Shiv Sena Case: सुप्रीमकोर्ट जजमेंट के कुछ अतार्किक पहलुओं पर चिंतन जरूरी
शिव सेना केस में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में कई अजीब और अतार्किक बातें कही गयी हैं। यदि राज्यपाल को यह सूचना हो कि किसी मुख्यमंत्री के पास बहुमत नहीं है तो उसे अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए कहना, कहां से गलत हो गया?

Shiv Sena Case: महाराष्ट्र में शिव सेना के विघटन, उद्धव सरकार द्वारा बहुमत खोना, उनके इस्तीफे और नई सरकार के गठन के दौरान हुई घटनाओं पर सुप्रीमकोर्ट ने अपना जजमेंट सुनाया है| इस जजमेंट में दो जगहों पर स्पीकर और राज्यपाल के निर्णयों को गलत ठहराया गया है| लेकिन इन दोनों ही जगहों पर स्पीकर और राज्यपाल ने अब तक चली आ रही परंपराओं के आधार पर ही फैसले लिए थे| सुप्रीमकोर्ट के जजमेंट में इन दोनों ही मामलों में नया नियम प्रतिपादित किया गया है| इसलिए पुरानी परंपराओं के अनुसार लिए गए स्पीकर और राज्यपाल के फैसलों की आलोचना पूरी तरह राजनीतिक लगती है|

सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का सार यह है कि शिंदे सरकार को सदन का बहुमत हासिल है, लेकिन राज्यपाल और स्पीकर की भूमिका संदिग्ध थी| यह अपने आप में अतार्किक बात है कि जब मौजूदा सरकार क़ानून सम्मत है, तो स्पीकर और राज्यपाल की भूमिका कैसे संदिग्ध हो सकती है| कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्यपाल का एकनाथ शिंदे को सरकार बनाने के लिए न्योता देना और उन्हें शपथ दिलाना क़ानून सम्मत था। बात यहीं पर खत्म हो जाती है कि उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा दिया और क़ानून सम्मत वैकल्पिक सरकार का गठन हो गया|
सुप्रीमकोर्ट ने राज्यपाल की ओर से उद्धव ठाकरे को बहुमत साबित करने के लिए कहना गैर कानूनी बताया है| पहली बात तो यह है कि राज्यपाल का काम यह देखना होता है कि उसकी सरकार को सदन का बहुमत हासिल है या नहीं| भारत के संविधान के मुताबिक़ सरकार राज्यपाल की होती है| इसलिए जब भी राज्यपाल को लगता है कि उसकी सरकार को सदन का बहुमत हासिल नहीं है, तो वह मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने को कह सकता है, और वही राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने किया था|
अब तक जहां जहां दलबदल हुआ और राज्यपाल के पास मामला पहुंचा, राज्यपाल यही करते रहे थे और भगत सिंह कोश्यारी ने भी वही किया| सुप्रीमकोर्ट ने राज्यपाल पर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी पार्टी की अंदरुनी झगड़े में पड़ना राज्यपाल का काम नहीं, उनकी जिम्मेदारी संविधान की सुरक्षा करने की थी| सुप्रीमकोर्ट का यह कथन तार्किक नहीं है, क्योंकि संविधान की सुरक्षा तो तभी हो सकती थी, जब उनकी सरकार को सदन का बहुमत हासिल हो|
