Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

SC on Governors: राज्यपालों पर सुप्रीमकोर्ट की सख्ती की वजह

Supreme Court comments on Governors अक्सर ऐसा होता है कि राज्यपालों का उन्हीं मुख्यमंत्रियों के साथ विवाद होता है, जहां केंद्र सरकार की विरोधी पार्टी की सरकार होती है|

तमिलनाडु के अनुभवहीन अक्खड़ राज्यपाल आर.एन. रवि के मुकाबले केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित सुलझे हुए राजनीतिज्ञ रहे हैं| यह कोई पहला मौक़ा नहीं है, जब सुप्रीमकोर्ट से राज्यपालों को फटकार पड़ रही है| केंद्र में कांग्रेस सरकारों के समय बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रोमेश भंडारी भी इसी तरह की डांट खा चुके हैं| उससे भी थोड़ा पीछे जाएं तो आंध्र प्रदेश में चुनी हुई एन.टी. रामाराव की सरकार को बर्खास्त करने के लिए ठाकुर राम लाल को बाद में इस्तीफा देना पड़ा था|

नब्बे के दशक में गोवा के राज्यपाल भानु प्रताप सिंह ने अपनी मर्जी से एक मुख्यमंत्री को बर्खास्त करके एक मंत्री को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी| बाद में उन्हें खुद राज्यपाल पद से इस्तीफा देना पड़ा था| राज्यपालों की मनमानियों के किस्से भरे पड़े हैं| कुछ राज्यपालों की मनमानियों के मामले सुप्रीमकोर्ट में जाते हैं, और कुछ के सिर्फ राजनीतिक विवाद बन कर रह जाते हैं|

SC on Governors: Reason for Supreme Courts strictness on Governors

अक्सर ऐसा होता है कि राज्यपालों का उन्हीं मुख्यमंत्रियों के साथ विवाद होता है, जहां केंद्र सरकार की विरोधी पार्टी की सरकार होती है| पंजाब, तमिलनाडु, बंगाल और केरल हाल ही के विवादों के ताज़ा उदाहरण हैं| इन सभी राज्यों के राज्यपालों के मामले सुप्रीमकोर्ट में लंबित हैं| पंजाब में आम आदमी पार्टी, तमिलनाडु में डीएमके, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और केरल में सीपीएम की सरकारे हैं, ये चारों ही राजनीतिक दल भाजपा विरोधी और इंडी एलायंस का हिस्सा हैं|

हाल ही में सुप्रीमकोर्ट ने पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित के बारे में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि "आप को पता है कि आग से खेल रहे हैं|" कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्यपाल निर्वाचित नहीं होते, इसलिए उन्हें चुनी हुई सरकारों के कामों में अड़चन नहीं डालनी चाहिए| पंजाब में लंबे समय से राज्यपाल पुरोहित और मुख्यमंत्री भगवंत मान के बीच जंग छिड़ी हुई थी|

SC on Governors: Reason for Supreme Courts strictness on Governors

मुख्यमंत्री भगवंत मान राज्यपाल की ओर से भेजे गए किसी भी पत्र का जवाब नहीं दे रहे थे, इस पर राज्यपाल पुरोहित ने राज्य सरकार को एक धमकी भरा पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री से कहा था कि राज्य सरकार उनके पत्रों का जवाब नहीं दे रही है, इसलिए उन्हें मजबूर हो कर राष्ट्रपति को पत्र लिखना पड़ेगा कि पंजाब में संवैधानिक तंत्र फेल हो गया है|

दूसरी तरफ पंजाब सरकार का आरोप है कि राज्यपाल संवैधानिक मर्यादाओं का पालन नहीं कर रहे है| ठीक इसी तरह का विवाद बहुत लंबे समय तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ और पश्चिम बंगाल की सरकार के बीच चलता रहा|अब कुछ उसी तरह का विवाद तमिलनाडु सरकार और वहां के पुलिस पृष्ठभूमि के राज्यपाल आर.रन. रवि के बीच चल रहा है|

