाजपा को पश्चिमी यूपी में जाटों से नाराजगी दूर करने का मौका। दोनों के लिए यह विन विन सिचुएशन होगी। यही राजनीतिक जरूरत जयंत के लिए अखिलेश से दूरी का कारण बनी है जो आजकल की राजनीति में कोई आश्चर्य नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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