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Security Challenges for India: भारत के लिए विकट सुरक्षा चुनौतियों का साल

चीन-पाकिस्तान दोनों अपने अंदरूनी संकटों से जूझ रहे हैं। अपने नागरिकों का ध्यान बांटने के लिए वे सीमा पर भारत से टकराव बढ़ाएंगे और भारत को परेशान करने के लिए सामाजिक द्वेष, उन्माद फैलाकर नागरिकों को आपस में लड़ाया जायेगा।

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Security Challenges for India: अधिकांश विश्लेषक इस साल को भारत के लिए सम्भावनाओं का साल बता रहे हैं। जो ठीक भी है। आर्थिक स्थिति देखी जाए तो ये साल देश के लिए अच्छा रहने की सम्भावना है। पर देश की सुरक्षा के लिए ये गंभीर चुनौतियों का साल अधिक लगता है। अपने पड़ोसियों पर एक नज़र डालें तो तस्वीर कुछ साफ हो जाएगी। हमारे दोनों बड़े पड़ोसी देश यानि चीन और पाकिस्तान बड़े बड़े संकटो से घिरे हुए हैं। जब पड़ोस के घर में आग लगी हो तो उसकी तपिश से आप कैसे बच सकते हैं? और जब पड़ोसी आपके घोषित दुश्मन और चिर प्रतिद्वंदी हों तो आपकी मुश्किलें निश्चय ही बहुत बढ़ जाती हैं।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में घर के अंदर आई परेशानियों से निपटने का आजमाया हुआ फार्मूला है कि अपने लोगों का ध्यान हटाओ। इतिहास साक्षी है कि जब भी इन दोनों पड़ोसी देशों में अंदरूनी हालात बिगड़े हैं तो इन्होने अपनी जनता का ध्यान बांटने के लिये भारत के खिलाफ साजिशें बढ़ा दीं हैं। सब जानते हैं कि कोरोना के विषाणु चीन से निकल कर दुनिया में फैले। जब दुनिया में कोरोना की पहली लहर चल रही थी तो चीन से भी लाखों लोगों के प्रभावित होने की खबरें थीं। तब चीन के कम्युनिस्ट तंत्र ने इससे ध्यान हटाने के लिए गलवान व अन्य मोर्चों पर घुसपैठ बढाकर भारत से टकराव करते हुए अपने देश में भावनाएं भड़काई थीं।

इन दिनों चीन उससे कहीं गहरे संकट में फंसा है। वहां हर रोज़ दस लाख से ज़्यादा कोरोना के नए मामले आ रहे हैं। जाहिर है कि कोरोना से मरने वालों की तादाद काफी अधिक होगी। चीन में सब नागरिकों का, खासकर सभी बुजुर्गों का, टीकाकरण नहीं हुआ है। पर चीन कोविड से होने वाली विभीषिका को अपनी जनता और दुनिया से छिपा रहा है। इसकी तस्दीक अलग अलग स्रोतों से हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, जो कोरोना महामारी के दौरान चीन का पिछलग्गू बन गया था, ने भी अब चीन के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की आपातकालीन सेवाओं के निदेशक माइकेल रायन ने कहा है कि "डब्लू एच ओ मानता है कि चीन कोविड से बड़ी संख्या में हुई मौतों को छिपा रहा है।"

कुल मिलाकर चीन में पिछले कोई छह हफ़्तों से कोरोना की स्थिति विस्फोटक बनी हुई है। ये हालात इतनी जल्दी सुधरते दिखाई नहीं दे रहे हैं। चीन मुश्किल में फंस गया है। राष्ट्रपति शी जिंगपिंग कम्युनिस्ट प्रचार तंत्र के द्वारा नैरेटिव का खेल खेलने के एक माहिर खिलाड़ी हैं। मुमकिन है कि सर्दियां उतरते उतरते जैसे ही भारत-चीन सीमा पर बर्फ पिघलनी शुरू हो, वहां पीएलए उकसाने वाली कार्यवाही शुरू कर दे। दिसंबर के महीने में अरुणाचल प्रदेश के तवांग में चीनी फ़ौज की घुसपैठ की नाकाम कोशिश को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए। उत्तर पूर्वी राज्यों में देश विरोधी ताकतों को चीन बढ़ावा देने की कोशिश भी कर सकता है। वहां और चीन की पूरी सीमा पर अगले कई महीने भारत को बेहद सतर्क और मुस्तैद रहना होगा।

