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Hill Area: खोदते खोदते क्या एक दिन खो जाएंगे पहाड़?

Hill Area: सिल्कयारा सुरंग धंसाव की घटना से पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील हिमालयी इलाकों में सुरंग के निर्माण में नियमों की अनदेखी का मामला फिर से उजागर हुआ है। नवयुग कंपनी द्वारा 865 करोड़ की लागत से बनायी जा रही साढे चार किलोमीटर लंबी सिल्कयारा सुरंग के धंसने के बाद इसकी समीक्षा की मांग की जा रही है। मालूम हो कि दिवाली के दिन 41 मजदूर सिलकयारा सुरंग में फंस गए थे जिन्हें बाबा बौखनाग की असीम अनुकंपा से 17 दिनों बाद खांटी देशी तकनीक से बाहर निकाल लिया गया। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या हिमालय क्षेत्र में विकास का कोई अच्छा रोडमैप हमारे पास अभी नहीं है?

गंगा की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर गुरदास अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद जी ने कहा था कि "खोदते खोदते एक दिन खो देंगे पहाड़"। पहाड़ी क्षेत्र में चल रही परियोजनाओं को लेकर कही गई उनकी बातें सुनने वालों के कानों में खतरे की घंटी की तरह अब भी गूंजती होगी। लेकिन विकास के प्रेत ने ऐसे मायावी संसार की रचना करने को ठानी है जहां न तो यह घंटी सुनाई पड़ती है और न ही जो हो रहा है वह दिखाई पड़ता है।

Silkyara Tunnel Subsidence digging mountains will lost Hill Area

दरअसल बांधों, सड़कों, बिजली घरों और कंक्रीट और संगमरमर से बनने वाली इमारतों की चकाचौंध में यह पता ही नहीं चलता कि हम प्रकृति के साथ क्या कर रहे हैं? हम सुविधा से कब विलासिता और विनाश के दौर में प्रवेश कर जाते हैं इसका भान नहीं होता। जब कभी केदारनाथ जैसा बड़ा जल प्रलय, जोशीमठ की तरह बड़े पैमाने पर भू-स्खलन की घटना होती है तो हतप्रभ होकर हाय तौबा करते हैं, लेकिन आगे के लिए कोई सबक नहीं लेते।

उत्तरकाशी में निर्माणाधीन सुरंग के क्षतिग्रस्त होने और उसमें मजदूरों के फंस जाने की घटना के बाद पहाड़ों की अंधाधुंध विकास परियोजनाओं पर सवाल खड़े हुए हैं। ठीक है कि पहाड़ी क्षेत्र के विकास के लिए तय आधुनिक परियोजनाएं आवश्यक है लेकिन अगर यही विनाश का कारण बनने लगे तो पुनर्विचार की भी जरूरत है। हिमालय अपना रौद्र रूप दिखा हमें समय-समय पर चेताता रहता है। सरकारें भी घटना के कुछ समय तक संवेदनशीलता दिखाती हैं लेकिन फिर "वही रफ्तार बेढंगी, जो पहले थी वो अब भी है" के पुराने ढर्रे पर लौट आती है।

जून 2013 में केदारनाथ की आपदा, फरवरी 2021 में रैणी आपदा उसके बाद जोशीमठ की आपदा इसकी ताजा मिसाल हैं। दिसंबर 2014 में उत्तराखंड के हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के मसले पर सरकार ने उच्चतम न्यायालय में शपथ पत्र देकर कहा था कि विकास परियोजनाओं खासकर जल विद्युत परियोजनाओं के मामले में कोई भी फैसला ठोस वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर लिया जाएगा।

लेकिन 17 अगस्त 2021 को सरकार का रुख अचानक बदल गया। नए शपथ पत्र में पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय और उत्तराखंड सरकार के बीच सात जल विद्युत परियोजनाओं टिहरी-2 (1000 मेगावाट), तपोवन विष्णुगाड (520 मेगावाट), विष्णुगाड पीपल कोटी (444 मेगावाट), सिंगोली भटवाड़ी (99 मेगावाट), फाटाभ्युग (76मेगावाट), मद महेश्वर (915 मेगावाट) और काली गंगा-2 (111 मेगावाट) को लेकर सहमति बन गई। इनमें से अधिकांश परियोजनाएं वर्ष 2012 से लेकर 2021 तक कई बार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित डॉक्टर रवि चोपड़ा की अध्यक्षता वाली है 11 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने भी परियोजनाओं से होने वाली आपदाओं की भयावहता को प्रमुखता से रेखांकित किया तथा 23 परियोजनाओं को तत्काल रोके जाने की सिफारिश की थी।