जब राज्यपाल खुद आशंकित हो जाएं कि उनकी सरकार को सदन में बहुमत हासिल है या नहीं, और उनके पास पर्याप्त सबूत आ जाएं कि उनकी सरकार को सदन में बहुमत हासिल नहीं है, तो मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने के लिए कहना राज्यपाल की सवैधानिक जिम्मेदारी और अधिकार दोनों हैं, और भगत सिंह कोश्यारी ने इसी का निर्वहन किया| एकनाथ शिंदे की तरफ से कोर्ट में केस लड़ने वाले पूर्व सॉलीसिटर जनरल हरीश साल्वे का कहना है कि वह सुप्रीमकोर्ट के उस तर्क से सहमत नहीं है कि राज्यपाल के पास पर्याप्त मेटीरियल नहीं था कि उद्धव ठाकरे सदन का विश्वास खो चुके हैं| उन्होंने कहा कि संविधान ने जो जिम्मेदारी राज्यपाल को दी हुई है, भगत सिंह कोशियारी उसी का पालन कर रहे थे और आज तक यही परंपरा थी|
अब सुप्रीमकोर्ट का यह कहना कि किसी पार्टी की कलह में राज्यपाल को दखल नहीं देना चाहिए, यह राज्यपाल के अधिकारों को कम करना और लोकतंत्र का गला घोंटने जैसा है| सभी राजनीतिक दल अपनी बात राष्ट्रपति और राज्यपाल के सामने रखते हैं, और वे उनका निवारण करते हैं। सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद तो राष्ट्रपति और राज्यपाल कभी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने के लिए कह ही नहीं सकते, क्योंकि ऐसी स्थिति तो सत्ताधारी पार्टी में बगावत के कारण ही पैदा होती है|
अगर अब सुप्रीमकोर्ट कहता है कि राज्यपाल का शिवसेना की अंदरुनी कलह के कारण उद्धव ठाकरे को बहुमत साबित करने के लिए कहना गैर कानूनी था, तो सुप्रीमकोर्ट को यह जवाब देना पड़ेगा कि उसने तब उद्धव ठाकरे की याचिका पर राज्यपाल के निर्देश को खारिज क्यों नहीं किया| उद्धव ठाकरे ने तो तभी इस्तीफा दिया, जब सुप्रीमकोर्ट ने राज्यपाल के निर्देश पर रोक नहीं लगाई| यह तो चित भी मेरी पट भी मेरी वाली बात हो गई|
सुप्रीमकोर्ट ने कहा है कि यदि उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा न दिया होता, तो कोर्ट उन्हें बहाल करने पर विचार कर सकता था| कोर्ट के कहने का मतलब यह है कि जैसे 2016 में उसने नबाम तुकी को अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर बहाल किया था, वैसे ही उद्धव ठाकरे को बहाल करने पर विचार कर सकता था| अब यह कितना अतार्किक है कि इस जजमेंट में सुप्रीमकोर्ट ने 2016 के अपने उसी जजमेंट की समीक्षा करने के लिए सात सदस्यीय बेंच को भेजा है, लेकिन यह भी कह रहा है कि वह 2016 के उसी फैसले के आधार पर सदन में हारे मुख्यमंत्री (अगर उद्धव ठाकरे सदन में हारते तो) को बहाल करने की सोच सकता था|
सुप्रीमकोर्ट के उस फैसले के कारण अरुणाचल प्रदेश के सदन में बहुमत हासिल कर चुके मुख्यमंत्री कालीखो पुल को हटा दिया गया था और नबाम तुकी को बहाल कर दिया था| सुप्रीमकोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच के फैसले के कारण नबाम तुकी दुबारा मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन तीन दिन बाद ही इस्तीफा देना पड़ा था, क्योंकि उनके पास बहुमत नहीं था| तो सुप्रीमकोर्ट की पांच जजों की बेंच का वह बेहद बेतुका फैसला सिद्ध हुआ था|
सुप्रीमकोर्ट की पांच जजों की बेंच के उस फैसले के कारण सदन में बहुमत साबित करने के बाद मुख्यमंत्री पद से हटाए गए कालीखो पुल ने एक महीने बाद आत्महत्या कर ली थी| अपने आत्महत्या के नोट में उन्होंने लिखा था- "मुझसे और मेरे करीबियों से कई बार संपर्क किया गया कि अगर मैं 86 करोड़ रुपये देता हूं तो फैसला मेरे हक में दिया जाएगा| मैं एक आम आदमी हूं, मेरे पास न उस तरह पैसा है न ही मैं ऐसा करना चाहता हूं...'
