ईवीएम के नाम पर अराजकता फैलाने की कोशिश नाकाम

EVM VVPAT: सुप्रीमकोर्ट की दो जजों की बेंच ने बैलट बॉक्स के जरिए चुनाव करवाने या सभी बूथों पर वीवीपेट (वोटर वेरिफिकेशन पेपर ऑडिट ट्रेल) लगा कर सभी वीवीपेट पर्चियों की गिनती करवाने की दोनों याचिकाएं खारिज कर दी हैं|

याचिका में मांग की गई थी कि वीवीपेट की पर्ची वोटर को उसके हाथ में थमानी चाहिए, जिसे वह बैलट बॉक्स में डाले| सुप्रीमकोर्ट ने सभी बूथों पर वीवीपेट लगाने और पर्ची वोटर को थमाने की मांग भी ठुकरा दी|

supreme court over EVM VVPAT

आज जो भारतीय जनता पार्टी वोटिंग मशीनों की जोरदार वकालत करती दिखाई देती है, उसने भी 2009 का चुनाव हारने के बाद वोटिंग मशीनों पर सवाल उठाए थे| प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस 2014 का चुनाव हारने के बाद लगातार वोटिंग मशीनों से चुनाव पर सवाल उठाती रही है।

हालांकि सुप्रीमकोर्ट के फैसलों और राजनीतिक दलों की मांग पर 2014 में पहली बार आठ लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में वीवीपेट भी लगाई गई थी, जिसने ईवीएम मशीनों के सुरक्षित होने की पुष्टि की थी| इसके बाद वीवीपेट को हर विधानसभा क्षेत्र के चार बूथों पर लगाया जा रहा है| इलेक्ट्रॉनिक मशीनों की निर्माता कंपनियों इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड हैदराबाद और भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड बेंगलुरु ने बार बार कहा है कि उनकी बनाई इलेक्ट्रॉनिक मशीने पूरी तरह विश्वसनीय और सुरक्षित हैं|

supreme court over EVM VVPAT

चुनाव आयोग और निर्माता कंपनियां हर आशंका का निवारण करती रही, जैसे मशीनों को न हैक किया जा सकता है, न उनमें कोई छेड़छाड़ की जा सकती है| ईवीएम में रेडियो फ्रिक्वेंसी ट्रांसमिशन डिवाईस की कोई सुविधा नहीं है कि कोई गड़बड़ी की जा सके| इसके बावजूद विभिन्न राजनीतिक दल इस पर सवाल उठाते रहे|

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का ट्रायल अस्सी के दशक में शुरू हो गया था, जिसका इस्तेमाल सबसे पहले 1982 में केरल की परूर विधानसभा सीट पर 50 मतदान केन्द्रों पर हुआ था| इस पर जब कई कानूनी सवाल उठाए गए तो सुप्रीमकोर्ट ने उस चुनाव को खारिज कर दिया था| 1989 में संसद से जन प्रतिनिधित्व क़ानून में संशोधन करके ईवीएम के इस्तेमाल का रास्ता खोला गया| 1993 में खुद कांग्रेस सरकार ने नोटिफिकेशन जारी किया| इसके बाद भी 1998 में ईवीएम पर राजनीतिक सहमति बनी, तब मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की 25 विधानसभा सीटों पर पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल हुआ था|

2014 के बाद से विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस वोटिंग मशीनों के जरिए चुनाव करवाने की प्रक्रिया बंद करके बैलट बॉक्स से चुनाव करवाने की पुरानी प्रक्रिया शुरू करने की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस ने मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी लड़ाई लड़ने का जिम्मा सौंपा हुआ था| इंडी एलायंस बनने के बाद दिल्ली में शरद पवार के घर पर हुई कोर कमेटी की बैठक में दिग्विजय सिंह की रहनुमाई में एक कमेटी बनी थी, जिसने चुनाव आयोग से मुलाक़ात कर अपनी आशंकाएं एक बार फिर उठाने का फैसला किया था| लेकिन चुनाव आयोग ने उन्हें मिलने का वक्त नहीं दिया तो विपक्ष ने इसे एक राजनीतिक मुद्दा बना लिया था|

सुप्रीमकोर्ट में दो तरह की याचिकाएं दाखिल की गई थीं| एक याचिका तो यह थी कि वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल ही बंद किया जाए और दुबारा बैलट बॉक्स के जमाने में लौटा जाए, जैसे अभी भी अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपियन देशों में चुनाव होते हैं| जबकि सच्चाई यह है कि दुनिया भर के देशों में ईवीएम से चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है, कई देशों में इसे प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया है|

सुप्रीमकोर्ट में ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल सिर्फ राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि एडीआर जैसे एनजीओ संगठन भी उठा रहे हैं| एडीआर ने ही अपनी याचिका में सभी वोटिंग मशीनों के साथ वीवीपेट लगा कर उनसे निकली पर्चियों की गिनती भी करने की मांग की थी| सुप्रीमकोर्ट ने दोनों याचिकाएं तो खारिज कर दीं, लेकिन विपक्ष की आशंकाओं को दूर करने के लिए चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले हर विधानसभा क्षेत्र के 5 प्रतिशत बूथों पर वीवीपेट मशीनें लगाई जाएँगी| पहली मई 2024 के बाद वीवीपेट मशीनों पर चुनाव निशान लोडिंग यूनिट्स को जस का तस सुरक्षित रखा जाएगा, जिन पर उम्मीदवार या उनका प्रतिनिधि दस्तखत करेगा|

