Regional Parties: क्षेत्रीय दल तो कमजोर होंगे ही लेकिन खतरा भाजपा को भी है
सभी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का वजूद मुस्लिम, दलित, ओबीसी, आदिवासी वोटरों पर टिका है। ये चारों समुदाय मूलत: कांग्रेस के वोट बैंक थे।

Regional Parties: 30-31 जुलाई 2022 को पटना में भारतीय जनता पार्टी के सात मोर्चों की संयुक्त राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक थी| इस बैठक में दिया गया भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का भाषण बहुत चर्चित हुआ था| बल्कि विवादास्पद भी हो गया था| जेपी नड्डा ने अपने भाषण में कहा था कि देश की सभी क्षेत्रीय पार्टियां खत्म हो जाएंगी|

राजनीतिक पंडितों ने उनके इस बयान को सिर्फ लालू यादव और नीतीश कुमार को नेस्तनाबूद करने के नजरिए से देखा| जबकि उस समय बिहार में जदयू और भाजपा की साझा सरकार थी| नड्डा के बयान के नौंवे दिन 9 अगस्त को नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़कर लालू यादव के साथ गठबंधन करके सरकार बना ली थी| इसलिए भाजपा के भीतर भी बहुत लोगों ने नीतीश से गठबंधन टूटने के लिए नड्डा के बयान को जिम्मेदार माना था|
2020 का विधानसभा चुनाव जेडीयू और भाजपा ने मिलकर लड़ा था, जिसमें जेडीयू की सीटें घटी थीं, और भाजपा की सीटें बढीं थीं| चुनाव नतीजों के समय भी चुनावी पंडितों ने समीक्षा की थी कि भाजपा ने चिराग पासवान के कंधों पर बंदूक रखकर जेडीयू को नुकसान पहुंचाया| इस बात को नीतीश कुमार भी समझ रहे थे कि चिराग पासवान ने जेडीयू के सामने हर जगह उम्मीदवार खड़े करके उन्हें नुकसान पहुंचाया था| नड्डा के बयान को उसी सन्दर्भ में देखा गया कि भाजपा की रणनीति क्षेत्रीय पार्टियों को खत्म करने की है| लालू यादव और नीतीश कुमार के हित साझा हो गए, राजद और जेडीयू ने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हाथ मिलाया और भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया|
लेकिन जेपी नड्डा का बयान सिर्फ बिहार के सन्दर्भ में नहीं था| उनका बयान राजनीतिक रिसर्च पर आधारित था| रिसर्च यह कहती है कि भाजपा के केन्द्रीय राजनीति में उभरने के बाद छोटे छोटे गुटों में बंटे भाजपा विरोधी वोटर एक जगह इकठ्ठे होने के लिए विकल्प खोज रहे हैं| अगर भाजपा विरोधी वोटरों का केंद्र बिन्दु फिर से कांग्रेस बनती है, तो उसका सीधा नुकसान क्षेत्रीय पार्टियों को होगा| क्योंकि एक आध क्षेत्रीय पार्टी को छोड़ दें, तो बाकी लगभग सभी क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस के परंपरागत वोटों को अपने पाले में लाकर ही पनपी हैं।
अधिकांश क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा विरोधी हैं, इसलिए भाजपा को हराने में क्षेत्रीय पार्टियों की विफलता के बाद भाजपा विरोधी वोटर कांग्रेस की ओर लौटेगा तो क्षेत्रीय पार्टियां कमजोर होंगी| कर्नाटक में जेडीएस के साथ वही हुआ है, जो 31 जुलाई 2022 को जेपी नड्डा ने कहा था। जनता दल से निकलने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौडा ने अपनी अलग पार्टी जनता दल सेक्यूलर नाम से बनाई थी| उनकी पार्टी वोक्कालिंगा समुदाय और मुस्लिम वोट पर आधारित थी|
क्षेत्रीय दलों की भाजपा को हराने की विफलता के चलते मुस्लिम वोट इस बार एकमुश्त कांग्रेस की तरफ लौट गया, वोक्कालिगा को भी जब लगा कि कुमारस्वामी पता नहीं मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं बनेंगे, लेकिन उनके समुदाय के डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बन सकते हैं, तो वोक्कालिगा वोटर भी कांग्रेस की तरफ चला गया| जेडीएस 37 सीटों से घट कर 19 पर आ गई| जेडीएस का जो हश्र हुआ है, वह जेपी नड्डा की भविष्यवाणी के सत्य होने का पहला प्रमाण है|
अकाली दल, बसपा, शिवसेना और दक्षिण की तीन पार्टियों द्रमुक, अना द्रमुक और टीडीपी को छोड़ दिया जाए, तो बाकी सभी क्षेत्रीय दलों में दो तरह के दल हैं, कुछ कांग्रेस डीएनए के दल हैं, तो कुछ समाजवादी डीएनए के दल हैं| कुछ कांग्रेस और समाजवादी डीएनए के मिक्सचर भी हैं| इनमें से ज्यादातर दल पारिवारिक दल बन गए हैं, इसलिए नरेंद्र मोदी परिवारवाद की राजनीति पर कड़े प्रहार करते रहते हैं|
