Ram Setu: हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं का प्रतीक है राम सेतु
हजारों सालों से, हर कालखंड में राम सेतु को लेकर किसी ने कोई राजनैतिक स्पष्टीकरण नहीं माँगा क्योंकि यही एक सत्य था। मगर साल 2007 के बाद से इसके इतिहास को बार-बार राजनेताओं के माध्यम से संदेह के घेरे में लाने की कोशिशें हो

कई बार प्रश्न आता है कि भारतीय इतिहास को समझने और देखने का आखिर मापदंड क्या हो? एक तरफ धार्मिक मान्यतायें एवं लिखित इतिहास हैं, तो दूसरी तरफ आधुनिक विज्ञान के आधार पर तार्किक जवाब खोजने की कोशिश। दुर्भाग्य से दोनों मामलों में आमतौर पर मतभेद ही रहता हैं। दरअसल, कुछ दिनों पहले, पृथ्वी विज्ञान मामलों के मंत्री, जितेन्द्र सिंह से संसद में भारत और श्रीलंका के बीच बने एडम्स ब्रिज अथवा राम सेतु की ऐतिहासिकता को पुष्ट करने संबंधी एक सवाल पूछा गया।
केंद्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने प्रश्न का मौखिक जवाब देते हुए संसद को बताया कि जहां तक रामसेतु को लेकर सवाल है तो मैं कहना चाहता हूं कि शोध में हमारी कुछ सीमाएं हैं क्योंकि यह 18 हजार साल से भी ज्यादा पुराना इतिहास है। अगर हम इतिहास के हिसाब से देखें तो वह ब्रिज (राम सेतु) करीब 56 किमी लंबा था, लेकिन स्पेस टेक्नॉलजी के जरिए हमने कुछ टुकड़े और आईलैंड, कुछ लाइम स्टोन के बारे में जानकारी हासिल की है, लेकिन दावे के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि वे ब्रिज के अवशेष हैं। लेकिन लोकेशन में उनके बीच एक निरंतरता दिखाई देती है।
पृथ्वी विज्ञान मामलों के मंत्री होने के नाते उन्होंने इतिहास के इस प्रश्न का तार्किक रूप से जवाब दिया था। मगर प्रश्न तब खड़ा होता है कि आखिर अपनी प्रचलित मान्यताओं और लिखित प्रमाणिक इतिहास को राजनैतिक माध्यमों से पुष्ट करवाने का प्रयास बार-बार क्यों किया जाता है? जिसके चलते कई बार, कम-से-कम भगवान राम को लेकर बिना किसी बात के विवाद पैदा हो जाते हैं, जिनकी वास्तव में कोई जरुरत नहीं होती।
साल 2005 की बात है। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मदुरै में सेतुसमुद्रम शिप कैनाल प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया। इस योजना के अंतर्गत राम सेतु के बीच से होते हुये मन्नार की खाड़ी से बंगाल की खाड़ी के बीच जहाजों के आवागमन के लिए एक रास्ता तैयार करना था। इसे एक प्रकार से भारत की स्वेज कैनाल योजना के रूप में प्रचारित किया गया था। वास्तव में यह योजना 1950 में ही सामने आ गयी थी और इसके लिये 1950 में रामास्वामी मुदालिअर कमेटी का भी गठन किया गया था। गौर करने वाली बात यह है कि इस कमेटी ने राम सेतु को न तोड़ने की स्पष्ट सलाह अपनी रिपोर्ट में दी थी।
यह तथ्य इसलिये महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि 1950 में, उससे पहले और उसके बाद तक के पूरे कालखंड में राम सेतु को रामायण से जोड़कर देखा जाता था। इसे लेकर किसी प्रकार का कोई विवाद नहीं था। मगर जब सेतुसमुद्रम परियोजना पर 2007 में काम आगे बढ़ा तो यह मामला जानबूझकर विवादित बना दिया गया। आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया। जिसके बाद, सुप्रीम कोर्ट में तत्कालीन केंद्र सरकार ने एक हलफनामा देकर यह कह दिया कि "भगवान राम का कोई अस्तित्व ही नहीं था। वे एक काल्पनिक चरित्र थे।"
