Ram Mandir Controversy: राम को संप्रदायों में बांटने का प्रयास क्यों?
विश्व हिन्दू परिषद के महासचिव चंपत राय श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सचिव भी हैं। इसलिए मंदिर निर्माण का काम काज देखने के साथ साथ मीडिया को जानकारी देना भी उनका एक काम है। लेकिन अपने विवादित बोल से वो इस पूरी परियोजना में बार बार विवाद पैदा करते रहते हैं।
मंदिर निर्माण शुरु होते ही उन पर जमीनों की खरीदारी में भ्रष्टाचार का आरोप लगा। फिर उन्होंने राम मंदिर आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को उम्र का हवाला देकर मंदिर उद्घाटन के दिन न आने वाला विवादित बयान दे दिया। उसके बाद सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के निमंत्रण पर एक टीवी चैनल पर बोल दिया कि वही बुलाये जाएंगे जो सन 1985 से इस आंदोलन से जुड़े हैं। बुलावे से पहले मंदिर निर्माण में उनकी भूमिका देखी जाएगी।

लेकिन राजनीतिक बयान देते देते अब उन्होंने धार्मिक संप्रदायों के बीच कलह पैदा करनेवाला बयान भी दे दिया है। एक अखबार से बातचीत में उन्होंने जोर देकर कहा है कि अयोध्या का राम मंदिर सिर्फ रामानंद संप्रदाय का है, न शैव, न शाक्त। सिर्फ रामानंद संप्रदाय। यह जवाब उन्होंने इस सवाल पर दिया था कि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद किस प्रकार से पूजन अर्चन किया जाएगा।
अव्वल तो इस सवाल पर इस तरह से जवाब देने का कोई अर्थ नहीं है। वैष्णव मंदिरों में वैष्णव विधि से ही पूजन होता है और शैव मंदिरों में शैव विधि विधान से। इसे अलग से उल्लेखित करने की कोई जरूरत ही नहीं होती। लेकिन उनके इस बयान की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कुछ दिन पहले ही अयोध्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में न जाने की बात कही थी। अब क्योंकि शंकरचार्य पीठ शैव मत की पीठ होती है इसलिए इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि चंपत राय शंकराचार्यों के न आने को सही ठहराने के लिए यह बात बोल गये हैं।
वैसे भी रामानंद कोई संप्रदाय नहीं है। जो संप्रदायों का बंटवारा है वह मोटे तौर पर शैव, वैष्णव और शाक्त परंपरा का ही है। लेकिन यह विभाजन भी अब सिर्फ मठों या पीठों तक ही सिमटा हुआ है। एक सामान्य हिन्दू के लिए शैव वैष्णव के बंटवारे का न तो कोई अर्थ है और न ही वो इसे समझता है। वह राम, कृष्ण, दुर्गा, शिव सबकी पूजा एकसाथ करता है। यानी वह एक ही समय में शैव, वैष्णव और शाक्त सभी है। उसकी आस्था में ऐसे किसी विभाजन का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है।
फिर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जब चंपत राय जिन रामानंद के संप्रदाय की बात कर रहे हैं तो वह रामानंद शिव की नगरी काशी में ही रहे। वहीं पंचगंगा घाट पर आज भी उनका आश्रम है। औरंगजेब द्वारा तोड़े जाने से पहले हिन्दुओं के लिए बिन्दू माधव मंदिर उतना ही पवित्र था जितना आदि विश्वेश्वर महादेव मंदिर। दोनों ही मंदिर गंगा के किनारे काशी में सदियों तक विद्यमान रहे। स्वयं रामानंदाचार्य ने काशी में रहकर राम नाम का प्रसार किया तो किसी ने उनका कभी विरोध नहीं किया। अपने प्रयास से रामानंदाचार्य ने न केवल ऊंच नीच और जाति पांति का बंटवारा खत्म किया वहीं शैव वैष्णव के बंटवारे को भी पाटने का काम किया।
अगर ऐसा नहीं होता तो काशी में रामानंदाचार्य के शिष्य कबीर और रविदास जैसे महान संत क्यों निवास करते और राम नाम के महत्व को जन जन तक पहुंचाने का काम क्यों करते। काशी की ही शैवभूमि पर रहकर गोस्वामी तुलसीदास ने महान काव्य रचना की जिसमें रामचरितमानस सबसे उल्लेखनीय है। रामचरितमानस से माध्यम से उन्होंने जहां राम चरित्र का वर्णन किया वहीं बहुत सूक्ष्म तरीके से शैव वैष्णव के बंटवारे पर भी प्रहार किया। इसलिए रामचरित मानस में शंकर भगवान राम की स्तुति करते हुए दिखते हैं तो राम शंकर भगवान की पूजा अर्चना करते हैं। रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास राम के नाम से लिखते हैं कि "लिंग थापि विधिवत कर पूजा, शिव समान प्रिय मोंहि न दूजा।।" यह वर्णन उस समय का है जब भगवान राम रामेश्वरम् में समुद्र पर सेतुबंध करके लंका की ओर प्रस्थान कर रहे थे।
भारत में जिसे भक्तिकाल कहा जाता है वह पूरा काम मुगलों की गुलामी का काल था और उस समय भक्त कवियों ने राम और कृष्ण नाम का सहारा लेकर पूरे हिन्दू समाज को संकट से पार ले जाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन उस समय कहीं से कोई शैव मतावलंबी या शंकराचार्य इस प्रयास का विरोध करते तो नहीं दिखाई देते। फिर सवाल यह है कि जब शैव मत और वैष्णव मत के शीर्ष धर्माचार्य ऐसी बातों को कई सदियों से महत्व देना बंद कर चुके हैं तब इस विभाजन को फिर से क्यों उभारा जा रहा है?
