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दो वीडियो एक संदेश, ‘भारतीयता’ गयी विदेश

नई दिल्ली। दो वीडियो एक साथ आए। दोनों में मारपीट दिखी। एक वीडियो में पीटने वाले भगवा कपड़े पहने हुए थे और जिसकी पिटाई हो रही थी वह सड़क पर बैठकर ड्राई फ्रूट्स बेच रहा था। कश्मीरी था। पिटाई खाते हुए वह अपने लिए आतंकवादी भी सुन रहा था और बचाव में चीख भी रहा था। दूसरे वीडियो में दो नेता, बल्कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि दिखे। एक सांसद और एक विधायक। बात से बात बढ़ी। और फिर, कुछ सेकेंड्स में तड़ातड़ 7 चप्पल। थोड़े समय बाद एक-दो रिवर्स शॉट, और फिर दो और चप्पल। यानी कुल नौ चप्पल। ये दोनों नेता हालांकि भगवा कपड़ा नहीं पहने हुए थे, लेकिन कोई इनकार नहीं कर पाएगा कि ये बीजेपी से थे- एक संत कबीरनगर के सांसद शरद त्रिपाठी और दूसरे उसी इलाके में विधायक राकेश बघेल।

शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के दुश्मन हैं दोनों वीडियो

शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के दुश्मन हैं दोनों वीडियो

ये दो अलग-अलग वीडियो जरूर हैं मगर वास्तव में एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं। एक का अस्तित्व है इसलिए दूसरे का भी है। अगर एक का अस्तित्व मिट जाए, तो दूसरा भी मिट जाए। दोनों वीडियो में जो कॉमन बात है वो ये है कि ये शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के विरोधी हैं। इन दोनों तस्वीरों में ‘घर में घुसकर मारेंगे' के भाव के साथ तरेरती आंखें, चीखती आवाज़ है और गरजते जूते व लाठियां हैं।

लखनऊ का वीडियो तो ‘घर में घुसकर मारेंगे' का सिर्फ भाव रखता है। वास्तव में यह घटना ‘अपनी गली में कुत्ते भी शेर होते हैं' की कहावत को चरितार्थ करता है। दोनों जुमलों को मिला लें तो यह अपने ही घर में घर से बाहर के लोगों पर ‘घर में घुस कर मारेंगे' की गर्जना मात्र हुई। आप खुद समझ सकते हैं कि ऐसी गर्जना को टाइगर की गर्जना या सिंह की दहाड़ कह सकते हैं या नहीं। ऐसी दहाड़ से अपने ही आश्रित बच्चे कांपा करते हैं।

दूसरी तस्वीर में भी जुबान से हिंसा, आंखों से हिंसा, हाथ से हिंसा, चप्पल से हिंसा...यानी हिंसा ही हिंसा दिखती है। मगर, यहां एक पक्ष मार खाकर भी निरीह नहीं है। वह दूसरे पर लपक रहा है। हाथ भी चला रहा है। इस दौरान और चप्पलें भी भले ही खानी पड़े। मतलब ये कि ये दोनों एक ही घर का अनाज खाए हुए हट्ठे-कट्ठे पहलवान लगते हैं। शेर तो कतई नहीं लगते क्योंकि शेर को अपने हाथ और दांत पर भरोसा होता है, चप्पल जैसी चीजों पर वे भरोसा नहीं करते।

एक वीडियो में एकतरफा नफ़रत, दूसरे में नफ़रत ही नफ़रत

नफ़रत की बात करें तो पहली तस्वीर में नफ़रत एक तरफा है। आग उगलती नफ़रत। पहली तस्वीर में अगर बचाने वाले शख्स को भी शामिल कर लें, तो मेल-मोहब्बत भी नज़र आता है। अगर मार खाने वाले कश्मीरी युवकों की नज़र से देखें तो उनके रोने और घिघियाने में ‘जीयो और जीने दो' का भाव साफ तौर पर दिखता है। जबकि, मारने वाले लोग ‘जीने नहीं देंगे', ‘केवल हम जीएंगे' का भाव दिखा रहे हैं।

दूसरे वीडियो में नफ़रत ही नफ़रत है। एक तरफा नहीं, दो तरफा। नफ़रत ज़ुबान पर आती है और फिर ज़हरीली ज़ुबान वो दृश्य पैदा करता है जिसकी उम्मीद उस दल के शीर्ष नेताओं को नहीं रही होगी जिनके लिए ये दोनों ही अपने-अपने इलाके में पार्टी का चेहरा हैं। ये चेहरे कुरूप हो गये। मानो दोनों नेताओँ ने अपने-अपने गुस्से से अपने-अपने चेहरे लाल करने के बाद पार्टी के चेहरे पर कालिख पोत दी हो।

दोनों वीडियो में दम तोड़ रही है ‘भारतीयता’

एक वीडियो में मार खाने वाला भारतीयता बांट रहा है। पहले ड्राईफ्रूट बांटने को ज़मीन पर बैठा था, मारपीट सहने के बाद भी उसके मुंह से कोई गलत शब्द नहीं निकले, कोई प्रतिकार नहीं दिखा, कोई जवाबी कार्रवाई नहीं दिखी। ऐसी प्रतिक्रिया कोई भारतीय ही दे सकता है। अन्यथा उसकी जगह पर कोई बांग्लादेशी (विदेशी) होता, तो आप प्रतिक्रिया ही कुछ अलग किस्म के पाते। वहीं इस वीडियो में जो ‘भारतीय' बना फिर रहा था, वह वास्तव में तालिबानी नज़र आ रहा था। जी हां, बुद्ध की प्रतिमा का विध्वंसक। शांति के दुश्मन।

दूसरे वीडियो में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की लड़ाई भी।7 और फिर 2 चप्पल खाकर राकेश बघेल तो वहीं ‘शहीद' हो गए। शरद त्रिपाठी को शायद ही अब संत कबीरनगर से बीजेपी टिकट दे पाए। इसी मायने में वे ‘आत्मघाती' बन बैठे। वहीं, राकेश बघेल अपने ‘छत्र'पति योगी आदित्यनाथ का आशीर्वाद लेकर बाद में अपनी ‘शहादत' की इज्जत पा लेंगे। विधानसभा चुनाव फिलहाल नहीं है कि उनका टिकट कट जाए।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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