खतरा केवल जल विद्युत परियोजनाओं से ही नहीं है, उत्तराखंड में विकास के नाम पर पहाड़ की छाती को छीलते सीमांत क्षेत्रों तक सेवा की बेहतर पहुंच और पर्यटन को बढ़ावा के नाम पर बन रही आल वेदर रोड यानी चार धाम सड़क परियोजना भी शक के दायरे में है। इसी तरह ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल परियोजना जारी है। ब्यासी रेलवे स्टेशन के पास रेलवे की सुरंग के ऊपर स्थित अटाली, सिमटोली, लोडसी, कोडवाला, भवाणी आदि गांव के घरों और खेतों में बड़ी-बड़ी दरारें आ चुकी है। अगले एक दशक में प्रदेश में 66 बड़ी सुरंगे बनाई जानी है जिनमें 18 तो बन भी चुकी है। प्रदेश सरकार की यह भी योजना है कि पहाड़ी पर्यटक स्थलों पर पहाड़ खोदकर सुरंगे बनाकर कैविटी पार्किंग बनाई जाए ताकि पर्यटक स्थलों में पार्किंग की दिक्कतों को दूर किया जा सके।

इंसान बेहतर जीवन की अभिलाषा रखता है और बेहतर जीवन स्तर विकास के बिना संभव नहीं है लेकिन पहाड़ी क्षेत्र में चल रहे नित नए निर्माण से उन इलाकों में भूस्खलन की घटनाएं और अधिक बढ़ने की आशंका है। कुछ समय पहले जोशीमठ में कई मकान धंस गए थे, सैकड़ों मकानों में दरार आ गई थी। तब वहां के लोगों ने जोशीमठ की पहाड़ी के नीचे सुरंग से होकर गुजरने वाली एनटीपीसी की तपोवन विष्णुगाड जल विद्युत परियोजना को घटना के लिए जिम्मेदार माना था। भूवैज्ञानिक भी मानते हैं कि पहाड़ों के कई शहर भूकंप के अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्र में बसे और बढ़े हैं। इसलिए ऐसी जगह पर होने वाली थोड़ी सी भी हलचल भारी तबाही मचा सकती है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनियंत्रित विकास ने पहाड़ों के कई शहरों को पहले से ही खतरे में डाल रखा है।

हाल के वर्षों में पहाड़ के लोगों ने कई आपदाएं करीब से देखी है, लेकिन उन आपदाओं से सबक नहीं ले पाए और उनके मिजाज को समझे बिना विकास परियोजनाओं को हरी झंडी देते चले गए। यही कारण है कि हमें लगातार इस तरह के संकटों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर जल विद्युत परियोजनाओं का प्रारंभ से ही विरोध होता रहा है। अधिकांश वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का मानना है कि पहाड़ों पर चलाई जा रही विद्युत परियोजनाएं भविष्य में बड़े संकट का कारण बन सकती हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में मैदानी क्षेत्र की तरह धड़ल्ले से तोड़फोड़ नहीं की जा सकती। पहाड़ी क्षेत्र का पर्यावरण पढ़ने, समझने के बाद ही परियोजनाओं को हरी झंडी दी जानी चाहिए, क्योंकि पहाड़ों पर बनने वाले बांधों से ग्लेशियरों के भी कमजोर पड़ने की तस्दीक हुई है।

पहाड़ों पर आई आपदाओं की श्रृंखला में सिल्कयारा सुरंग आपदा भी मानव निर्मित ही है। पर्वतीय संसाधनों का अत्यधिक दोहन, विकास के नाम पर अनियमित अनियंत्रित निर्माण, विभिन्न विभागों द्वारा समय-समय पर दी जा रही चेतावनियों की उपेक्षा, डरावना भ्रष्टाचार और दूसरों के जीवन की कीमत पर लाभ उठाने का क्रूर लालच ही इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार है। सूचनाएं बताती हैं कि केवल उत्तरकाशी ही नहीं बल्कि अन्य पर्वतीय नगर भी ऐसे ही आसन्न खतरे के कगार पर है।

अब सवाल है कि अब तक डरावनी लापरवाही प्रदर्शित करती रही सरकारें ऐसी आपदाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाती हैं। उत्तरकाशी ने फिर एक बार सबक दिया है जिससे सीख ली जानी चाहिए और हर स्तर पर ऐसी आपदाओं से बचने के सचेत प्रयास भी किए जाने चाहिएं। अब जबकि मजदूरों को बचा लिया गया है तो हमें ऐसी कार्ययोजना पर विचार करना चाहिए ताकि तीव्र भूकंप जोन वाले हिमालय क्षेत्र में इस तरह के हादसों का दोहराव ना हो।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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