2014 के बाद यह पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने किसी राज्यपाल के खिलाफ सख्त टिप्पणी की हो| पहले भी कई राज्यपालों की भूमिका पर कोर्ट सवाल उठा चुकी है, तो कईयों को फटकार लगा चुकी है| 2016 में जब उत्तराखंड के राज्यपाल के.के. पॉल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी थी, तो उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उन्हें जमकर फटकार लगाई थी| हालांकि सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ ने एक अवांछित टिप्पणी भी की थी कि राज्यपाल केंद्र के एजेंट नहीं हैं| सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि राज्य में सरकार रहेगी या नहीं, यह फैसला सिर्फ विधानसभा में हो सकता है| कोर्ट ने विधानसभा में मत विभाजन का निर्देश दिया, जहां विधानसभा में कांग्रेस बहुमत हासिल करने में सफल रही|

2016 में पूर्व आईएएस अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल जेपी राजखोवा को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई जब उन्होंने बहुमत होते हुए भी कांग्रेस सरकार को अपदस्थ कर दिया था| राज्यपाल जेपी राजखोवा ने पहले राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की थी और फिर कांग्रेस के ही एक बागी को मुख्यमंत्री बना दिया था| सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार ने राज्यपाल जेपी राजखोवा को बर्खास्त कर दिया था|

इस समय तमिलनाडु, केरल, पंजाब, बंगाल और तेलंगाना के राज्यपालों के मामलों पर सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई चल रही है| इन सभी राज्यों की सरकारों ने अपने राज्यपालों की मनमानी की शिकायत की है| राज्यों का कहना है कि राज्यपाल संविधान के तहत काम नहीं करते हैं| सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर के बाद राज्यपाल की भूमिका पर बड़े पैमाने पर सुनवाई करने की बात कही है|

देश में अभी 14 राज्यों में उन पार्टियों की सरकार है, जो केंद्र की सत्ता में शामिल नहीं है| इनमें 11 राज्य सरकारें भाजपा विरोधी इंडी एलायंस का हिस्सा हैं| यही टकराव का बड़ा कारण है| इसमें कोई शक नहीं कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री का विवाद विशुद्ध रूप से राजनीतिक होता है| इनकी नियुक्ति भी राजनीतिक आधार पर होती है| लेकिन देखा यह गया है कि अगर राज्यपाल अनुभवी और सुलझा हुआ राजनीतिज्ञ है तो विवाद को ज्यादा लंबा नहीं खींचने देता, लेकिन अगर उसकी पृष्टभूमि पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी की हो, तो वे घमंड के घोड़े पर सवार होते हैं| मोदी राज में के.के. पॉल और आर.एन. रवि इसके दो प्रत्यक्ष उदाहरण हैं|

राज्यपालों की नियुक्तियों और उनकी शक्तियों को लेकर सरकारिया कमीशन ने एक रिपोर्ट केंद्र को सौंपी थी| विपक्ष में रहते भाजपा उन सिफारिशों को लागू करने की मांग करती थी| भाजपा ने यहाँ तक कहा था कि केंद्र की सत्ता में आने के बाद वह सरकारिया कमीशन की रिपोर्ट लागू करेगी| सरकारिया कमीशन का सुझाव था कि राज्यपाल की नियुक्ति से पहले एक पैनल बनाया जाए, जिसमें उपराष्ट्रपति, लोकसभा स्पीकर और संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री को शामिल किया जाए|

राज्यपाल एक संवैधानिक पद है और संविधान के अनुच्‍छेद 153 में इसके बारे में विस्तार से बताया गया है| हालांकि उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2016 में कहा कि राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि नहीं, लेकिन वास्तविकता यह है कि राज्यपाल केंद्र और राज्‍यों के बीच कड़ी का काम करते हैं| जहां जहां राज्यपाल निर्वाचित सरकार की सलाह पर काम नहीं करते, वहीं पर टकराव की स्थिति पैदा होती है|

बीच बीच में अनेक बार राज्यपाल के पद को खत्म करने की मांग भी उठी है, खासकर कम्युनिस्ट पार्टियां लंबे समय से राज्यपाल का पद खत्म करने की मांग करती रही हैं| लेकिन राज्यपाल का पद ही भारत को एकसूत्र में बाँधने की कड़ी है| इसलिए किसी भी पार्टी की केंद्र सरकार ने कभी भी राज्यपाल के पद को खत्म करने की मांग पर विचार नहीं किया| कम्युनिस्ट पार्टी के विश्वम ने राज्यसभा में इसको लेकर एक प्राइवेट बिल का नोटिस भी दिया था| उन्होंने इस नोटिस में कहा था कि राज्यपाल का पद एक बोझ है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+