महाराष्ट्र की एनसीपी कांग्रेस से निकली, बंगाल की टीएमसी कांग्रेस से निकली, आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस से निकली, मेघालय की एनपीपी कांग्रेस से निकली| जनता पार्टी के विभाजन के बाद जनता दल से होते हुए समाजवादी तासीर की क्षेत्रीय पार्टियां जेडीयू, राजद, जेडीएस और समाजवादी पार्टी सभी भाजपा विरोधी हैं| हरियाणा के चौधरी देवी लाल, उड़ीसा के बीजू पटनायक और उत्तर प्रदेश के चौधरी चरण सिंह कांग्रेस से निकल कर जनता पार्टी में आए थे|
कांग्रेस, समाजवादी और सेक्यूलर मिक्सचर की इन तीनों नेताओं की पारिवारिक पार्टियां भी भाजपा विरोध की पार्टियां हैं| तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति के संस्थापक के. चन्द्रशेखर राव ने टीडीपी से राजनीति शुरू की, लेकिन 2001 में टीडीपी छोड़कर तेलंगाना राज्य की स्थापना के लिए तेलंगाना राष्ट्र समिति बनाई, 2004 से 2006 तक वह मनमोहन सरकार में मंत्री थे| वह कांग्रेस भाजपा से बराबर की दूरी वाली राजनीति करते हैं|
सभी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का वजूद मुस्लिम, दलित, ओबीसी, आदिवासी वोटरों पर टिका है| ये चारों जातियां और समुदाय मूलत: कांग्रेस का वोट बैंक था| आज़ादी के बाद ब्राह्मणों को आगे रख कर कांग्रेस इन सभी दलों के वोट बैंक को इस्तेमाल करती रही| इस कारण एक एक कर इन जातियों के वोट कांग्रेस से अलग होते गए| मंडल आन्दोलन ने ओबीसी को कांग्रेस से दूर किया, तो ओबीसी मतदाता समाजवादी तासीर की क्षेत्रीय पार्टियों की तरफ चला गया|
काशी राम के दलित आन्दोलन ने दलितों की आंखें खोली, तो दलित भी कांग्रेस से छिटक गया। बाबरी ढांचा टूटा तो मुस्लिम भी कांग्रेस से छिटक कर क्षेत्रीय दलों की ओर चला गया| आरएसएस ने आदिवासी क्षेत्रों में अपना काम बढाया तो आदिवासी भाजपा की तरफ चला गया| 2004 से 2014 तक की यूपीए सरकार ने अपना सारा जोर मुस्लिम वोट बैंक को वापस लाने में लगा दिया, इसका नतीजा यह निकला कि ओबीसी, दलित और आदिवासी ने एकजुट हो कर भाजपा का साथ दिया|
2014 और 2019 का नतीजा कांग्रेस के बाद क्षेत्रीय दलों से भी मोह भंग का था| सवाल यह है कि 2024 किस दिशा की ओर जा रहा है| तो उसके संकेत कर्नाटक के चुनाव नतीजों से मिलते हैं| देश फिर से दो ध्रुवीय राजनीति की ओर बढ़ रहा है। यह क्षेत्रीय दलों के लिए खतरे की घंटी है|
जेपी नड्डा की भविष्यवाणी सच हो रही है| 1992 के बाद यानि 42 साल बाद मुस्लिम कांग्रेस की तरफ लौट रहा है| पहले यह संकेत पश्चिम बंगाल की सागरदीघी सीट के उपचुनाव नतीजे से मिला, और अब यह संकेत कर्नाटक विधानसभा चुनाव नतीजे से मिला|
इसलिए खतरा तृणमूल कांग्रेस, जेडीयू, राजद, समाजवादी पार्टी, बसपा, एनसीपी, टीआरएस या कहें बीआरएस और आम आदमी पार्टी को है| ममता, पवार,नीतीश, तेजस्वी, अखिलेश, मायावती, चन्द्र शेखर राव सब डरे हुए है| राष्ट्रीय पार्टी होने का दम भरने वाले केजरीवाल को तो कर्नाटक ने आईना दिखा दिया। आम आदमी पार्टी ने 209 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे। सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई, आप को नोटा से भी कम सिर्फ आधा प्रतिशत वोट मिले|
लेकिन सवाल है कि क्या दलित, आदिवासी और ओबीसी भी कांग्रेस की तरफ लौट रहा है| कर्नाटक में ये तीनों समुदाय भी कांग्रेस की तरफ लौटे हैं, इसीलिए भाजपा 65 सीटों पर अटक गई। उसकी दलित समुदाय की आरक्षित सीटें घट गईं और आदिवासी आरक्षित सीट तो एक भी नहीं मिली| ओबीसी समुदाय तो इसलिए कांग्रेस की तरफ गया होगा कि उसे सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद थी, दलित भी इसलिए कांग्रेस की तरफ चला गया, क्योंकि दलित समुदाय के मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं|
लेकिन भाजपा और आरएसएस को भी सोचना होगा कि आदिवासी कांग्रेस की तरफ क्यों लौटा| अगर यह राष्ट्रीय ट्रेंड बनता है, और भाजपा इन तीनों समुदाय को बाकी राज्यों में कांग्रेस की तरफ जाने से नहीं रोक सकी, तो खतरे की घंटी भाजपा के लिए भी है|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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