New CMs: अटल-आडवाणी युग के नेताओं को मोदी ने किया दरकिनार

भारतीय जनता पार्टी ने थोड़ी देर जरुर लगाई, लेकिन अब तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री तय हो चुके हैं। कांग्रेस ने तेलंगाना में मुख्यमंत्री तय करते समय देर नहीं लगाई। लेकिन इसमें से ही कुछ समझने की जरूरत है। कांग्रेस ने चुनाव नतीजों के तुरंत बाद यह स्वीकार कर लिया कि तेलंगाना में उसकी जीत का कारण राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खड़गे नहीं, बल्कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रेवंत रेड्डी हैं। जिन्होंने प्रदेश अध्यक्ष बनते ही पार्टी को के. चन्द्रशेखर राव के विकल्प के रूप में लाकर खड़ा कर दिया था। रेवंत रेड्डी कांग्रेस पृष्ठभूमि के नहीं हैं, वह इस से पहले तेलुगु देशम पार्टी में थे और छात्र जीवन में संघ के छात्र संगठन विद्यार्थी परिषद से जुड़े थे।

दूसरी तरफ तीनों राज्यों में भाजपा को जिताने का श्रेय सीधे नरेंद्र मोदी को दिया गया है। भाजपा ने इन तीनों राज्यों में पनपी गुटबाजी से निजात पाने के लिए किसी भी चेहरे को सामने रख कर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान तीनों ही राज्यों में पार्टी लंबे समय से गुटबाजी का शिकार थी। गहन विचार विमर्श के बाद फैसला हुआ था कि गुटबाजी को खत्म करने के लिए किसी व्यक्ति विशेष के चेहरे पर चुनाव लड़ने के बजाए पार्टी अपनी जड़ों में लौटे और सिर्फ चुनाव निशान को आगे किया जाए।

 Atal-Advani era

जब कमल के निशान पर चुनाव लड़ने का फैसला हुआ था, तभी यह तय हो गया था कि इन तीनों राज्यों में आमूल चूल परिवर्तन की जरूरत है। चुनावों से पहले जब मध्यप्रदेश में दो केन्द्रीय मंत्रियों सहित छह सांसदों को टिकट दिया गया, तो मीडिया में इसका मतलब यह निकाला गया कि इनमें से कोई शिवराज सिंह चौहान का विकल्प बनेगा। राजस्थान में भी जब छह सांसदों को टिकट दिया गया तो वहां भी यही अटकल लगाई गई कि इनमें से कोई वसुंधरा राजे का विकल्प बनेगा।

छत्तीसगढ़ में भी एक केन्द्रीय मंत्री सहित चार सांसद भेजे गए थे। लेकिन इनमें से किसी को भी मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। भाजपा को तीनों ही राज्यों में मुख्यमंत्री तय करने में आठ दिन लग गए। इससे यह भी साबित हुआ कि भाजपा ने पहले यह तो तय किया था कि आमूलचूल परिवर्तन करना है, लेकिन यह तय नहीं किया था कि स्थापित चेहरों का विकल्प कौन होगा। छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय आदिवासी, मध्यप्रदेश में ओबीसी मोहन यादव और राजस्थान में ब्राह्मण भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला हो चुका है।

इनमें से किसी के भी मुख्यमंत्री बनने का किसी को कोई अंदाज तक नहीं था। ये तीनों को भी अनुमान नहीं था कि वे मुख्यमंत्री बन सकते हैं। भजन लाल शर्मा तो पहली बार ही विधायक बने हैं। भाजपा के तीनों मुख्यमंत्रियों की विशेषता यह है कि वे संघ पृष्भूमि के हैं, और तीनों ही विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे हैं। विद्यार्थी परिषद इस बात पर गर्व कर सकती है कि पांच राज्यों में चुनाव हुए और चार राज्यों में उसके कार्यकर्ता मुख्यमंत्री पद पर पहुंचे।