सुप्रीमकोर्ट का वह फैसला नबाम रेबिया का फैसला कहलाता है। नबाम रेबिया तब स्पीकर थे, उन्होंने दलबदल करने वाले कांग्रेस के 14 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी| बाद में डिप्टी स्पीकर ने 14 विधायकों की सदस्यता बहाल कर दी थी और नबाम रेबिया को भी स्पीकर पद से हटा दिया गया था, सुप्रीमकोर्ट ने इस फैसले में कहा था कि अगर स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव हो तो वह दलबदल क़ानून के तहत याचिकाओं का निष्पादन नहीं कर सकता|
सुप्रीमकोर्ट के इसी फैसले का दलबदलुओं ने हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया| सुप्रीमकोर्ट के उस फैसले के हर पहलू की हमेशा आलोचना हुई है, इसलिए महाराष्ट्र के फैसले में सुप्रीमकोर्ट का यह कहना कि अगर उद्धव ठाकरे सदन में विश्वास मत हारे भी होते, तो भी वह उन्हें बहाल करने पर विचार कर सकती थी, यह उतना ही गलत है, जितना नबाम तुकी को बहाल करना गलत था, जो तीन दिन नहीं टिक पाए थे|
सुप्रीमकोर्ट ने अपने इसी फैसले में यह भी कहा है कि उन 16 विधायकों की सदस्यता को लेकर फैसला पेंडिंग पड़ा होने के बावजूद वे विधायक के नाते सदन की बैठक में हिस्सा ले सकते थे| जब वे हिस्सा ले सकते थे और वोटिंग कर सकते थे, तो उद्धव सरकार कैसे बचती और सदन में गिरी हुई सरकार को सुप्रीमकोर्ट कैसे बहाल करता? क्या अरुणाचल प्रदेश की तरह? इसलिए सुप्रीमकोर्ट का यह रेफरेंस अतार्किक और विरोधाभासी है कि अगर उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा नहीं दिया होता, तो वह उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बहाल कर देता| आखिर फैसला तो सदन को करना है, सुप्रीमकोर्ट किसी को बिना बहुमत के मुख्यमंत्री पद पर नहीं बिठा सकता| अरुणाचल प्रदेश के फैसले को भी विधानसभा ने गलत साबित कर दिया था|
सुप्रीमकोर्ट ने इसके अलावा स्पीकर राहुल नार्वेकर के उस फैसले को गलत बताया है, जिसमें उन्होंने शिंदे गुट के चीफ व्हिप भरत गोगावले को मान्यता दे दी थी, जबकि पार्टी की ओर से सुनील प्रभु चीफ व्हिप थे| सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से पहले किसी क़ानून या नियम में यह नहीं लिखा गया था कि चीफ व्हिप पार्टी तय करेगी| संसद से लेकर सभी विधानसभाओं में विधायक दल की ओर से ही चीफ व्हिप तय किए जाने की परंपरा रही है| महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर ने कहा है कि उन्होंने पूर्व की परंपराओं और सदन के रिकार्ड के मुताबिक़ ही विधायक दल की ओर से तय किए चीफ व्हिप को मान्यता दी थी|
सुप्रीम कोर्ट ने अब पहली बार अनुच्छेद 10 की व्याख्या की है| इस अनुच्छेद में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया था कि राजनीतिक दल की ओर से तय चीफ व्हिप मान्य होगा या फिर विधायक दल की ओर से तय चीफ व्हिप| अब सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि चीफ व्हिप तय करने का अधिकार पार्टी को है, तो भविष्य के लिए यह क़ानून बन गया है| इसलिए सुप्रीमकोर्ट का यह कहना कि स्पीकर का पार्टी की अनदेखी करके विधायक दल के चीफ व्हिप को मान्यता देना गलत था, यह तार्किक नहीं है, क्योंकि स्पीकर ने परंपराओं का ही पालन किया था| सुप्रीमकोर्ट को कम से कम स्पीकर कार्यालय से पहले रिकार्ड मंगवा कर देख लेना चाहिए था|
सुप्रीमकोर्ट ने दलबदल क़ानून में विधायक या सांसद की सदस्यता तय करने के स्पीकर के अधिकार को खारिज नहीं किया है| इसका मतलन साफ़ है कि 16 विधायकों की सदस्यता तय करने का अधिकार स्पीकर राहुल नार्वेकर का ही है| जब नया स्पीकर चुन लिया गया था, और उनके खिलाफ कोई अविश्वास प्रस्ताव पेंडिंग भी नहीं था, तो क्या सुप्रीमकोर्ट की ओर से डिप्टी स्पीकर पर फैसला लेने पर लगाई गई रोक को पहले ही नहीं हटा लिया जाना चाहिए था|
सुप्रीमकोर्ट के फैसले को नैतिक जीत बताते हुए उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उप मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस से नैतिकता के आधार पर इस्तीफे की मांग की है| पहली बात तो यह है कि यह फैसला उद्धव ठाकरे की नैतिक जीत नहीं है, दूसरे नैतिकता का सवाल तो खुद उन पर उठता है, जिन्होंने भाजपा से गठबंधन करके विधानसभा चुनाव लड़ा और मुख्यमंत्री पद के स्वार्थ के लिए गठबंधन तोड़ दिया, जबकि गठबंधन ने देवेन्द्र फडनवीस को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट किया था, और जनता ने उनके नेतृत्व वाले गठबंधन को बहुमत दिया था।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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