Rahul remembers Vajpayee: कोई यों ही वाजपेयी के स्मारक पर सिर झुकाने नहीं जाता
राहुल गांधी सावरकर का कड़ा विरोध कर रहे हैं, जबकि सावरकर का चित्र संसद में लगवाने वाले वाजपेयी के स्मारक पर जा रहे हैं, क्योंकि वह हिन्दुओं में कट्टरवादियों और साफ्ट हिन्दुओं में एक दीवार खडी करना चाहते हैं।

राहुल गांधी का वाजपेयी के स्मारक पर जाना कांग्रेस की राजनीति का नया अध्याय है। 26 दिसंबर को राहुल गांधी सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों की समाधियों पर गए, तो उन्होंने उसमें वाजपेयी को भी शामिल किया। राहुल गांधी को भले ही अब तक उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता के कारण पप्पू कहा जाता था, लेकिन उनकी भारत जोड़ो यात्रा उनकी यह छवि तोड़ रही है।
वैसे तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे कि उनकी इस यात्रा से कांग्रेस कितनी मजबूत हुई है। यात्रा के दौरान वह हिमाचल नहीं गए, तो कांग्रेस चुनाव जीत गई, वह गुजरात गए, तो कांग्रेस की सीटें घट गईं। लेकिन मध्यप्रदेश,राजस्थान और दिल्ली में पद यात्रा के दौरान जनता से कुछ जुड़ाव तो हुआ ही है।
इस बीच यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि जिस सोनिया गांधी ने अनेकों बार वाजपेयी के लिए अपभाषा का इस्तेमाल किया, उनका बेटा राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान वाजपेयी के स्मारक पर क्यों गए। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सोनिया के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस वीर सावरकर की तरह वाजपेयी को भी अंग्रेजों से माफी मांगने वाला बताती रही थी। एक दिन पहले 25 दिसंबर को वाजपेयी के जन्मदिन पर भी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड्गे की टीम के सदस्य पांधी ने ट्विट कर के वाजपेयी को अंग्रेजों का एजेंट कहा था। जिस पर देश में बवाल खड़ा हुआ।