साथ ही, चुनाव नतीजा घोषित होने के 45 दिन बाद तक वोटिंग मशीनों और वीवीपेट के चुनाव निशान लोडिंग यूनिट को सुरक्षित रखा जाएगा| ताकि अगर सबसे ज्यादा वोट हासिल करने वाले पहले तीन उम्मीदवारों में कोई उम्मीदवार सात दिन के भीतर चुनौती देता है, तो ईवीएम मशीन की निर्माता कंपनी के इंजीनियर उन मशीनों की जांच कर सकें| जांच का सारा खर्चा शिकायतकर्ता उम्मीदवार को उठाना होगा, लेकिन अगर उसकी शिकायत सही पाई गई तो खर्चा उसे लौटा दिया जाएगा|

जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता ने 18 अप्रेल को सुनवाई पूरी कर ली थी, लेकिन इन दोनों जजों ने चुनाव आयोग से कुछ तकनीकी सवाल पूछे थे, उनका जवाबी मिलने के बाद 26 अप्रेल को फैसला सुना दिया| क्योंकि 45 दिन तक डाटा सीलबंद सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया है इसका मतलब यह हुआ कि पहले दो चरणों में हुई वोटिंग वाले क्षेत्रों पर चुनाव आयोग का फैसला लागू नहीं हो सकता| सुप्रीमकोर्ट ने वोटिंग मशीन और वीवीपेट पर चुनाव निशान के साथ बारकोड जोड़ने की संभावना पर विचार करने को कहा है|

जस्टिस दत्ता ने अपने अलग से लिखे फैसले में बिना किसी राजनीतिक दल का नाम लिए कहा कि आँख मूंद कर चुनाव प्रणाली पर सवाल उठाना सही नहीं है, इससे बिना वजह अनुचित संदेह पैदा हो सकता है| कोई ठोस सबूत हो, तभी सवाल उठाए जाने चाहिए| जस्टिस दत्ता ने रचनात्मक सोच की बात भी कही है| जबकि सुनवाई के दौरान एडीआर के वकील प्रशांत भूषण ने अपनी दलीलों के दौरान भारत की चुनाव प्रणाली को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने की कोशिश की| समाज के एक वर्ग में यह धारणा बन रही थी कि वोटिंग मशीनों पर सवाल उठा कर देश में अराजकता फैलाने की कोशिश की जा रही है| हालांकि सुप्रीमकोर्ट ने अपनी जजमेंट में ऐसी आशंका तो पैदा नहीं की, लेकिन जस्टिस दत्ता की टिप्पणी उसी ओर इशारा करती है|

इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों के जरिए चुनावों को लेकर 2014 से ही सवाल उठा रही कांग्रेस इस बीच मध्यप्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश जैसे कई राज्यों में विधानसभा चुनाव जीती, आम आदमी पार्टी भी इन्हीं वोटिंग मशीनों के जरिए हुए मतदान में पंजाब और दो बार दिल्ली में भारी बहुमत से विधानसभा चुनाव जीती है|

इसके बावजूद चुनाव आयोग को चुनौती देते हुए आम आदमी पार्टी ने एक बार दिल्ली विधानसभा में वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी की आशंकाओं का प्रदर्शन किया, जिसमें एक डुप्लीकेट वोटिंग मशीन का इस्तेमाल किया गया था| उसके बाद जब चुनाव आयोग ने दिल्ली विधानसभा में डुप्लीकेट मशीन से गड़बड़ी की आशंका दिखाने वाले विधायक (जो अब मंत्री हैं) सौरभ भारद्वाज को आयोग में बुला कर प्रदर्शन करने की चुनौती दी थी, तो वह आयोग के सामने पेश नहीं हुए थे| जो दूसरे दलों के नेता, वकील और इंजीनियर आयोग के सामने पेश हुए, वे ईवीएम में किसी भी गड़बड़ी का प्रदर्शन नहीं कर पाए थे|

चुनाव आयोग ने समय समय पर विपक्ष को बुला कर उनकी आशंकाओं का समाधान करने की कोशिश भी की| लेकिन यह मामला बार बार अदालतों में जाता रहा| समय समय पर कुछ सुधार भी किए गए, जैसे मशीनों के साथ वीवीपेट जोड़े गए, जहां से एक पर्ची निकलती थी, जिससे पता चलता था कि वोट किसे दिया गया| हर निर्वाचन क्षेत्र के कुछ बूथों पर इन मशीनों को लगाया जाने लगा| चुनाव आयोग ने समय समय पर इन वीवीपेट पर्चियों का मशीन के नतीजे से मिलान करके भी देखा| चुनाव आयोग को कोई खामी कहीं नहीं मिली| पिछले लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने 4 करोड़ वीवीपेट पर्चियों का मिलान किया, उसे कहीं कोई खामी नहीं मिली थी|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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