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UCC India: परंपरागत समाज बनाम किताब से बंधे हुए समुदाय

UCC India: भारतीय धर्म व्यवस्था से जुड़े हुए किसी भी व्यक्ति के सामने सही सवाल क्या होना चाहिए? क्या वह समान नागरिक संहिता का समर्थन करें या हिन्दू कोड बिल का विरोध? लेकिन सही गलत से परे हमारे लिए यह सवाल ही बेमतलब है कि क्या हमें भी समान नागरिक संहिता का विरोध करना चाहिए? वह इसलिए क्योंकि हम किताब से बंधे हुए समाज नहीं हैं। हम एक ऐसे परिवर्तनकारी समाज हैं जो बदलते समय के साथ नियम कानून और पंरपराओं में बदलाव करते जाते हैं। यह हमारे उस लचीलेपन का उदाहरण है जिससे संसार की दूसरी सभ्यताएं डरती रही हैं।

भारतीय धर्म व्यवस्था से जुड़ा समाज पानी की तरह है। इसे जैसे बहाना चाहो बह जाता है, बिना अपने मूल गुण धर्म को छोड़े हुए। इसीलिए सात दशक पहले हिन्दू कोड बिल जब बनाया गया तो उसने कोई बहुत विरोध नहीं किया। बीते हजार सालों में उसने इतने प्रकार के विरोधाभासों में अपने आपको बचाकर निकाला था कि ऐसे 'छोटे मोटे' प्रावधानों पर उसने कान ही नहीं दिया। वह अपनी उसी लय में जीवन जीता रहा जिसे समाज कहते हैं। दो सौ सालों की मेहनत के बाद अदालतें या कोर्ट तो भारत में स्थाई हो गये थे लेकिन सामाजिक संबंध खासकर विवाह में उसने कभी किसी कानून को कष्ट नहीं दिया। आज भी भारत में तलाक का रेट सबसे कम इसलिए नहीं है कि यहां परिवारों में बड़ी सुख शांति है। कम इसलिए है क्योंकि बहुत बड़े वर्ग को चूल्हे चौके की कलह के लिए कचहरी की चौकी तक जाने की आदत नहीं है।

UCC India over Traditional society vs book bound community

भारतीय मूल के लोग आज भी कमोबेश अपनी अपनी सामाजिक परंपरा की लीक पर ही चल रहे हैं। भारत जैसे भीषण विविधता से भरे देश में जहां कोस कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदल जाता हो, उसे विवाह या उत्तराधिकार के मामले में किसी एक कोड या कानून से बांध पाना असंभव ही है। कानून बनकर एक ओर रखे हुए हैं। उसका प्रभाव तो तब होगा जब कोई कोर्ट की देहरी तक जाएगा। कोर्ट कभी किसी की देहरी पर न्याय देने तो जाता नहीं। न्याय पाने वाले को कोर्ट कचहरी तक जाना होता है।

इसलिए टकराव का कहीं कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। कानून अपनी जगह कायम हैं और समाज लगभग अपनी जगह कायम है। सामाजिक व्यवस्था से कट चुके कुछ प्रतिशत लोग अपवाद स्वरूप कोर्ट कचहरी तक जाते भी हैं तो उनमें से अधिकांश का न्याय पाने से अधिक मकसद सबक सिखानेवाला होता है। स्वाभाविक है पारिवारिक मामलों में जो सबक सिखाने के लिए कोर्ट कचहरी की देहरी तक जा रहा है वह पीड़ित तो बिल्कुल नहीं होगा। वह न्याय पाने के लिए नहीं बल्कि सबक सिखाने के लिए कचहरी का रुख करता है।

इन अनुभवों ने समाज को अचेत करने की बजाय और अधिक सचेत ही किया है। उत्तर भारत के अधिकांश हिस्से में दूसरे विवाह का चलन नहीं रहा है। अधिकांश लोग यह मानते हैं कि विवाह सोलह संस्कारों में एक संस्कार है जो जीवन में एक बार ही होता है। लेकिन जब तलाक वाली व्यवस्था आयी तो पुनर्विवाह को भी समाज ने स्वीकार कर लिया। एक कानूनी प्रावधान से जो समस्या पैदा हो रही थी समाज ने उसका समाधान स्वयं खोज लिया। यही उसकी वह तरलता है जो किसी भी आकार में अपने आप को ढाल लेती है।

यह तरलता इसलिए है क्योंकि भारत का सर्वव्यापक समाज किसी किताब से बंधा समाज नहीं रहा है। यह बात सही है कि सूत्र रूप में बहुत सारी बातें शास्त्रों से समाज में उतरी हैं लेकिन समाज ने उन सूत्रों को भी अपनी परंपरा की कसौटी पर कसा है। अगर वह उनकी अपनी परंपरा की कसौटी पर खरा उतरा है तभी उसे सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया है। इन व्यवस्थाओं में भी हर पच्चीस पचास किलोमीटर पर थोड़ा बहुत बदलाव दिखता जाता है जो उसकी विविधता का परिचायक होता है।

