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Annadurai on Sengol: अन्नादुरै के अखबार में छपा था सेंगोल के राजदंड होने का सच

तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के शिखर पुरुष अन्नादुरै ने उस समय भले ही अपने अखबार 'द्रविड़नाडु' में नेहरु को दिये जाने वाले सेंगोल का विरोध किया था लेकिन आज वही विरोध का पन्ना सेंगोल के राजदंड होने का प्रमाण बन गया है।

truth of Sengols scepter was published in Annadurais newspaper

नई संसद में लोकसभा स्पीकर के आसन के बगल में स्थापित सेंगोल पर राजनीतिक विवाद तेज है। कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दल सेंगोल पर सवाल उठा रहे हैं। सेंगोल को लेकर गृहमंत्री अमित शाह के दावे को कांग्रेस और वामपंथी नेता ह्वाट्सअप यूनिवर्सिटी की फेक जानकारी बताते नहीं थक रहे हैं। वैसे आजकल विरोधी पक्ष की किसी सूचना को आधारहीन बताकर प्रचारित करना होता है, तो उसे ह्वाट्सअप यूनिवर्सिटी की सूचना बताकर उसकी हंसी उड़ाई जाती है। कांग्रेस समेत सेंगोल विरोधियों का इसे ह्वाट्सअप यूनिवर्सिटी की सूचना बताना एक तरह से अमित शाह के दावे को हवा में उड़ा देना है।

लेकिन तमिलनाडु से उन दिनों प्रकाशित होते रहे तमिल अखबार 'द्रविड़नाडु' के 24 अगस्त 1947 के अंक की प्रति देखें तो विपक्ष के दावों की पोल खुल जाती है। अखबार की इस प्रति में द्रविड़ आंदोलन के नेता और बाद में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे सी.एन. अन्नादुरै का एक लेख छपा है। इस लेख में वे नेहरू को सेंगोल सौंपने की हंसी उड़ा रहे है। इस लेख से साबित होता है कि मदुरै के तत्कालीन अधिनम ने आजादी के मौके पर पांच फीट का सेंगोल जवाहरलाल नेहरू को सौंपा था।

तमिलनाडु की मौजूदा सत्ताधारी दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम् के संस्थापक सी.एन. अन्नादुरै का पूरा नाम कांजिवरम नटराजन अन्नादुरै था। अन्नादुरै एक तरह से नास्तिक थे। हिंदू धर्म और कथित ब्राह्मणवाद के विरोधी। 1937 के चुनावों में विजयी होने के बाद सी. राजगोपालाचारी मद्रास के मुख्यमंत्री बने। राजाजी चूंकि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के संस्थापक निदेशक रहे, इसलिए हिंदी के प्रति उन दिनों उनमें अनुराग था। इसी अनुराग के तहत मुख्यमंत्री बनते ही राजाजी ने प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई के माध्यम के रूप में हिंदी को भी लागू कर दिया। सी.एन. अन्नादुरै ही पहले तमिल नेता रहे, जिन्होंने हिंदी का विरोध किया था। यह विरोध कितना बढ़ा, इसका असर आज तक द्रविड़ आंदोलन में दिखता है।

अन्नादुरै मद्रास राज्य के आखिरी मुख्यमंत्री रहे। वे छह मार्च 1967 से लेकर मृत्यु पर्यंत 14 जनवरी 1969 तक ही मुख्यमंत्री रहे। लेकिन इस छोटे कार्यकाल में उन्होंने जो कदम उठाए, उसका असर आज तक दिखता है कि कांग्रेस जैसी पार्टी के पांव तमिल धरती से उखड़ गए और द्रविड़ आंदोलन की नींव तमिलनाडु में मजबूत हो गई।

अन्नादुरै द्रविड़नाडु के समर्थक थे। उनकी नजर में मद्रास प्रेसिडेंसी के इलाके यानी दक्षिण के पांचों राज्य आंध्र, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल द्रविड़ राज्य का हिस्सा थे। अपने द्रविड़ आंदोलन को वैचारिक धार देने और अपने समर्थकों को संबोधित करने के लिए अन्नादुरै 'द्रविड़नाडु' नाम से अखबार निकालते थे। वैसे द्रविड़नाडु की कल्पना सबसे पहले साल 1921 में जस्टिस पार्टी ने की और उसकी मांग रखी। इसके ठीक चार साल बाद पेरियार ने इस आंदोलन को गति दी। इसके बाद इस आंदोलन को द्रविड़दार आंदोलन कहा गया। शुरू में अन्नादुरै इसके सदस्य थे।

