राजस्थान के रण में जीत भी मोदी की, हार भी मोदी की
Rajasthan Lok Sabha Elections: 2024 लोकसभा चुनाव के लिए दो चरणों में 190 सीटों के लिए मतदान संपन्न हो चुका है। देखा जाए तो दो चरण के बाद कुल लोकसभा सीटों की 35 प्रतिशत सीटों पर मतदान हो गया है जिसमें केरल, तमिलनाडु, उत्तराखंड और राजस्थान राज्यों की सभी सीटों पर मतदान पूरा हो चुका है।
370 सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही भाजपा को तमिलनाडु और केरल से भले ही बहुत अधिक उम्मीद न हो लेकिन राजस्थान में उसने 25 की 25 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा था। लेकिन मतदान पूरा हो जाने के बाद राजस्थान से जो समाचार आ रहे हैं वह निश्चित रूप से भाजपा के लिए राहत देने वाले नहीं है।

26 अप्रैल को राजस्थान में दूसरे चरण की 13 सीटों पर शाम 6 बजे तक 64.56 फीसदी मतदान हुआ। इस लिहाज से राजस्थान के दूसरे चरण में पहले चरण से ज्यादा मतदान हुआ है। पहले चरण में राजस्थान में 12 सीटों पर 57.87 फीसदी मतदान हुआ था और दोनो चरणों को मिलाकर कुल 61.60 प्रतिशत मतदान हुआ है। पिछले दो चुनाव 2014 और 2019 में भाजपा ने राजस्थान की सभी 25 सीटें जीत ली थी। भाजपा को कुछ माह पूर्व हुए विधानसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद उम्मीद थी कि 2024 के लोकसभा चुनाव में वह तीसरी बार लगातार सभी 25 सीटें जीत जाएगी लेकिन हकीकत में ऐसा होता दिख नहीं रहा है।
टिकट वितरण में केन्द्र की मर्जी, वसुंधरा राजे जैसे प्रदेश के नेताओं को पूरी तरह नजरअंदाज करना और जातिगत समीकरण और स्थानीय नेताओं की आपसी खींचतान के बीच हुए मतदान के बाद भाजपा के लिए 4 से 5 सीटों पर कड़ी चुनौती दिख रही है। भाजपा के लिए इस बार राजस्थान में सभी 25 सीटें जीतना लगभग असंभव नजर आ रहा है।
राजस्थान में दो चरणों में हुए कम मतदान ने भी भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। इस बार राजस्थान में मोदी मैजिक नहीं, जातियां निर्णायक भूमिका निभा रही हैं। राजस्थान की सबसे चर्चित सीट बाड़मेर जहां से निर्दलीय विधायक रवीन्द्र सिंह भाटी निर्दलीय मैदान में थे। भाटी के मैदान में आने से बाड़मेर का चुनाव जाट बनाम अन्य जातियों का चुनाव बन गया। इस सीट से रवीन्द्र सिंह भाटी निर्दलीय होते हुए भी जीत के दावेदार बन चुके हैं।
राजस्थान में इस बार राजपूत, जाट और दलित समाज ने उस तरह भाजपा को पूरा समर्थन नहीं दिया है जैसा पिछले दो लोकसभा चुनावों में मिलता रहा है। पहले चरण की झंझुनू, चुरू, सीकर, नागौर और दौसा जैसी सीटों पर भाजपा को जातिगत समीकरणों और दलबदलुओं के कारण कड़ी चुनौती मिल रही है। चुरू में भाजपा के सांसद रहे राहुल कस्वां ने टिकट कटने पर कांग्रेस से मैदान में उतरकर भाजपा के उम्मीदवार पैराओलपिंयन देवेन्द्र झाझड़िया को मुश्किल में डाल दिया है। नागौर में 2019 में हनुमान बेनीवाल ने भाजपा के साथ गठबंधन में कांग्रेस उम्मीदवार ज्योति मिर्धा को हराया था। इस बार मामला उलट गया और हनुमान बेनीवाल कांग्रेस के समर्थन से तो ज्योति मिर्धा भाजपा के टिकट से चुनावी मैदान में थे।
राजस्थान में संगठन के स्तर पर भी भाजपा का प्रदर्शन बेहद कमजोर नजर आया। विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद और लोकसभा चुनाव के तीन महीने पहले ही प्रदेश संगठन महामंत्री चंद्रशेखर का तबादला तेलंगाना कर दिया गया। प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी अपनी सीट चित्तौडगढ़ में बुरी तरह उलझ गए थे जिसके कारण वह प्रदेश में ध्यान नहीं दे सके। प्रदेश विधानसभा चुनाव से वसुधंरा राजे को नजरअंदाज करने का शुरू हुआ सिलसिला लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा और वसुंधरा ने अपने बेटे की सीट झालावाड़ तक अपने आप को सीमित कर लिया था।
भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को भरोसा था कि मुख्यमंत्री भजनलाल ब्राह्मण मतदाताओं को, दीया कुमारी राजपूत मतदाताओं को और उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा दलित आदिवासी को साध लेंगे, लेकिन ऐसा करने में तीनों असफल रहे। पिछले दो लोकसभा चुनाव मे राजस्थान की 25 में से 22 सीटों पर जीत का मार्जिन बहुत अधिक था। इन सीटों पर इस बार मतदान कम हुआ है और जातिगत आधार पर हुआ है, जो मोदी के लिए चिंता की बात हो सकती है। राज्य में भाजपा की जीत का मार्जिन कम होने के साथ इस बार कुछ सीटें हाथ से निकल सकती हैं।
सचिन पायलट के प्रभाव वाली दौसा सीट पर भी भाजपा फंसी है। मीणा और दलित बाहुल्य करौली धौलपुर सीट पर वसुंधरा की अनदेखी करने का असर दिखा है और कांग्रेस लड़ाई में दिख रही है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की सीट कोटा बूंदी में भाजपा के बागी और कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे प्रहलाद गुंजल ने ओम बिड़ला को कड़ी टक्कर दी है। प्रहलाद गुंजल वसुंधरा के बेहद करीबी रहे हैं और कहा जा रहा है कि वसुधंरा की अनदेखी होते देखकर ही गुंजल ने चुनावी मैदान में ओम बिड़ला को चुनौती दी है।
भाजपा के लिए पिछले लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा मार्जिन 6 लाख 12 हजार से जीतने वाली सीट भीलवाड़ा थी। कांग्रेस ने यहां से सीपी जोशी को उतारा है। सीपी जोशी की हार तय है लेकिन मार्जिन जरूर कम कर देगे। बांसवाड़ा सीट पर कांग्रेस की गहलोत सरकार में मंत्री रहे महेन्द्रजीत मालवीय को दलबदल करवा कर भाजपा ने अपनी टिकट दी थी लेकिन उनकी मुश्किल भारतीय आदिवासी पार्टी ने बढ़ा दी है। कांग्रेस ने इस सीट पर भारतीय आदिवासी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा की थी। हालांकि कांग्रेस के प्रत्याशी ने पार्टी निर्देश के बाद भी यहां से अपना नामांकन वापस नहीं लिया और वह भी मैदान में डटा रहा।
अजमेर सीट पर कम मतदान ने भी भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है। जोधपुर सीट से केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत और अलवर से केन्द्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव की जीत की संभावना है। जालौर सिरोही सीट पर पूर्व सीएम अशोक गहलोत की प्रतिष्ठा दांव पर है। उनके बेटे वैभव गहलोत इस सीट से मैदान में है। 2019 में वैभव गहलोत जोधपुर से हार गए थे। इस बार सीट बदलने पर देखते हैं कि किस्मत भी बदलती है या इस बार भी उन्हें हार का सामना करना पड़ता है। हालांकि अशोक गहलोत ने बसपा उम्मीदवार को बेटे के समर्थन में बिठाकर जातिगत समीकरणों को भी साधने की पूरी कोशिश की है।
राजस्थान की 25 सीटों में से भाजपा श्रीगंगानगर, बीकानेर, जयपुर ग्रामीण, जयपुर, अलवर, भरतपुर, अजमेर, पाली, जोधपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ, राजसमंद, भीलवाडा, कोटा, झालावाड़ बांरा, टोंक, सवाई माधोपुर में मजबूत है, वहीं कांग्रेस झुंझुनू, चुरू, सीकर, करौली धौलपुर, दौसा, नागौर, बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर सिरोही, बांसवाड़ा डूंगरपुर में भाजपा को कड़ी चुनौती दे रही है।
राजस्थान विधानसभा चुनाव जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कंधों पर उठा रखा था, उसी तरह लोकसभा चुनाव भी मोदी ने अपने कंधों पर ले लिया था। लोकसभा चुनाव की घोषणा होने से पहले मोदी राजस्थान में 4 सभाएं कर चुके थे जबकि चुनाव की घोषणा होने के बाद सभी सीटों पर मतदान होने तक मोदी राजस्थान में कुल 8 चुनावी रैलियां कर चुके थे। अपनी रैलियों के जरिए मोदी ने राजस्थान की लगभग 23 लोकसभा सीटों को कवर किया है।
भैरो सिंह शेखावत के बाद भाजपा का चेहरा बनकर उभरी वसुंधरा राजे का अपने बेटे की सीट तक सीमित हो जाना मोदी शाह के लिए एक बड़ी चुनौती थी। आंतरिक खींचतान, टिकटों को लेकर असंतोष और कार्यकर्ताओं में कम उत्साह से हुए चुनाव के बाद भी अगर भाजपा राजस्थान की 25 सीटें जीतने में कामयाब हो जाती है तो इसका पूरा श्रेय मोदी को ही जाएगा। लेकिन अगर इन सीटों में कमी आती है तो इसका जिम्मा भी मोदी के कंधों पर ही डाला जाएगा। राजस्थान में जीत भी मोदी की होगी और हार भी हुई तो मोदी की ही होगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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