उधर पाकिस्तान के अंदरूनी हालात तो दिन प्रतिदिन बद से बदतर होते जा रहे हैं। पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में बस 5 बिलियन डॉलर बाकी बचे हैं। इससे पाकिस्तान सिर्फ तीन हफ्ते का ज़रूरी सामान ही विदेशों से खरीद सकता है। पाकिस्तान में आटे जैसी बुनियादी ज़रुरत की चीज़ की भी बेहद किल्लत हो गई हैं। देश के कई प्रांतो जैसे सिंध, खैबर पख्तूनवा, पंजाब और बलोचिस्तान में आटा लेने के लिए लगी कतारों में भगदड़ मचने से कई नागरिकों के मरने की ख़बरें हैं। तेल और गैस की कमी के कारण बिजली का संकट इतना गंभीर है कि बाज़ारों में रेस्टोरेंट व अन्य दुकानों को शाम आठ बजे बंद करने के आदेश दे दिए गए हैं। सरकार ने अब इस्लामाबाद में शादी की पार्टियों को भी दस बजे तक खत्म करने का एलान कर दिया है। इतनी किल्लत के बीच पाकिस्तान को दुनिया में कोई भी देश कर्ज देने को तैयार नहीं है।

उधर अफगानिस्तान और पाकिस्तान में सीमा पर कई टकराव हो चुके है। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार अब खुले आम पाकिस्तान को बुरा भला कह रही है। पाकिस्तान तो तालिबान को अपना दोस्त समझता था। उन्हीं के समर्थन से बनी तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान यानि टीटीपी ने पाकिस्तान में जिहादी हमलों की बौछार कर दी है। दिसंबर के महीने में ही कई अफसरों समेत 40 पाकिस्तानी फौजी इन हमलों में मारे गए हैं। टीटीपी ने बाकायदा एक वैकल्पिक सरकार की घोषणा कर कई इलाकों में शरिया लागू कर दिया है। पाकिस्तान की फौज ने ही तालिबान के इस जिन को पाला पोसा और बड़ा किया था। वही उसके गले की हड्डी बन गया है।

इस बीच पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति में पूर्व प्रधान मंत्री इमरान खान नाम ले लेकर सेना के अफसरों को ललकार रहे हैं। इमरान भी पाक फौज की मदद से सत्ता में आये थे लेकिन सत्ता से हटाए जाने के बाद वे फौज के नेतृत्व को अपना दुश्मन नंबर एक मानते है। इमरान खान की लोकप्रियता इन दिनों ऊंचाई पर है, सो चाहकर भी पाकिस्तानी जरनल उनके खिलाफ कुछ नहीं कर पा रहे। ये पाकिस्तानी इतिहास में पहली बार हो रहा है जब राजनीतिक सभाओं में और सोशल मीडिया में इस तरह फ़ौज के नेतृत्व को खुलेआम गालियां दी जा रही हैं। इस समय पाकिस्तान की जनता में सेना के प्रति गहरा असंतोष देखा जा रहा है।

ये जगजाहिर है कि पाकिस्तान को वहां की सेना ही चलाती है। आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा के तीनों मोर्चों पर घिरी हुई पाकिस्तानी सेना और आईएसआई अपनी जनता का ध्यान बटाने के लिए जम्मू कश्मीर और पंजाब में कुछ बड़े षड्यंत्र रच सकती हैं। पंजाब में पिछले दिनों ड्रोन के द्वारा हथियार और ड्रग्स भेजने के मामलों में अभूतपूर्व वृद्धि होना, इसकी तरफ साफ़ संकेत है। जम्मू कश्मीर की मौजूदा शांति को हर तरह से भंग करने की कोशिश आईएसआई करेगी ही। उधर पंजाब में भी भारत विरोधी खालिस्तानियों को हवा दी जाएगी।

खतरे सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि भारत के भीतर भी पॉपुलर फ्रंट जैसे प्रतिबंधित संगठनों के स्लीपिंग सेल मौजूद हैं। इन्हें सक्रिय कर साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने की पूरी कोशिश इस साल होगी। कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, नागालैंड, त्रिपुरा, मेघालय के साथ साथ माओवाद से प्रभावित रहे छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में इस साल चुनाव भी होने है। माओवादी भी पूरी तरह से परास्त नहीं हुए है। उनके शहरी समर्थक चोला बदल कर कई मुख्य पार्टियों में जा छुपे हैं। जिन आठ राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें से तकरीबन सभी सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील है। राजस्थान सीमा से लगा प्रान्त है तो कर्नाटक में सांप्रदायिक तनाव के कई मामले हो चुके हैं। पूर्वोत्तर के राज्य तो वैसे भी सुरक्षा के नजरिये से संवेदनशील रहे है। चीन और पाकिस्तान दोनों ही अपने एजेंटों द्वारा हमारे समाज की दरारों को चौड़ा करने की कोशिश करेंगे।

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    इस नाते ये साल भारत के लिए बेहद चुनौतियों का साल रहने वाला है। हमें पटरी से उतारने की कोशिश होगी। सामाजिक द्वेष, साम्प्रदायिक उन्माद और असंतोष फैलाया जायेगा। विघटनकारी शक्तियां राजनीतिक प्रतिद्वंदिता का उपयोग कर जनमानस में अपनी पैठ बनाने की कोशिश करेंगी। इसलिए भारत की सरकार और जनता, दोनों को 2023 में बहुत चौकन्ना, सतर्क और सावधान रहने की ज़रुरत है।

    यह भी पढ़ें: World Population: बढती जनसंख्या संकट है या समाधान?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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