Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

जुम्मे की छुट्टी वाली गुस्ताखी के गहरे निहितार्थ

''इस स्कूल के लिए जमीन हमारे दादा ने दी थी। इसलिए विद्यालय हमारे दादा के नाम पर होना चाहिए।'' बिहार और झारखंड में ऐसी मांगों वाले निवेदन अक्सर सरकार से किए जाते रहे हैं। कुछ मामले तो न्यायालय तक भी पहुंचे हैं। लेकिन कुछ अपवाद को छोड़ कभी भी ऐसी अप्रासंगिक और बेतुकी मांग को सरकार गंभीरता से नहीं लेती। यह सही भी है। सरकारी संस्थानों के नाम, कार्य-समय, क्षेत्राधिकार आदि के निर्धारण के लिए स्थापित नियम और कानून होते हैं। इसमें किसी बदलाव का अधिकार सरकार के अलावा किसी को नहीं होता और सरकार भी कानून के बाहर जाकर कोई बदलाव नहीं कर सकती।

schools closed on Friday jumma in jharkhand

लेकिन झारखंड में यह सब हुआ और बड़े पैमाने पर स्कूलों के नाम, कार्य-समय, व्यवस्थाएं सब बदल दिए गये। बदलाव भी ऐसे नहीं जिसे कुछ लोगों की सतही शरारत समझ कर हल्के में लिया जाये। इन बदलावों के निहितार्थ चिंताजनक है, जो कई आशंकाओं को जन्म देते हैं। अन्य आशंकाओं को अगर कुछ देर के लिए भूल भी जाएं तो यह घटना प्रथम द्रष्टया कानून के राज को सीधी चुनौती है। राज्य के संथाल परगना के जामताड़ा, दुमका आदि जिलों के कई सरकारी विद्यालयों के नाम, साप्ताहिक शेड्यूल अनाधिकृत रूप से बदल दिए गए।

कहीं विद्यालय के नाम में 'उर्दू' शब्द जोड़ दिया गया, तो कहीं रविवार के बजाय जुम्मे (शुक्रवार) को अवकाश कर दिया गया और कहीं प्रार्थना के कायदों को बदलकर इसे एक धर्म विशेष के अनुरूप कर दिया गया। और ऐसा भी नहीं है कि यह कोई पृथक और ताजा मामला हो, जिसे असामाजिक तत्वों ने अचानक से अंजाम दे दिया हो। यह सब कई विद्यालयों में लम्बे समय से चला आ रहा था। जामताड़ा के जिला शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार कुल 1084 स्कूलों में मात्र 15 उर्दू स्कूलों में शुक्रवार का अवकाश अधिकृत है। लेकिन जिले में शुक्रवार को बंद रहने वाले स्कूलों की संख्या 100 से भी अधिक है। इनमें से अधिकतर स्कूल जिले के नारायणपुर, करमाटांड और जामताड़ा प्रखंड में स्थित हैं। जिला शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में साप्ताहिक अवकाश रविवार को ही दर्शाया जाता रहा है परंतु स्कूलों में छुट्टी जुम्मे के दिन की जाती है।

हैरत की बात यह है कि इतनी सारी जानकारी मीडिया के माध्यम से सामने आने के बाद भी सरकार को अब भी नहीं मालूम ऐसा किन लोगों (संगठनों) ने किस मंशा से किया। अब जबकि बात जग-जाहिर हो गई है तो राज्य सरकार मामले की जांच कराने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही है। राज्य के शिक्षा मंत्री ने इस मुद्दे पर अब तक कोई टिप्पणी नहीं की है।

10 जुलाई को शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक कर एक सप्ताह में जांच रिपोर्ट देने का आदेश पारित करने के बाद सरकार के सारे मंत्री, उच्च शिक्षा अधिकारी सब चुप हैं। वहीं दूसरी ओर जामताड़ा के कांग्रेसी विधायक इरफान अंसारी ने इसका सीधा समर्थन करते हुए कहा कि ''शुक्रवार को इसलिए छुट्टी मिलती है क्योंकि उस दिन बच्चे नमाज पढ़ते हैं।'' इस इलाके में कथित हिंदूवादी पार्टी भाजपा की भी अच्छी पैठ है लेकिन पार्टी की ओर से किसी नेता ने कोई जोरदार विरोध दर्ज नहीं किया है। पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने एक आलोचनात्मक ट्वीट किया, लेकिन बाद में खामोश हो गए।

समूचे प्रसंग का सबसे चिंताजनक पहलू यही है। बिल्कुल योजनाबद्ध ढंग से स्कूल प्रबंधन का भयादोहन करते हुए कानून और व्यवस्था की धज्जी उड़ा दी गई। सरकार और शिक्षा विभाग मामले से अनजान नजर आ रहा है। उसे यह जानने के लिए भी जांच की आवश्यकता है कि यह सब एक समूह द्वारा बस मजहबी वर्चस्व कायम करने के लिए किया गया। इन आपत्तिजनक बदलावों के लिए उस क्षेत्र विशेष में मुस्लिम आबादी की बहुसंख्या का तर्क दिया गया और बहुसंख्यक होने को हथियार बनाकर स्कूल प्रबंधन को इन बदलावों के लिए मजबूर किया गया।

