Tamil Nadu Governor: मोदी कहां से ढूंढ कर लाए तुगलक?

देश में राज्यपालों की भूमिका पर विवाद नया नहीं हैं, लेकिन तमिलनाडु में राज्यपाल ने जो कुछ किया है और कर रहे हैं, वह अवांछित है।

Tamil Nadu Governor rn ravi where did Modi find Tughlaq

कुछ लोग मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों से कोई गलत काम नहीं हो सकता। क्या वह भगवान हैं, जो कोई गलत काम नहीं कर सकते? आखिर वह भी सलाहकारों की सूचना पर ही काम करते हैं। अगर सलाहकार अपने एजेंडे को आगे बढाते रहें, तो जरूरी नहीं है कि हर बात नरेंद्र मोदी को समझ आ ही जाए। जैसे तमिलनाडु के राज्यपाल आर. एन. रवि की नियुक्ति, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने अपने एजेंडे के तहत आगे बढ़ाया। डोभाल ने आईबी में अपने जूनियर रह चुके आर. एन. रवि को पहले अपना उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया, फिर छोटे से राज्य नगालैंड में राज्यपाल बनवा कर भेज दिया। और मौक़ा मिलते ही तमिलनाडु जैसे बड़े और संवेदनशील राज्य में राज्यपाल बनवा कर भेज दिया।

आर. एन. रवि एक तानाशाह की तरह व्यवहार कर रहे हैं। उनकी हालत यह है, जैसे अंधे के हाथ बटेर लग गया हो। तमिलनाडु में अपने अभिभाषण में उन्होंने मनमाने ढंग से राज्य का नाम ही बदल डाला। आर. एन. रवि ने अपने अभिभाषण में "तमिलनाडु" की जगह पर राज्य को तमिझगम कह कर संबोधित किया। तमिलनाडु का अर्थ है तमिलों का राष्ट्र और तमिझगम का अर्थ है तमिलों का निवास।

राज्यपाल रवि को आपत्ति है कि किसी राज्य के नाम में राष्ट्र कैसे हो सकता है। इसलिए वह राज्य का नाम अपने मनमाने ढंग से रखेंगे, क्या यह उनके अधिकार क्षेत्र में है? राज्य का नाम तमिलनाडु है, वह कैसे बदल सकते हैं? क्या राज्यपाल संविधान से ऊपर हैं, क्या वह संसद और निर्वाचित विधानसभा से ऊपर हैं?

तमिलनाडु नाम रखने का अपना इतिहास है। मद्रास राज्य के विभाजन के बाद नए राज्य बने तो तमिलों ने राज्य का नाम तमिलनाडु रखने के लिए लंबा संघर्ष किया था। तब कांग्रेस भी सहमत नहीं थी, लेकिन तमिलों के सामने इंदिरा गांधी को भी झुकना पड़ा था। लंबे संघर्ष के बाद राज्य विधानसभा ने 1967 में तमिलनाडु नाम सर्वसम्मति से तय किया था, संसद ने भी इसे सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी।

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राज्यपाल को कोई भी बात कहने से पहले उसका इतिहास तो पढ़ लेना चाहिए था। वह चमड़े के सिक्के चलाने वाले तुगलक की तरह व्यवहार कर रहे हैं। राज्य विधानसभा से पहले पोंगल के अवसर पर भी उन्होंने तमिझगम शब्द का इस्तेमाल किया था। राजभवन में आयोजित कार्यक्रम के लिए उन्होंने जो निमंत्रण पत्र भेजे थे, उन पर तमिलनाडु के राज्यपाल की जगह तमिझगम का राज्यपाल लिखा था। राज्य के प्रतीक चिन्ह की जगह भी उन्होंने राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का इस्तेमाल किया था।

स्वाभाविक रूप से इस पर राज्य में तीव्र प्रतिक्रिया होनी थी और वह हुई। सिर्फ डीएमके ही नहीं, बल्कि विपक्षी दल अन्ना द्रमुक ने भी इस पर विरोध जताया। पुलिसिया दिमाग वाले राज्यपाल महाराज का कहना है कि "नाडु" शब्द से अलगाववाद की बू आती है। उन्हें शायद तमिलनाडु के अलगाववाद का इतिहास मालूम नहीं, और अगर मालूम है और इसके बावजूद उन्होंने यह हरकत की है तो प्रधानमंत्री को उन्हें तुरंत बर्खास्त कर देना चाहिए। क्योंकि उनकी हरकतों से तमिलनाडु में अलगाववाद फिर भड़क उठेगा, जिसे संभालना मोदी सरकार के बस में नहीं होगा।

राज्यपाल ने दूसरी हिमाकत यह की है कि उन्होंने अभिभाषण से वे अंश हटा दिए जिनमें तमिल संस्कृति और परंपरा का गुणगान था। तमिलनाडु भारत का हिस्सा है और उसकी संस्कृति एवं परंपरा देश के लिए गौरव की बात है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति खुद अनेकों बार तमिल संस्कृति और तमिल भाषा के प्राचीनतम इतिहास की तारीफ़ कर चुके हैं। राज्यपाल क्योंकि मनमाने ढंग से अभिभाषण को पढ़ रहे थे, इसलिए मुख्यमंत्री को पूरा अधिकार था कि वह राज्यपाल को टोकते। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने विधानसभा में मूल अभिभाषण को ही रिकार्ड में रखने का प्रस्ताव पास करवा कर अपनी सरकार की गरिमा को बचाने का काम किया, जो उनका अधिकार और कर्तव्य भी था।

