Lok Sabha Elections: चुनाव में बीजेपी का रामबाण बनेगा राम मंदिर?
Lok Sabha Elections: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा करवा दी है और 'भावुक' होकर उनका वहां पर 'हमारे राम आ गए हैं' कहना भी सबको गदगद कर गया।
अब आम चुनाव आने वाला है और उसी से इसे जोड़कर देखा जा रहा है तो राजनीतिक स्तर पर मनोवैज्ञानिक युद्ध और तेज हो गया है।

भारत की राजनीतिक धाराओं के गहन जानकारों का मानना है कि मंदिर मुद्दे पर भाजपा की जीत पक्की है। वे दावे के साथ यह भी कह रहे हैं कि देश के विभिन्न अंचलों के श्रद्धालुओं को 'भव्य' राम मंदिर व 'दिव्य' अयोध्या का दर्शन कराकर पार्टी लोकसभा चुनाव तक उन्हें अपना मुरीद बना सकती है।
बीजेपी वैसे भी अबकी बार 400 पार का नारा उछाल ही चुकी है। राम मंदिर का मुद्दा 2023 के चुनाव के लिए रामबाण का रूप धर चुका है, और बीजेपी को केंद्र में अकेले अपने दम पर बहुमत की सीढ़ियां चढ़ने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक स्तर का 'महानायक' हो जाने का भी बड़ा सहारा मिल रहा है।
लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत पक्की होना ठीक वैसा ही है, जैसे 30 अक्टूबर, 1990 को कारसेवकों ने तमाम बंदिशें तोड़कर बाबरी मस्जिद पर भगवा फहरा दिया था और उसी दिन से यह मान लिया गया था कि हिंदुत्व के विजय अभियान की शुरूआत हो गई है। फिर 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद को जब ढहा दिया गया, तो देश ने उसे हिंदू कार्यकर्ताओं के शौर्य का प्रदर्शन मानकर बीजेपी की सत्ता के शुभारंभ का ऐलान कर दिया था।
बाबरी ढांचे पर पहले भगवा फहराया जाना और बाद में उसे ढहाया जाना, ये दोनों ही घटनाएं इतने सालों तक बीजेपी की राजनीतिक यात्रा की सफलता का साधन बनी रहीं, तो फिर राम मंदिर का लाभ बीजेपी को कैसे नहीं मिलेगा, यह तथ्य किसी भी तर्क से परे हैं। इसी कारण राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि चुनावी उपलब्धियों को आगामी सफलता में बदलने के लिए बीजेपी ने जिस तरह से अब तक हर प्रयास किया है, उसी तर्ज पर अब आगामी लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी को फिर से सत्ता में आने से विपक्ष द्वारा उसे रोक पाना संभव नहीं लगता।
बीजेपी के 400 पार के नारे से देश में एक मनोवैज्ञानिक युद्ध शुरू हो गया है, जिसका एकमात्र उद्देश्य चुनावी मुकाबला शुरू होने से पहले ही विपक्ष का 'उत्साह' ठंडा करके उसे 'वॉकओवर' के लिए विवश कर देना है। बिखरे हुए विपक्ष के बीच ऐसा करना बेहद आसान है। राम मंदिर ने बीजेपी की फिर से, यानी तीसरी बार सत्ता में आने की लड़ाई का मुकाबला आधा कर दिया है और बाकी आधी जंग को जीतना उसके लिए बाएं हाथ का खेल बना दिया है।
भारत की जनता ने, कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार में हुए हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार के प्रति नाराजगी जताते हुए, सन 2014 में नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल पर भरोसा करके वोट दिया था। तब विपक्ष कहता रहा कि बीजेपी और उनके नेता नरेंद्र मोदी राम के नाम पर वोट लेकर सत्ता में आए, लेकिन अयोध्या की देहरी तक भी नहीं आए। बात सही है। दरअसल, अपनी 'परिवर्तित छवि' को लेकर मोदी इतने सतर्क थे कि कभी उन्होंने राम मंदिर बनाने का नाम तक नहीं लिया। अयोध्या मुद्दे व अयोध्या नगरी से रणनीतिक दूरी भी बनाए रखी, और देश के मूड को समझते रहे। हालांकि, सब कुछ भीतर ही भीतर चलता रहा।
