Rajasthan Elections: नेताओं के टिकट पर नौकरशाहों का दावा
राजस्थान की राजनीति में विधायकों को अपना टिकट बचाने के लिए नेताओं के साथ-साथ इस बार रिटायर्ड नौकरशाहों से भी तगड़ी चुनौती मिल रही है। सेवानिवृत्त हो चुके नौकरशाह और टिकट के लिए नौकरी छोड़ने वाले अधिकारियों की एक लंबी फौज है, जो कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों से टिकट के लिए दावा ठोक रहे हैं।
राजनीतिक दलों को भी ऐसे नौकरशाहों का साथ पसंद आ रहा है। कांग्रेस और भाजपा दोनों दल अधिक से अधिक नौकरशाहों को अपने साथ जोड़ने की मुहिम में जुटे हैं लेकिन इस मामले में फिलहाल भाजपा का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। हर बार की तरह इस बार भी सत्ता परिवर्तन की संभावना को देखते हुए ज्यादातर ब्यूरोक्रेट्स की पहली पंसद भाजपा बनी हुई है।

राजस्थान में 90 दिन के भीतर विधानसभा चुनाव होने है और इस बार राजस्थान में दो दर्जन से ज्यादा नौकरशाह चुनावी मैदान में ताल ठोकने की तैयारी में है। मध्य प्रदेश के पूर्व डीजीपी पवन जैन, सेवानिवृत्त जज किशन लाल गुर्जर ने भाजपा की सदस्यता लेकर राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ने की मंशा जताई है। इसके पहले पूर्व आईपीएस जसवंत सम्पतराम, पूर्व आईएएस डॉ सत्यपाल सिंह, पूर्व आईएएस मनोज शर्मा, रिटायर्ड मुख्य आयकर आयुक्त केआर मेघवाल और रिटायर्ड अतिरिक्त आयुक्त स्टेट जीएसटी दिनेश रंगा ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है।
ऐसा नहीं है कि नौकरशाह सिर्फ भाजपा का दामन थाम रहे हैं। कांग्रेस से भी टिकट मिलने की संभावना को देखते हुए कई नौकरशाह कांग्रेस से भी नजदीकियां बढ़ा रहे हैं। जनवरी 2022 में राजस्थान के मुख्य सचिव पद से रिटायर हुए निरंजन आर्य कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। निंरजन आर्य की दलितों में पकड़ मानी जाती है। आर्य सीएम गहलोत के प्रमुख शासन सचिव (सीएमओ) भी रहे हैं। निरंजन आर्य की पत्नी संगीता आर्य को कांग्रेस ने 2008 में सोजत (पाली) से विधायक का चुनाव लड़वाया था, हालांकि वे हार गईं थीं। बाद में गहलोत ने संगीता आर्य को राजस्थान लोक सेवा आयोग का सदस्य बना दिया। अब निरंजन आर्य खुद राजनीतिक पारी की शुरुआत करना चाहते हैं और सोजत (पाली) से कांग्रेस का टिकट चाहते हैं।
पदोन्नत होकर आईपीएस बने अनिल गोठवाल चाकसू आरक्षित सीट से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के भरोसेमंद आईपीएस अफसर रहे हरिप्रसाद शर्मा राजनीति में भी अशोक गहलोत के भरोसेमंद राजनेता बनना चाहते हैं। 2018 में हरिप्रसाद शर्मा ने फुलेरा से विधायक का चुनाव लड़ने की तैयारी कर ली थी, लेकिन कांग्रेस से टिकट नहीं मिल सका। बाद में अशोक गहलोत ने मुख्यमंत्री बनने पर उन्हें कर्मचारी चयन बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया था। इस बार संभावना है कि कांग्रेस उन्हें फुलेरा सीट से उम्मीदवार बना सकती है।
राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त रह चुके चंद्रमोहन मीणा भाजपा के टिकट पर बस्सी से ताल ठोंकना चाहते हैं। भाजपा भी चंद्रमोहन मीणा को बस्सी से उतारने पर गंभीरता से विचार कर रही है क्योंकि जयपुर की बस्सी सीट पर भाजपा कमजोर है। भाजपा पिछले तीन चुनाव से इस सीट पर हार रही है। आश्चर्य की बात यह है कि यहां से निर्दलीय चुनाव जीत रहे हैं। 2018 के चुनाव में बस्सी सीट से सेवानिवृत्त आईपीएस लक्ष्मण मीणा ने निर्दलीय के रूप में जीत दर्ज की थी। इस बार भाजपा बस्सी सीट को हर हाल में जीतना चाहती है, इसलिए निर्दलीय मीणा को पार्टी का सिंबल दे सकती है।