राज्यपाल/राष्ट्रपति सरकार का लिखा हुआ अभिभाषण ही पढ़ते हैं। क्या राज्यपाल रवि राष्ट्रपति से भी ऊपर हो गए? केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार, अभिभाषण सरकार ही तैयार करती है। उस अभिभाषण में सरकार का एजेंडा और सरकार की विचारधारा का प्रकटीकरण होता है। राष्ट्रपति और राज्यपाल को उसे ही हू-ब-हू पढना होता है। अगर राष्ट्रपति या राज्यपाल को किसी बात पर आपत्ति हो तो वह अधिकारियों के माध्यम से पत्रव्यवहार करके सरकार से बात कर सकते हैं, लेकिन उन्हें पढना वही पड़ेगा, जो सरकार ने भेजा हो।

अलग दल की राज्य सरकारों से राज्यपालों का टकराव नया नहीं है। हाल ही तक जगदीप धनखड़ का भी ममता बनर्जी से आए दिन टकराव होता था, जब वे बंगाल के राज्यपाल थे। लेकिन तमिलनाडु में जो कुछ हो रहा है, वह राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात थी।

तमिलनाडु के वोटरों ने डीएमके को सत्ता सौंपी है। राज्यपाल वहां राष्ट्रपति के प्रतिनिधि और संविधान के संरक्षक मात्र हैं। उस अभिभाषण में न तो कुछ केंद्र सरकार के खिलाफ था, न संविधान के खिलाफ था। इसके अलावा उन्होंने विधानसभा की परंपरा को तोड़ते हुए, राष्ट्रगान हुए बिना ही सदन से वाकआउट कर दिया। यह भी तमिलनाडु के इतिहास में पहली बार हुआ है।

देश में राज्यपालों की भूमिका पर विवाद नया नहीं हैं, लेकिन तमिलनाडु में राज्यपाल ने जो कुछ किया और कर रहे हैं, वह अवांछित है। बिहार के मूल निवासी और केरल काडर के आईपीएस अधिकारी रहे रवींद्र नारायण रवि तमिलनाडु के राज्यपाल के रूप में जिन विवादों का कारण बन रहे हैं, वह केंद्र सरकार की गरिमा को भी घटा रहे हैं। वह राज्य विधानसभा से पारित 21 बिलों पर कुंडली मार कर बैठे हैं, या तो उन्हें बिल पास करने चाहिए या वापस भेजने चाहिए। अगर बिलों में कुछ संवैधानिक आपत्ति है तो वह उन्हें राष्ट्रपति को भेज सकते हैं, उनके पास चौथा विकल्प ही नहीं है। वह असीमित समय के लिए बिलों को अपने पास कैसे रख सकते हैं।

भाजपा के नेता और कार्यकर्ता हताश हैं कि पार्टी के पास प्रेम कुमार धूमल, उमा भारती, रमेश पोखरियाल निशंक, रमन सिंह जैसे अनुभवी पूर्व मुख्यमंत्री, रवि शंकर प्रसाद, प्रकाश जावडेकर और मुख्तार अब्बास नकवी जैसे पूर्व केन्द्रीय मंत्री मौजूद हैं| इसके बावजूद पूर्व ब्यूरोक्रेट्स को राज्यपाल और उपराज्यपाल बनाया जा रहा है। लेकिन भाजपा का कल्चर चुप्पी साधने का बन चुका है।

भाजपा के नेता और कार्यकर्ता इस बात पर भी कसमसा कर रह जाते हैं कि उनकी उपेक्षा करके ब्यूरोक्रेट्स को न सिर्फ लोकसभा और विधानसभाओं के टिकट दिए जा रहे हैं, बल्कि उन्हें केंद्र और राज्यों में मंत्री और राज्यपाल तक बनाया जा रहा है। जबकि इससे पहले कांग्रेस के राज में अधिकांशतया पूर्व मुख्यमंत्रियों या पूर्व केन्द्रीय मंत्रियों को ही राज्यपाल बनाया जाता था।

अब आप लंबी सूची देखिए। अरुणाचल प्रदेश और मेघालय के राज्यपाल बी.डी. मिश्रा पूर्व ब्रिगेडियर हैं। उत्तराखंड के राज्यपाल गुरमीत सिंह पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल हैं। अंडमान निकोबार के उपराज्यपाल एडमिरल डीके जोशी भी पूर्व सैनिक अधिकारी हैं। लद्दाख के उपराज्यपाल राधाकृष्ण माथुर और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सी.वी. आनंद बोस रिटायर्ड आईएएस अफसर हैं। तमिलनाडु के राज्यपाल रविन्द्र रवि 1976 बैच के आईपीएस आफिसर हैं| इस तरह चार राज्यों में पूर्व सैनिक, दो राज्यों में पूर्व आईएएस और एक राज्य में पूर्व आईपीएस राज्यपाल की भूमिका में हैं। इनके अलावा दिल्ली के उप राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना भी राजनीतिक परिवेश से नहीं हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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