लेकिन 2019 में जब वे अपनी जीत में कामयाब होकर दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने, तो उधर का रुख किया और अयोध्या, राम व राम मंदिर के बारे में केवल तीन साल में ही पूरी धारणा को बदलकर नई अवधारणा स्थापित कर दी। अब राम मंदिर अपने साक्षात स्वरूप में हम सबके सामने है और राम नाम की दीवानगी भी अपने साकार स्वरूप में देश में सर्वत्र देखने को मिल रही है।
अब जब भारत के कोने कोने से लोग रामलला के दर्शन करने अयोध्या पहुंच रहे हैं, ऐसे में विपक्ष जिस राम मंदिर का बीजेपी के विरोध में हथियार के रूप में उपयोग करता रहा, उस राम मंदिर का मुद्दा उसे अपने हाथ से जाता दिख रहा है। तब विपक्षी गठबंधन नए तरीके से बीजेपी, प्रधानमंत्री मोदी और संघ परिवार पर हमलों के हथियार तलाश रहा है।
विपक्ष कहने लगा है कि बीजेपी और संघ परिवार को अगर यह लगता है कि देश के विभिन्न अंचलों के श्रद्धालुओं को 'भव्य' राम मंदिर व 'दिव्य' अयोध्या का दर्शन कराकर वह लोकसभा चुनाव तक उन्हें अपना मुरीद बनाने की सफलता हासिल कर लेंगे, तो यह शायद ही संभव हो।
विपक्ष का यह 'शायद' ही उसे सीधे-सीधे हरा रहा है। हिंदुस्तान की हिंदी पट्टी में राम लहर दिख रही है और राम मंदिर के मामले में, विपक्ष अब दावे के साथ कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। हां, विपक्ष इस बार मोदी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी की बात जरूर करने लगा है, लेकिन यह बता नहीं पा रहा है कि एंटी-इनकंबैंसी है कहां? जबकि प्रधानमंत्री मोदी तो भगवान राम के मंदिर की प्रतिष्ठा करवा कर अपनी तीसरी पारी का मार्ग प्रशस्त करने में सफल हो गए हैं।
विपक्ष और खासकर कांग्रेस भले ही कहे कि वह राम या राम मंदिर के नहीं, बीजेपी व प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध है। लेकिन कांग्रेस और उसके साथियों की नीयत राम को लेकर कभी साफ रही नहीं है। वो अपने मुस्लिम वोटबैंक का ही ध्यान अधिक रखते हैं। जबकि दूसरी ओर बीजेपी हिन्दुत्व और राम के नाम पर कभी कोई समझौता नहीं करती।
याद कीजिए कि सन 2020 में पांच अगस्त को, जब प्रधानमंत्री मोदी द्वारा राम मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन के समय रामलला को साष्टांग दंडवत के बाद 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हुए तो भाजपा को कैसी जबरदस्त विजय हासिल हुई और योगी आदित्यनाथ फिर से मुख्यमंत्री बने थे।
इसलिए, विपक्ष और कांग्रेस राम मंदिर को लेकर बीजेपी को जितना कटघरे में खड़ा करेंगे, वे खुद ही कैद होते दिखेंगे। राहुल गांधी अपनी 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' पर निकले हुए हैं। पीछे विपक्ष बिखर रहा है। कांग्रेस को ममता बनर्जी, केजरीवाल और उद्धव ठाकरे समझौते में पूरी सीटें तक देने को तैयार नहीं है।
फिर विपक्ष चाहे कुछ भी कहे, मल्लिकार्जुन खड़गे की तरह व्यंग करे या फिर उद्धव ठाकरे की तरह धमकी दे, लगातार तीसरी बार सत्ता में तो फिर से बीजेपी ही आती दिख रही है। राम मंदिर निर्माण भाजपा और मोदी के लिए रामबाण का काम करेगा। विपक्ष को अगर यह नहीं दिखता तो उसकी राजनीतिक समझ पर सवाल उठना जायज है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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