अगर भारत का बहुसंख्यक समाज इस्लाम और क्रिश्चियनिटी की तरह किताब से चलनेवाला समाज होता तो उसमें वह तरलता कभी आ ही नहीं पाती जो दिखाई देती है। किताबें लिखी ही जाती रही हैं शासन करने के लिए। या इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि शासन करनेवाले लोग किताबें लिखकर बाध्यकारी नियम कानून बनाते हैं। फिर वह डेढ दो हजार साल पहले मिडिल ईस्ट में पैदा होनेवाले 'किताब वाले धार्मिक समुदाय' हों या फिर सत्रहवीं-अठारहवीं सदी में यूरोप में पैदा होनेवाले सरकारी किताब वाले समुदाय। किताबों के जरिए शासन करने या शासित होने की व्यवस्था भारतीय समाज के लिए कभी महत्व की नहीं रही।

इसका एक बुनियादी कारण था कि किताबें किसी एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा लिखी और थोपी जाती हैं। सर्वव्यापक समाज की उसमें सहमति नहीं हो पाती इसके उलट जो सामाजिक परंपरा या रीति रिवाज होते हैं वो सर्व समाज में व्याप्त होते हैं। इसके पालन के लिए अलग से किसी लॉ इन्फोर्समेन्ट एजंसी का गठन नहीं करना पड़ता। समाज स्वयं से इनका पालन करता है। इसलिए किताब वाले समुदाय शासन के पक्षधर होते हैं जबकि परंपरा वाले समाज अनुशासन को महत्व देते हैं।

परंपरागत समाजों में लिखित से अधिक अलिखित बातों का मोल होता है। निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री रहे समदोंग रिन्पोछे परंपरा को स्पष्ट करते हुए कहते हैं "परंपरा का उद्गम परम से होता है। परंपरा का संरक्षण परम में होता है और परंपराएं कभी काल बाह्य नहीं होती। जो काल की कसौटी पर खरी नहीं उतरती उसे परंपरा नहीं कहते।" अर्थात जो परम्परा है उसका श्रोत परम है इसलिए उसमें किसी के शोषण या दमन की गुंजाइश नहीं रहती। वह सर्व कल्याणकारी होती है। अब क्योंकि इसे काल सापेक्ष रहना है इसलिए परंपरा में समय के अनुसार बदलाव होते रहते हैं। इसके लिए न कोई संशोधन प्रस्ताव लाया जाता है और न कहीं कचहरी सजती है। बदलते समय के साथ जो बदलाव जरूरी होते जाते हैं उसके लिए समाज में किसी एक के द्वारा पहल की जाती है और अगर वह पहल काल की कसौटी पर खरा उतरती है तो अपने आप परंपरा का हिस्सा बन जाती है।

यहां एक बात और महत्वपूर्ण है। जब परंपरा का उद्गम हम परम से कहते हैं तो उसका आशय होता है प्रकृति के अनुकूल व्यवस्था। प्रकृति की अपनी एक व्यवस्था है, अनुशासन है। इस अनुशासन से धरती का हर जड़ चेतन बंधा हुआ है। धरती पर मौजूद हर जीव जीवन यापन और संतति विस्तार के सभी नियम प्रकृति से ही सीखते और पालन करते हैं। जीव जगत में हर जीव समूह की अपनी एक व्यवस्था है जिससे वह बंधा हुआ है तो फिर मनुष्य के सामने ही कानून से बांधकर रखने का संकट क्यों पैदा होता है?

वह इसलिए क्योंकि तर्क बुद्धि वाले विकास ने मनुष्य को निरंतर प्राकृतिक व्यवस्था से दूर ही किया है। परंपरागत समाज में बहुत सी बातें ऐसी दिखाई देती हैं जिनका तर्क की कसौटी पर कोई मोल नहीं होता लेकिन जब आप उनका विश्लेषण करते हैं तो पाते हैं कि वह वहां के स्थानीय परिवेश से पैदा हुई है। लेकिन जब से किताबों के जरिए एक तरह की व्यवस्था को दूसरे तरह के लोगों पर थोपने का चलन बढ़ा है मनुष्य में टकराव भी बढ़ा है और उसका जीवन भी अप्राकृतिक हुआ है। मुस्लिम, क्रिश्चियन (और अब सिख भी) किताब से चलनेवाले समुदाय हैं। इन्हें किताब में लिखी बातें बाध्यकारी लगती हैं। इसलिए किसी और किताब में कुछ ऐसा लिख दिया जाए जो उन पर भी लागू होता हो, तो वो विरोध में उतर आते हैं। उन्हें लगता है कि हम तो एक किताब से पहले ही बंधे हुए हैं। अब नयी किताब से कैसे बंध सकते हैं?

इसके उलट परंपरागत समाज को किसी किताब में लिखी गयी कोई व्यवस्था बाध्यकारी नहीं लगती। उचित होने पर वह उसे स्वीकार भी कर सकता है और अनुचित होने पर नकार भी सकता है। सामाजिक और पारिवारिक जीवन को चलाने के लिए स्वीकार या नकार के बीच उसे कुछ भी बाध्यकारी लगता ही नहीं। जिन्हें ऐसा लगता है उन्हें समस्या होती है। समान नागरिक संहिता पर बार बार होनेवाले विरोध या समर्थन को भी आप इसी कसौटी पर कसेंगे तभी समझ पायेंगे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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