Ajay Setia

भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाते समय जातियों को साधने की रणनीति के तहत प्रतिनिधित्व दिया है, लेकिन चुनावों से पहले महिला सशक्तिकरण का जो संदेश मोदी दे रहे थे, वह थोड़ा धुंधला जरुर पड़ा है, क्योंकि कोई महिला मुख्यमंत्री भी नहीं बनाई गई। महिला उप मुख्यमंत्री भी सिर्फ राजस्थान में दीया कुमारी बनाई गई हैं। छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश में महिला उपमुख्यमंत्री नहीं बनाई गई।

नए मुख्यमंत्रियों का नाम सामने आने के बाद यह भी साफ़ हो गया कि भाजपा ने अपने 21 सांसदों को राज्यों में मौजूदा नेतृत्व के विकल्प के तौर पर नहीं भेजा था। भाजपा ने विधानसभा चुनावों के बहाने लोकसभा चुनावों के उम्मीदवारों की भी छंटाई कर ली। भाजपा ने तीनों ही राज्यों में नया नेतृत्व उभारने का फैसला कर लिया था।

बड़े पैमाने पर सांसद और नए चेहरे उतार कर भाजपा यह संदेश देने में कामयाब हो गई थी कि भाजपा पुराने चेहरों को मुख्यमंत्री पद नहीं सौंपेगी। उसका असर चुनाव नतीजों में देखने को मिला, भले ही वसुंधरा राजे, शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह तीनों ही विधानसभा चुनाव जीते, लेकिन किसी को भी मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। इन तीनों को हटाए जाने के बाद 2014 से पहले का यानी अटल-आडवानी के जमाने के छत्रपों को हटाने का काम लगभग पूरा हो गया है। भाजपा अब नए नेतृत्व के साथ 2024 के लोकसभा चुनावों में उतरेगी। भाजपा विरोधी इस बात को कभी समझ ही नहीं सकेंगें कि भारतीय जनता पार्टी ने जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू की थी, तभी उसने लोकसभा चुनाव की तैयारी भी साथ ही शुरू कर दी थी।

भारतीय जनता पार्टी ने इन तीनों राज्यों के मुख्यमंत्री तय कर के यह संदेश भी दिया है कि वह किसी एक चुनाव को हार-जीत की दृष्टि से ही नहीं देखती, हार हो या जीत, उसी में से भविष्य की रणनीति भी निकालती है। देश का शायद ही कोई पत्रकार या राजनीतिक विश्लेषक होगा, जिसने मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाने को उतरप्रदेश बिहार में चुनाव जीतने की रणनीति के तौर पर नहीं समझा होगा। लेकिन जब मोहन यादव को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया था, क्या तब किसी ने सोचा था कि भाजपा मध्यप्रदेश के रास्ते उत्तर प्रदेश बिहार की राजनीति का रास्ता निकाल लेगी।

लोग तेलंगाना में कांग्रेस की जीत को भाजपा की हार के रूप में भी देख सकते हैं, लेकिन भाजपा उसे बड़ी उपलब्धि के रूप में देख रही है। पिछले विधानसभा चुनावों में उसे एक सीट और सात प्रतिशत वोट मिले थे, लोकसभा चुनावों में उसे चार सीट और 19 प्रतिशत वोट मिले थे, अब आठ विधानसभा सीट और 14 प्रतिशत वोट मिले हैं।

लोकसभा चुनाव हमेशा विधानसभा चुनावों से अलग होते हैं। जब विधानसभा चुनाव में सात प्रतिशत वोट पा कर भाजपा ने लोकसभा में 19 प्रतिशत वोट और चार सीटें हासिल कर ली थीं, तो इस बार विधानसभा में 14 प्रतिशत वोट हासिल करने के बाद उसके वोट और सीटें बढ़ाने की संभावना ज्यादा बढ़ जाएगी। मीडिया और कांग्रेस चुनावों के नतीजों को उस दृष्टिकोण से देख और समझ नहीं पाता, जिस दृष्टि से भाजपा के रणनीतिकार समझते हैं, और उसी के अनुरूप अगले चुनाव की रणनीति में जुट जाते हैं। जो लोग यह समझते हैं कि भाजपा को पिछले लोकसभा चुनावों में कर्नाटक से मिली 25 और तेलंगाना में मिली चार सीटें घटेंगी, वे अपने विश्लेषण में जरा जल्दबाजी कर रहे हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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