Opinion: शील संपन्न शक्ति ही शांति का आधार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए इस बार विजयादशमी के पुनीत अवसर पर होने वाले परंपरागत शस्त्र पूजन समारोह का विशेष महत्व था। 99 वर्ष पूर्व विजयादशमी को ही महान देशभक्त स्व. डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार ने मुट्ठी भर स्वयंसेवकों के साथ मिलकर संघ की नींव रखी थी। वह नन्हा पौधा अब विशाल वट वृक्ष का रूप ले चुका है।
अगले वर्ष विजयादशमी को संघ अपना शताब्दी समारोह मना रहा होगा। अतः शताब्दी वर्ष के शुभारंभ के अवसर पर इस बार विजयादशमी को आयोजित शस्त्र पूजन समारोह के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत अपने वार्षिक उद्बोधन में क्या बोलने जा रहे हैं यह उत्सुकता सभी के मन में थी।

देश यह जानना चाहता था कि देश - दुनिया में जो महत्वपूर्ण घटनाएं आकार ले रही हैं उनके प्रति संघ का दृष्टिकोण क्या है, इसके साथ ही ज्वलंत राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान की दिशा में संघ प्रमुख मोहन भागवत के महत्वपूर्ण सुझावों की भी प्रतीक्षा की जा रही थी। मोहन भागवत जब ने बोलना प्रारंभ किया तो उन्होंने अपने बहुप्रतीक्षित वार्षिक व्याख्यान में बड़ी साफगोई के साथ सिलसिलेवार तरीके से उन सभी विषयों को शामिल किया जिन पर संघ की राय अहम साबित होती है।
मोहन भागवत ने बंगला देश में हिन्दुओं के प्रति अत्याचार की घटनाओं की चर्चा करते हुए कहा कि सामाजिक सद्भाव और एकता के लिए जाति और धर्म से ऊपर उठकर व्यक्तियों और परिवारों के बीच मैत्री का होना जरूरी है। संघ इस बात पर विशेष जोर दिया कि दुर्बल होना अपराध है यह बात हिंदू समाज को समझना चाहिए। भागवत ने सचेत किया कि संगठित और व्यवस्थित नहीं होने से मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। संघ प्रमुख ने दो टूक शब्दों में कहा कि बंगला देश में जब कट्टरपन की मानसिकता रहेगी तब हिंदुओं ही नहीं,अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों पर हमले का खतरा बना रहेगा।
संघ प्रमुख ने कहा कि बंगला देश की घटनाओं में विश्व के हिंदू समुदाय के लिए यह संदेश छिपा हुआ है कि असंगठित रहना अत्याचारों को निमंत्रण देना है। संघ प्रमुख ने कहा कि जब बंगला देश में हिन्दू अल्पसंख्यकों ने एक होकर प्रतिकार किया तो वहां हमले रुक गये इसलिए हिन्दू समाज को संगठित होने की आवश्यकता है। संघ प्रमुख ने कहा कि पूरी दुनिया के हिंदुओं से बंगला देश के हिंदू अल्पसंख्यकों को मदद की जरूरत है भारत सरकार से भी उन्हें मदद की जरूरत है।
मोहन भागवत ने अपनी इस बात को रेखांकित किया कि भारत आगे बढ़ रहा है , दुनिया में भारत की साख और स्वीकार्यता बढ रही है परंतु कुछ ऐसी शक्तियां हैं जो चाहती हैं कि भारत आगे न बढ़े। वे भारत को आगे बढ़ता हुए नहीं देख सकती। इस सबके बावजूद हम सबकी मदद करते हैं। हमसे शत्रुता रखने वालों की भी हम मदद करते हैं इसीलिए भारत बढ़ रहा है। हमें निरंतर सशक्त बनने की दिशा में आगे बढ़ना है।
मोहन भागवत ने कहा कि अपने घर के अंदर हमारी भाषा, भोजन और वेषभूषा अपनी होना चाहिए। इसके साथ ही हमें देश के अंदर विभिन्न स्थानों के भ्रमण पर जाना चाहिए। भ्रमण करने से हमें दूसरों को जानने समझने का मौका मिलेगा। हमारा देश विविधताओं वाला देश है लेकिन विविधताओं का मतलब अलगाव नहीं है। यह विविधता हमारी संस्कृति की विशेषता है। हमें इन विविधताओं का सम्मान करना चाहिए। भागवत ने कहा कि सामाजिक समरसता और परस्पर सद्भाव से ही स्वस्थ और सबल समाज का निर्माण होता है। कुछ संकेतात्मक कार्य मात्र करने से हम अपने इस उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते।
सरसंघचालक ने सद्भाव और संयम पूर्ण वातावरण के निर्माण हेतु सज्जनों की शक्तिसंपन्नता पर जोर देते हुए कहा कि शक्ति जब शील संपन्न होकर आती है तो वह शांति का आधार बनती है। भागवत ने कहा कि सज्जन सबके प्रति सद्भाव तो रखते हैं परंतु एकत्र होना नहीं जानते।उनको संगठित सामर्थ्य के निर्माण की कला सीखनी पड़ेगी। सरसंघचालक ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को हिंदू समाज की शील संपन्न शक्ति साधना का पर्याय बताते हुए कहा कि शील संपन्न व्यवहार के साथ शक्ति साधना भी जरूरी है। हम सबकी यही साधना हमें अपनी पवित्र मातृभूमि को परमवैभव संपन्न बनाने की शक्ति प्रदान करेगी।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक हैं। आलेख में व्यक्त किए गए विचारों से संपादक या संस्थान का सहमत होना आवश्यक नहीं है।)
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