Rating Agencies: चीन और अमेरिका से ज्यादा भारतीय अर्थव्यवस्था से उम्मीद

Rating Agencies: यह महज इत्तेफाक नहीं है कि कई अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां लगातार विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बारे में नकारात्मक, लेकिन पांचवीं अर्थव्यवस्था भारत के बारे में सकारात्मक राय व्यक्त कर रही हैं। हालांकि इन रेटिंग्स से वैश्विक अर्थतंत्र में तत्काल कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला, परंतु इससे भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता में अवश्य बढ़ोतरी होने वाली है और विदेशी निवेशकों के लिए भारत एक आकर्षक निवेश गंतव्य बना रहने वाला है।

फिच, एस एंड पी और मॉर्गन स्टेनली, सबने चीन और अमेरिका दोनों देशों और उनकी बड़ी कंपनियों की डाउनग्रेडिंग की है, जबकि भारत की विकास दर को अपग्रेड किया है। पर भारत के लिए यह समय खुश होकर बैठने का नहीं है, बल्कि वैश्विक बाजार के इस सकारात्मक संदेश के हिसाब से बड़ी पूंजी को अवशोषित करने की क्षमता विकसित करने का है।

Rating Agencies Expectation from Indian economy more than China and America

चीन में इस समय जो आकड़े आ रहे हैं, वे इस बात का संकेत करते हैं कि वहां इस समय उदासीनता का माहौल है। कोविड के बाद की अर्थव्यवस्था में कोई सुधार नहीं है। सभी प्रमुख सेक्टर में मंदी के कारण लगता है कि चीन को फिर से एक बड़े बेलआउट पैकेज की घोषणा करनी पड़ सकती है, क्योंकि निर्यात सिकुड़ने के साथ साथ घरेलू मांग में भी कोई उठाव नहीं है। जून 2023 में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले निर्यात में 12.4 फीसदी की गिरावट आई है।

इस समय चीनी उपभोक्ताओं का आत्मविश्वास टूटा पड़ा है। प्रॉपर्टी मार्केट अब भी औंधे मुंह पड़ा हुआ है, जो कि चीन की जीडीपी में एक तिहाई वजन रखता है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार जून में समाप्त तिमाही में पिछली तिमाही के मुकाबले केवल 0.5 प्रतिशत की ही बढ़ोतरी देखी गई है। खुदरा बाजार और निवेश में भी नमी है। एक अगस्त को जारी अपनी रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट एजेंसी फिच ने कहा है कि यदि चीनी बैंक कम ब्याज दर पर होम लोन को रिफायनेंस करना जारी रखते हैं तो उनकी लाभदायकता में एक से पांच प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।

ऐसा होना लाजिमी भी है, क्योंकि चीन के केंद्रीय बैंक ने हाल ही में एक प्रेस कांफ्रेस के जरिए सभी बैंकों से कहा भी है कि वे मॉरगेज लोन की ब्याज दर कम ही रखें और पुराने लोन की जगह नये लोन जारी रखे। फिच का कहना है कि यदि ऐसा बड़े पैमाने पर होता है तो इसका सीधा असर चीन के बैंकों की लाभप्रदता पर होगा, क्योंकि चीन के बैंकों के कुल लोन का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मॉरगेज लोन ही है। फिच ने ही 3 अगस्त एक और अपनी रिपोर्ट में चाइना ग्रेटवाल एसेट मैनेजमेंट कंपनी की रेटिंग्स 'ए' से घटाकर 'ए माइनस' कर दी। फिच का कहना है कि शी जिनपिंग की सरकार द्वारा यदि चाइना ग्रेट वाल को आर्थिक मदद मिलना जारी नहीं रहता तो यह बैंक डिफॉल्ट भी हो सकता है।

चाइना ग्रेटवाल अभी तक सरकार का प्रौक्सी बैंक बन कर ही काम कर रहा है। लेकिन हाल के दिनों में सरकार ने अपनी सपोर्ट कम कर दी है। शायद यही कारण है कि इस बैंकिग संस्थान ने अभी तक अपने वित्तीय परिणाम जारी नहीं किए हैं, जबकि 30 अप्रैल तक इसे जारी हो जाना चाहिए था। फिच का आकलन है कि वित्तीय परिणामों को जारी होने में देरी से इसके वित्तीय स्रोतों में भी कमी आएगी और साथ में यह बात भी सच साबित होगी कि इस बैंकिंग संस्थान पर सरकार का कंट्रोल नहीं रहा। उल्लेखनीय है कि चाइना ग्रेटवाल एसेट मैनेजमेंट कंपनी में चीनी वित्त मंत्रालय की सीधी 73.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है और बाकी हिस्सेदारी भी चीन के अन्य सरकारी विभागों की है।