शैव वैष्णव और शाक्त मतावलंबियों के हिसाब से देखें तो शैव भारत के दक्षिण में, शाक्त पूरब में और वैष्णव उत्तर तथा पश्चिम में अधिक प्रभावी दिखते हैं। लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि बाकी हिन्दू मतावलंबियों को वहां हेयदृष्टि से देखा जाता है। घोर शैवभूमि तमिलनाडु में बहुत प्राचीन समय से ही अलवार संतों का प्रभाव रहा है। अलवार परंपरा के संत भगवान विष्णु की उपासना करते थे तो नयनार संतों की परंपरा में शिव की उपासना की जाती थी। लेकिन दोनों ही परंपरा में टकराव होता हो, ऐसा उदाहरण देखने में नहीं मिलता।
पूरब की ओर देखें तो आसाम और बिहार शाक्त भूमि रही है लेकिन बंगाल और मणिपुर में वैष्णवों का प्रभाव अधिक रहा। अगर यह विभाजन इतना गहरा होता कि एक दूसरे को स्वीकार करने में भी समस्या होती तो एक साथ दोनों संप्रदायों का विकास भला क्यों होता? यही हाल महाराष्ट्र का है जहां शैव भूमि पर संत तुकाराम और संत नामदेव जैसे वैष्णव संतों ने धर्म का प्रचार किया। उनका कभी विरोध हुआ हो या हिन्दुओं ने उनको अपना न माना हो ऐसा उदाहरण भी कहीं दिखाई नहीं देता। सोमनाथ की धरती पर वैष्णव जन तो तेने कहिए की रचना करनेवाले महान संत नरसी मेहता ने खूब कृष्ण नाम का प्रचार किया तो क्या किसी शैव ने गैर समझकर विरोध किया?
आज अगर कुछ लोग ऐसा करने का प्रयास कर रहे हैं तो उनका उद्देश्य राजनीतिक तो हो सकता है, धार्मिक कदापि नहीं। यही कारण है कि शंकराचार्यों में भी किसी ने राम मंदिर को लेकर कोई ऐसी बात नहीं कही जिससे असहमति प्रकट हो। शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने मोदी द्वारा उद्घाटन में ताली बजाने वाली जो बात कही है वह राजनीतिक बयान था और उससे वो बच सकते थे। इसी तरह चंपत राय को भी ऐसे सांप्रदायिक वर्गीकरण की कोई जरूरत नहीं है। ऐसे बयानों का दुरुपयोग वह करेंगे जो कभी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण चाहते ही नहीं थे।
जहां तक शैव मतावलंबियों की बात है तो श्रृंगेरी के शंकराचार्य भारतीतीर्थ की ओर स्पष्टीकरण जारी करके कहा गया है कि एक अखबार ने ऐसी खबर प्रकाशित की है मानों श्रृंगेरी के शंकराचार्य राममंदिर महोत्सव में विरोध प्रकट रहे हैं। शारदापीठ श्रृंगेरी की ओर से जारी स्पष्टीकरण में साफ कहा गया है कि "श्रृंगेरी शंकराचार्य जी आशीर्वाद देते हैं कि अतिपावन एवं दुर्लभ इस प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में यथायोग्य भाग लेकर सभी आस्तिक भगवान श्रीरामचंद्र जी कृपापात्र बनकर कृतार्थ होंवे।"
उनका यह संदेश ही समस्त संदेहों को समाप्त करने के लिए पर्याप्त है। इसके बाद किसी को भी राम को संप्रदायों में बांटने का प्रयास नहीं करना चाहिए। फिर चाहे वह चंपत राय हों या फिर वो लोग जिन्हें धर्म से तो कोई मतलब नहीं है लेकिन धार्मिक विवादों को पूरी हवा देते हैं।












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