राहुल गांधी के वाजपेयी के स्मारक पर जा कर उनको श्रद्धांजली देने से पांधी ने अपना ट्विट तो डिलीट कर दिया, लेकिन अब इस पहेली को सुलझाना जरूरी है कि राहुल गांधी ने सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के स्मारकों पर जाने का फैसला क्यों किया। जबकि वह चाहते तो सिर्फ कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों के स्मारकों पर ही जाते।
वैसे देखा जाए तो सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों में से सिर्फ वाजपेयी एकमात्र पूर्व प्रधानमंत्री थे, जिनका कभी कांग्रेस से ताल्लुक नहीं रहा था। सच यह है कि सिर्फ वाजपेयी के स्मारक पर जाने के लिए ही उन्होंने सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के स्मारकों पर जाने का फैसला किया था। तो समझने की बात यह है कि इसके पीछे क्या राजनीति है।
वास्तव में यह कांग्रेस की एक बड़ी राजनीतिक चाल है, जिसका मकसद सिर्फ वाजपेयी के समर्थकों को एक मेसेज भेजना था। राहुल गांधी को बताया गया था कि भाजपा में मौजूद वाजपेयी के समर्थक अलग थलग हो चुके हैं, मोदी ने वाजपेयी आडवानी के सभी समर्थकों को घर बिठा दिया है, जिनमें अपर कास्ट हिन्दू और खासकर ब्राह्मण मोदी से खफा हैं। क्योंकि मोदी के राज में ब्राह्मणों की उपेक्षा की जा रही है और ओबीसी को तरजीह मिल रही है।
आप कांग्रेस की रणनीति का अंदाज इस बात से लगा सकते हैं कि वाजपेयी के स्मारक पर जाने तुरंत बाद उतर प्रदेश कांग्रेस ने भाजपा के ब्राह्मण नेता और पूर्व उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा को यूपी में राहुल गांधी की यात्रा में शामिल होने का न्योता भेजा।
कांग्रेस की रणनीति मुस्लिम वोट बैंक को अपने पीछे एकजुट करना और हिन्दू वोट बैंक को विभाजित करना है। राहुल गांधी को वाजपेयी के स्मारक पर भेज कर कांग्रेस के रणनीतिकारों का मकसद वाजपेयी को सेक्यूलर और मोदी को कट्टर हिंदूवादी बता कर भाजपा के दो खेमों को आमने सामने खड़ा करना भी है।
आप इसको इस तरीके से भी समझिए कि राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान सावरकर का कड़ा विरोध कर रहे हैं, जबकि सावरकर का चित्र संसद के सेंट्रल हाल में लगवाने वाले वाजपेयी के स्मारक पर जा कर उन्हें श्रद्धांजली दे रहे हैं, तो क्यों, क्योंकि वह हिन्दुओं में कट्टरवादियों और साफ्ट हिन्दुओं में एक दीवार खडी करना चाहते हैं, जो नेहरू के समय से मौजूद थी, उसी दीवार के कारण कांग्रेस इतने सालों तक सत्ता पर काबिज रही।
हिन्दू महासभा होने के बावजूद हिन्दू वोट कांग्रेस के साथ बना रहा था। वाजपेयी भी इस दीवार को नहीं पाट पाए थे, लेकिन मोदी ने इस दीवार को तोड़ कर कांग्रेस का सॉफ्ट हिन्दू वोट बैंक भी नष्ट कर दिया है। वाजपेयी के स्मारक पर जाने से राहुल गांधी हिन्दू एकता को तो नहीं तोड़ पाएंगे, लेकिन कांग्रेस नेताओं का मानना है कि वाजपेयी के समर्थक एक वर्ग का राहुल गांधी के प्रति सॉफ्ट कार्नर जरुर बनेगा।
वाजपेयी के समर्थकों का एक बड़ा वर्ग भाजपा में और भाजपा के बाहर भी मौजूद है। राहुल गांधी उन सब को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं। वाजपेयी इतने आदर्शवादी और ईमानदार राजनीतिज्ञ थे, 1999 में जयललिता ने सोनिया गांधी से हाथ मिला कर वाजपेयी की सरकार एक वोट से गिरा दी थी।
नरसिंह राव के कार्यकाल में सांसदों की खरीद फरोख्त देख चुके वाजपेयी के लिए एक वोट का जुगाड़ करना बहुत मुश्किल काम नहीं था। खासकर तब जब प्रमोद महाजन जैसा जुगाड़ु नेता उनके साथ था। उन्होंने सरकार गिरना बर्दाश्त किया, लेकिन एक वोट का जुगाड़ नहीं किया।
1998 में राष्ट्रपति के.आर नारायण ने सबसे बड़े दल के नेता के नाते उनसे समर्थक सांसदों की लिस्ट मांगी थी तो वाजपेयी ने साफ़ बता दिया था कि उनके पास तो 240 सांसद हैं, वह सरकार बनाने का न्योता देना चाहें तो दें, नहीं तो न दें। यह एक अलग कहानी है कि कैसे जयललिता ने तब तक समर्थन की चिठ्ठी देने से इनकार कर दिया था, जब तक वाजपेयी वित्त और गृह मंत्रालय देने के साथ द्रमुक सरकार भंग करने का वायदा नहीं करते। तीन दिन की मशक्कत के बाद हाथ पर हाथ धरे बैठे वाजपेयी की सरकार खुद राष्ट्रपति के.आर.नारायण ने बनवाई थी, वाजपेयी ने जयललिता की शर्त नहीं मानी, तो नहीं मानी।
इससे पहले 1996 में भी ऐसा हुआ था, जब डाक्टर शंकर दयाल शर्मा ने सबसे बड़े दल के नेता के नाते उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त किया था, तो उनके पास बहुमत नहीं था। कुछ सांसद प्रमोद महाजन के पास कुछ व्यक्तिगत मांगे लेकर पहुंचे थे, तो प्रमोद महाजन ने वाजपेयी से बात की थी, लेकिन वाजपेयी ने उनकी मांगों पर विचार करने से भी इनकार कर दिया था।
अटल बिहारी वाजपेयी की ऐसी अनेक विशेषताएं थी, जो उन्हें मोदी से अलग बनाती हैं। वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए दलबदल करवा कर विपक्ष की एक भी सरकार नहीं गिराई थी। इसलिए क्षेत्रीय दलों में भी वाजपेयी का मोदी से कई गुना ज्यादा सम्मान है। फारूख अब्दुल्ला, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, करुणानिधी, प्रकाश सिंह बादल, बाला साहेब ठाकरे सब वाजपेयी सरकार में हिस्सेदार थे। मोदी इनमें से किसी को भी अपने साथ नहीं रख पाए। बादल और ममता को छोड़कर बाकी सभी अब कांग्रेस के साथ हैं।












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