अंतरराष्ट्रीय निवेश सलाहकार मॉर्गन स्टेनली ने भी चीन के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए अपने निवेशकों को कहा है कि यह समय बीजिंग में निवेश करने का नहीं है, क्योंकि वहां बाजार में कोई ग्रोथ दिखाई नहीं दे रही है। चीनी अर्थव्यवस्था को लेकर स्टैंडर्ड एंड पुअर (एसएंडपी) ने भी निराशा ही जताई है। एस एंड पी का भी कहना है कि चीन की जीडीपी वृद्धि दर 5.2 प्रतिशत ही रहने वाली है। गोल्डमैन सैक्स ने भी चीन की विकास दर का आकलन घटा दिया है। पहले इस एजेंसी ने चीन की विकास दर 6 प्रतिशत रहने का आकलन किया था, पर अब इसे घटाकर 5.4 प्रतिशत का आकलन किया है।

अब खुद चीन भी मान रहा है कि उसकी बस अब छूट रही है। 4 अगस्त को चीन की सरकार ने एक बार फिर लोगों में आत्मविश्वास भरने के लिए एक साथ कई उपायों की घोषणा की। चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि शुक्रवार 4 अगस्त को कई सरकारी एजेंसियों और सेंट्रल बैंक ने यह संकल्प लिया कि 2023 की दूसरी छमाही में आर्थिक प्रगति दुबारा वापस लाने के लिए आवश्यक नीतिगत निर्णय और आर्थिक पैकेज पर लगातार काम करेंगे। चीन मैक्रो लेवल पर नीतियों को लागू करेगा, निवेशकों का विश्वास बहाल करेगा और घरेलू बाजार में मांग बढ़ाने पर काम करेगा। लेकिन अमेरिका यूरोप, आस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान के साथ कई तरह के विवाद के बाद भी बीजिंग पुरानी लय प्राप्त कर सकेगा, इसमें सभी को संशय है।

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका को लेकर भी तमाम आशंकाएं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने जताई है। अमेरिकी बाजार में तब हाहाकार मच गया, जब फिच ने अमेरिका की रेटिंग 'एएए' से घटाकर 'एए प्लस'' कर दी। अमेरिकी शेयर बाजार में 2 अगस्त को फिच की रिपोर्ट आने के बाद जबर्दस्त बिकवाली चली और एसएंडपी 500 इंडेक्स में एक प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखी गई। फिच की इस रिपोर्ट से पूरा अमेरिकी प्रशासन बौखला गया और सभी प्रमुख अधिकारी फिच की रिपोर्ट को बकवास करार देने में लग गए। फिच का आकलन है कि अमेरिका का अगले तीन साल में और कर्ज बढ़ जाएगा और बैंकिंग सेक्टर पर इसका जबर्दस्त नकारात्मक प्रभाव होगा।

अभी कुछ ही माह पहले अमेरिका पर डिफाल्ट का खतरा आ गया था। अमेरिका की समस्या उसके कर्ज की बढ़ती सीमा से है। 2011 तक अमेरिका का जीडीपी डेब्ट रेशियो 65.5 प्रतिशत था जो अब बढ़कर 100 प्रतिशत से अधिक हो गया है और अगले तीन साल में इसके 115 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है। अमेरिकी प्रशासन इस समय राजनीतिक अस्थिरता का शिकार है। फिच का कहना है कि पिछले 20 साल से अमेरिका राजनीतिक हाराकिरी का शिकार हो रहा है।

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए फिलहाल अच्छी खबरें हैं। सभी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने हमारी जीडीपी ग्रोथ रेट का अपना ही अनुमान बढ़ा दिया है। सभी का आकलन है कि भारत की जीडीपी में वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत से लेकर 6.9 प्रतिशत तक रहने वाली है। यानी भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था है। हमारी चाल तो ठीक है पर मंजिल बहुत दूर है। हम अभी भी अमेरिका और चीन के मुकाबले कहीं नहीं ठहरते। अमेरिका और चीन हमसे पांच गुणा बड़ी अर्थव्यवस्था हैं।

विश्व व्यापार में चीन की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत तो अमेरिका की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत है। वहीं भारत की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से भी कम है। पर अच्छी बात है कि भारत के प्रति पूरी दुनिया में विश्वास बढ़ा है। मॉर्गन स्टेनली जो कि दुनिया भर में 6 ट्रिलियन डॉलर के निवेश को सलाह देती है, उसने भारत के शेयर बाजार को वेटेज वाला बाजार हाल ही में घोषित किया है। उसी ने कहा है कि आज का भारत 2013 वाली कमजोर अर्थव्यवस्था नहीं है। अब देखना है कि 2023 से आगे भारत कहां जाता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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