बहरहाल द्रविड़नाडु अखबार के 24 अगस्त 1947 के अंक में सी.एन. अन्नादुरै मदुरै के अधीनम द्वारा सेंगोल को नेहरू को सौंपने पर तंज करते हुए तमिल में जो लिखते हैं, उसका भावार्थ है, "श्री यदुथारा अधीनम ने पंडित नेहरू को पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने नई सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में उनकी प्रशंसा की। फिर वे दिल्ली जा पहुंचे और उन्हें मूल सोना चढ़ाया..जो राजदंड है..वह भेंट किया, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह उपहार है..अगर उपहार है तो राजदंड क्यों?" इसके बाद अन्नादुरै जो लिखते हैं, उससे उनका क्षोभ और उनकी वैचारिकी झलकती है। उन्होंने जो लिखा है, उसका भावार्थ है, " यह अप्रत्याशित और बेकार है। यह बिल्कुल अनावश्यक रहा लेकिन ऐसा लगता है कि यह भाव नेहरू के दिल में कहीं छुपा हुआ था। अगर ऐसा है तो यह बहुत खतरनाक है।"

इस लेख में अन्नादुरै अपनी वैचारिकी को भी छिपा नहीं पाते। उन्होंने लिखा है, "क्या आप जानते हैं कि जंगलों के उस पार, ऐसे लोग भी हैं, जिनके लिए जरूरी उनका धर्म है..उन्हीं लोगों को मौजूदा सरकार ने अनुमति दी..जबकि कुछ लोग ऐसे हैं, जिनसे अधीनम डरते हैं.." साफ है कि उन्होंने अपनी नास्तिकता और ब्राह्मणवाद विरोधी मानसिकता को भी इस बहाने जाहिर किया है।

इस लेख में सी.एन. अन्नादुरै बार-बार पूछते हैं कि आखिर नेहरू को सेंगोल अधीनम ने क्यों दिया और उसे नेहरू ने क्यों लिया? वे इसे राजनीति में धर्म के हस्तक्षेप के तौर पर देखते हैं और इसकी कड़ी आलोचना करते हैं। बहरहाल इस लेख से भी यह जाहिर नहीं होता कि उस सेंगोल को माउंटबेटन ने नेहरु को दिया था या नहीं। अलबत्ता इस लेख में अन्नादुरै यह बताने से भी नहीं चूकते कि सेंगोल पांच फीट का है और उसे सोने से बनाया गया है। वे यह भी लिखते हैं कि इस सोने के पीछे द्रविड़ लोगों का खून है।

सेंगोल सचमुच था या नहीं, उसे नेहरू को दिया गया था या नहीं, इसे लेकर संशय पैदा करने की कांग्रेस और वाम वैचारिकी की कोशिश का जवाब है अन्नादुरै का यह लेख। नेहरू को अधीनम द्वारा सेंगोल सौंपने की घटना को सी.एन. अन्नादुरै की द्रविड़नाडु अखबार में छपी यह आलोचना सही साबित करती है। इसके अलावा टाइम मैगजीन में छपी रिपोर्ट तो पहले ही सबके सामने आ चुकी है जहां 25 अगस्त 1947 के अंक में इसका उल्लेख हुआ है।

टाइम पत्रिका में इसका विस्तृत विवरण है जिसमें कहा गया है कि "'जवाहरलाल नेहरू जैसा निरीश्वरवादी व्यक्ति भी आजाद भारत का पहला प्रधानमंत्री बनने के मौके पर धार्मिक भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया। दक्षिण भारत के तंजौर से हिंदू संतों के संन्यासी पंथ के प्रमुख श्री अंबलावना देसीगर के दो संदेशवाहक आए। अंबलावना को लगा कि एक असली भारतीय सरकार के पहले भारतीय मुखिया के तौर पर नेहरू को किसी प्राचीन राजा की तरह एक हिंदू संतों के हाथों सत्ता का प्रतीक ग्रहण करना चाहिए।" अन्य विवरण प्रस्तुत करने के बाद टाइम मैगजीन अंत में लिखता है "एक संन्यासी के हाथ में एक 5 फीट लंबा और दो इंच मोटा राजदंड था। उन्होंने नेहरू पर तंजौर से लाया गया पवित्र जल छिड़का और नेहरू के माथे पर पवित्र भभूत का तिलक लगाया। इसके बाद उन्होंने नेहरू को पीतांबरम ओढ़ाया और उन्हें राजदंड दिया।"

इन प्रमाणों के बाद भी अगर कोई सेंगोल के राजदंड होने से इंकार करता है तो निश्चय ही यह वही वैचारिक पूर्वाग्रह है जिसके कारण यह राजदंड कई दशक तक म्यूजियम में बंद रहा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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