इसके अलावा जयपुर जिले की जमवारामगढ़ सीट भी भाजपा पिछले दो चुनाव से हार रही है। इस बार जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा ने कुछ माह पूर्व उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए आईपीएस गोपाल मीणा को पार्टी की सदस्यता दिलवाकर जमवारामगढ़ में काम करने को कहा है। इसी तरह भाजपा करौली जिले की सपोटरा विधानसभा सीट से लगातार हार रही है। वर्तमान में यहां से कांग्रेस के रमेश मीणा विधायक हैं और गहलोत सरकार में पंचायती राज मंत्री है। भाजपा ने सेवानिवृत्त आईएएस पीआर मीणा को पाटी में शामिल कर लिया है। इस बात की संभावना है कि भाजपा इस पूर्व ब्यूरोक्रेट को सपोटरा से चुनाव लड़वा सकती है।
इसी तरह जाट बाहुल्य सीकर सीट को अपने खाते में करने के लिए भाजपा रिटायर्ड आईपीएस रामदेव सिंह खैरवा को यहां से मैदान में उतार सकती है। पिछले चुनाव में यहां से कांग्रेस के बागी महादेव सिंह ने निर्दलीय जीत दर्ज की थी। रिटायर्ड आईपीएस सतवीर सिंह अलवर जिले की किसी आरक्षित सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। सतवीर सिंह भाजपा से टिकट के लिए लॉबिंग कर रहे हैं। जयपुर में ट्रैफिक एसपी जैसे पद पर चुके विजय सिंह झाला बिलाड़ा (जोधपुर) से चुनाव लड़ना चाहते हैं। कांग्रेस की सदस्यता ले चुके हैं और अशोक गहलोत के भरोसेमंद माने जाते है। टोंक व दौसा जिले के कलेक्टर और जयपुर नगर निगम के आयुक्त रहे लालचंद असवाल बगरू से विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं और टिकट के लिए अपने राजनीतिक संपर्क खंगालने में लगे हैं।
अजमेर के एसपी रह चुके सेवानिवृत्त महेंद्र चौधरी भाजपा की ओर से बाड़मेर सीट के लिए जोर लगा रहे हैं। इसके अलावा भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर चुके और जयपुर के संभागीय आयुक्त रहे हनुमान सिंह भाटी चाहते हैं कि भाजपा उन्हें पुष्कर विधानसभा सीट से उम्मीदवारी दे। सीबीआई में डायरेक्टर स्पेशल के पद से रिटायर हुए मदनलाल शर्मा अलवर जिले से अपना राजनीतिक जीवन शुरू करना चाहते हैं और भाजपा के बड़े नेताओं के संपर्क में है। मदनलाल शर्मा ने भाजपा अध्यक्ष नड्डा के जयपुर दौरे के दौरान उनसे मुलाकात भी की थी।
जयपुर के संभागीय आयुक्त रहे केसी वर्मा भी भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर चुके हैं और फिलहाल निवाई (टोंक) क्षेत्र में सक्रिय हैं। केसी वर्मा ने निवाई से टिकट के लिए भाजपा में आवेदन किया है। निवाई एससी के लिए आरक्षित सीट है। भाजपा के पास कोई दमदार प्रत्याशी न होने के कारण भाजपा निवाई सीट के लिए केसी वर्मा पर दांव लगा सकती है। भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करवाने वाली समिति के सदस्य और अजमेर उत्तर से विधायक वासुदेव देवनानी का कहना है कि मोदी के नेतृत्व में समाज का हर वर्ग भाजपा से जुड़ना चाहता है। इसी कारण सेवानिवृत्त हो चुके ब्यरोक्रेट्स भाजपा के माध्यम से देश की राजनीति में सक्रिय होना चाहते हैं। इसमें कुछ गलत नहीं है। पार्टी और समाज को उनके अनुभव का लाभ मिलेगा। भाजपा से टिकट के लिए लगभग दो दर्जन ब्यूरोक्रेट्स ने आवेदन किया है। इनमें से टिकट किसे मिलेगा यह केन्द्रीय नेतृत्व तय करेगा।
लेकिन जिस तरह से नौकरशाही से राजनीति में आकर जनसेवा का चाव बढा है वह नेताओं के लिए चौंकानेवाला हो सकता है। राजस्थान की वर्तमान विधानसभा में फिलहाल चार विधायक रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स हैं। इसमें पूर्व आईपीएस हरीश मीना देवली-उनियारा से, महुआ से पूर्व आईआरएस ओमप्रकाश हुड़ला, पिलानी से पूर्व आईएएस जेपी चंदेलिया और बस्सी से पूर्व आईपीएस लक्ष्मण मीणा शामिल हैं।
लेकिन इस बार जिस तरह से नौकरशाह टिकट की दावेदारी कर रहे हैं उसने कई स्थानीय नेताओं के समीकरण गड़बड़ा दिए हैं। अपने पद पर रहते नेताओं का फेवर करने वाले ब्यूरोक्रेट्स अब अपने टिकट के लिए नेताओं का फेवर चाहते हैं। इन नौकरशाहों में से किसे टिकट मिलता है और किसे नहीं यह तो सूची जारी होने के बाद ही पता चलेगा, लेकिन लोकतंत्र में रिटायर होने के बाद नौकरशाहों का नेता बनने का चलन जमीनी नेताओं के लिए खतरे की घंटी जरूर है।












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