वास्तविकता तो यही है कि राम सेतु को लेकर किसी राजनैतिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह एक लिखित इतिहास है। जोकि हजारों सालों से बिना किसी बदलाव के एकसमान रूप से हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं में समाहित है। इस बात के पुख्ता साक्ष्य उपलब्ध है कि यह भगवान राम ने शताब्दियों पहले अपने लंका विजय अभियान से पहले बनवाया था।
वाल्मीकि रामायण के युद्ध कांड के द्वाविंशः सर्गः में इस सेतु के निर्माण का पूरा विस्तृत उल्लेख मिलता है। जैसे 60 वें श्लोक के अनुसार महाकाय महाबली वानरों ने हाथी के समान बड़ी-बड़ी शिलाओं और पर्वतों को उखाड़कर विभिन्न साधनों के माध्यम से उन्हें समुद्रतट पर पहुँचाया था। इसी प्रकार 63वां श्लोक कहता है कि नल ने समुद्र के बीच में महान सेतु का निर्माण किया।
गौर करने वाली बात यह है कि यह जानकारी हमेशा सतत रूप में एकसमान बनी रही। महाकवि कालिदास के महाकाव्य रघुवंशम् के बारहवें सर्ग में लंका जाने के लिये खारी जल के समुद्र पर पुल बंधवाने का उल्लेख मिलता है। भारतीय इतिहास कालगणना के अनुसार महाकवि कालिदास का कालखंड ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी के आसपास था।
फिर 11वीं शताब्दी में कवि कंबन ने भी सेतु-बंधन पटल के नाम से पूरा एक अध्याय इसी विषय को समर्पित किया है। वे लिखते है कि वानरों ने दूर-दराज के स्थानों से पहाड़ों के टुकड़ों को इकठ्ठा कर नल को सौंप दिया और उन्होंने उन शिलाओं को व्यवस्थित कर एक सेतु का निर्माण किया। इसके बाद, दो महान भारतीय साम्राज्यों - चोल और होयसल में इसे नल सेतु के नाम से पहचाना गया। फिर 1480 में इस क्षेत्र में एक बड़ा तूफान आया जिसके चलते इस सेतु को भारी नुकसान पहुंचा। मगर इसकी मान्यता पहले की तरह कायम रही। दरअसल इसके बाद गोस्वामी तुलसीदास का कालखंड आता है और उन्होंने अपने महाकाव्य श्रीरामचरितमानस में लंकाकाण्ड में लिखा है, "बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वतों और वृक्षों को खेल की तरह (उखाड़कर) उठा लेते है और लाकर नल-नील को देते है। वे अच्छी तरह गढ़कर सेतु बनाते है।"
सबसे बड़ी बात ब्रिटिश कालखंड में भी इसे लेकर कोई विवाद पैदा नहीं किया गया। जैसे सीडी मैक्लीन ने 'मैन्युअल ऑफ द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ द मद्रास प्रेसीडेंसी' का 1885 में संपादन किया। वे कहते है कि इस सेतु का निर्माण पहाड़ों के पत्थरों को लाकर किया गया था। हालांकि 1804 में राम सेतु को ईस्ट इंडिया कंपनी के सर्वेयर जेम्स रनेल द्वारा एडम्स ब्रिज का नया नाम दे दिया था।
इस प्रकार हजारों सालों से, हर कालखंड में अलग-अलग कवियों और साम्राज्यों में राम सेतु को लेकर किसी ने कोई राजनैतिक स्पष्टीकरण नहीं माँगा क्योंकि यही एक सत्य था। मगर साल 2007 के बाद से इसके इतिहास को बार-बार राजनेताओं के माध्यम से पुष्ट करवाने की कोशिशें होने लगी हैं जोकि निराधार है। वैसे इस तथ्य पर भी ध्यान देने की जरुरत है कि हर बार यही कहा गया कि राम सेतु का निर्माण पहाड़ों के पत्थरों से किया गया, जिसका मतलब है कि आज जो राम सेतु है वह उस जमाने में पहाड़ों के पत्थरों से बनाया गया था। यह एक सामान्य जानकारी है कि धरती पर पहाड़ों का इतिहास मानव जाति से भी पुराना है। इस नाते अगर इन पत्थरों की कार्बन डेटिंग होगी तो यह लाखों साल पुराने ही निकलेंगे। मगर इनका इस्तेमाल सेतु में रामायण के कालखंड में हुआ।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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