इस प्रवृत्ति को समझना कठिन नहीं है। आज देश के कई हिस्से में मजहबी कट्टरता की समस्या है। इन क्षेत्रों में से किसी एक क्षेत्र का केस स्टडी करने पर पता चलता है कि कहीं भी समस्या अचानक से 'कश्मीर' नहीं हुई। संख्या बल बढ़ने पर इसी तरह जमीनी स्तर पर वर्षों से स्थापित और मान्य परंपराओं को तोड़ने की साजिश रची गई। माइंड वाश कर पहले कुछ युवकों को कट्टर बनाया गया, फिर स्थापित मानदंडों को तोड़कर इसे धार्मिक जीत बताते हुए समाज को गुमराह किया गया। और राजनीतिक ताकत प्राप्त होते ही इलाके की डेमोग्राफी बदल दी गई।

परंपरागत तौर पर संथाल परगना की सामाजिक संरचना समावेशी रही है। लेकिन बीते कुछ दशकों में यहां बहुत ही खामोशी से चिंताजनक बदलाव हुए हैं। साहिबगंज, दुमका, गोड्डा और जामताड़ा जिले लम्बे समय से बांग्लादेशी घुसपैठियों से लेकर मानव तस्करों के निशाने पर हैं। इन जिलों की डेमोग्राफी तेजी से असंतुलित हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जामताड़ा, पाकुड़, गोड्डा और साहिबगंज जिले की सम्मिलित आबादी 2011 में करीब 41 लाख थी जिसमें मुस्लिम धर्मालंबियों की संख्या 9 लाख थी। वर्तमान में पूरे क्षेत्र में मुस्लिम धर्मालंबियों का जनसंख्या अनुपात 25 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। पाकुड़ और साहिबगंज जो बांग्लादेशी घुसपैठ से ग्रस्त है यहां मुस्लिम जनसंख्या 40 प्रतिशत के करीब पहुंचने का अनुमान है। इन क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मानव तस्करी होती है। बड़ी तादात में मुस्लिम बच्चों को इस्लामिक शिक्षा के नाम पर केरल ले जाया जाता है।

2014 में एक बड़ी घटना सामने आई थी जब इलाके के करीब 466 मुस्लिम बच्चे केरल में बरामद हुए थे। इस घटना की प्राथमिक छानबीन में पाया गया कि यह खेल एक बड़े नेटवर्क द्वारा चलाया जाता था, जिसका उद्देश्य कट्टर मजहबी युवक तैयार करना था। बाद में पता चला कि विदेशी चंदे पर केरल आदि राज्यों में चलने वाले इन मदरसों/अनाथालयों के एजेंट संथाल परगना में फैले हुए हैं। वैसे शुरुआती जांच के बाद इस मसले को ठंढे बस्ते में डाल दिया गया। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि स्कूलों के मजहबीकरण का यह प्रयास स्थानीय है। इसमें राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय कट्टरवादी इस्लामिक समूहों के शामिल होने से इनकार नहीं किया जा सकता।

जानताड़ा पहले भी अपनी साइबर ठगी के नाम पर बदनाम रहा है। इसके मूल में ऐसे ही समुदाय विशेष के लोग हैं जिन्होंने आज राष्ट्रीय स्तर पर जामताड़ा को बदनाम कर दिया है। बीते साल 2021 में 30 अगस्त को दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने जामताड़ा के 14 नौजवानों को गिरफ्तार किया था। इन पर आरोप था कि दिल्ली सहित देशभर में इन्होंने साइबर फ्रॉड के जरिए लोगों से ठगी किया है। इन लोगों ने देशभर में अलग अलग स्थानों पर 1624 साइबर क्राइम को अंजाम दिया था। गिरफ्तार किये गये इन 14 लोगों में दो गैंग थे जिसमें एक का नाम अल्ताफ अंसारी उर्फ रॉकेटमार था तो दूसरे गैंग को गुलाम अंसारी उर्फ मास्टर जी संचालित करता था।

स्पष्ट है कि झारखंड के इन इलाकों में व्याप्त गरीबी, अशिक्षा और वोट बैंक की राजनीति ने इस्लामिक कट्टरपंथी शक्तियों को फलने-फूलने का मौका दिया है। वो बहुत शातिर तरीके से यहां के साधारण लोगों में अपना शातिर एजंडा चलाने में कामयाब हो रहे हैं। तमाम संकेत बताते हैं कि स्कूलों का यह मामला कानून व्यवस्था का मसला नहीं है। यह एक मजहबी फिनोमेना है, जहां एक वर्ग विशेष के बहुसंख्यक होने पर संविधान, कानून को धता बताने के लिए अपनी मान्यताओं को प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। पाकुड़ जिले के कुछ पंचायतों में जहां शत-प्रतिशत मुस्लिम (बंगला भाषी) आबादी है, वहां के सरकारी स्कूलों का हाल अभी सामने आना बाकी है। इस प्रवृत्ति को तत्काल समझने की आवश्यकता है, क्योंकि इस प्रकरण के बाद स्वाभाविक सवाल उठता है कि क्या यह सामान्य सरकारी स्कूलों को मदरसे की राह पर ले जाने का प्रयास है?

यह भी पढ़ें: जन्मदिन पर विशेष: प्रभाष जोशी का 'कागद कारे'

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+