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Propaganda War: सोशल मीडिया के दौर में सूचना का हथियार और नैरेटिव वार

Propaganda War: सोशल मीडिया पर 'अचानक' से कुछ न कुछ वायरल होता रहता है। ऐसे ही कुछ दिन पहले 'अचानक' सोशल मीडिया पर यूपी के मुजफ्फरनगर के एक स्कूल का वीडियो घूमने लगा। वीडियो एडिट किया गया था और उसमें दिख रहा था कि एक शिक्षिका बैठी हुई है और एक-एक करके बच्चे उठकर आ रहे हैं और अपने एक साथी छात्र को थप्पड़ लगाते जा रहे हैं। लोगों की भावना फौरन आहत हो गयी और सोशल मीडिया पर शोर मचने लगा। जैसा कि होता है, बिलकुल वैसे ही सोशल मीडिया का ये शोर टीवी चैनलों की प्राइम टाइम बहसों पर पहुंचा और अगले दिन तक समाचार पत्रों में। हंगामा खड़ा करने के लिए इतना पर्याप्त था।

इसके बाद सरकारी कवायद शुरू हो गयी। एक राजनैतिक दल के बड़े नेताओं ने सत्ताधारी दल पर ये आरोप लगाना शुरू कर दिया कि नफरत की राजनीति चलाई जा रही है और उसके शिकार अब बच्चे भी हो रहे हैं। टिकैत जैसे नेता मौके पर पहुँचने लगे और बच्चों को गले मिलवाने की कवायद करके, नफरत को मिटाने की बातें भी करने लगे। इन सबके बीच कश्मीर के उस कठुवा से एक दूसरी खबर आ गयी जिसने लोगों को फिर से चौंका दिया। कठुआ पिछली बार की तरह किसी बच्ची के बलात्कार और हत्या के लिए इस बार चर्चा में नहीं था, बल्कि वहाँ भी किसी स्कूल के ही छात्र को पीट-पीट कर अस्पताल में भर्ती हो जाने लायक हालत में पहुंचा दिया गया था। कल तक जिनकी भावना आहत हो रही थी, अब वो भावनाशून्य हो गये।

Propaganda War: Weapon of Information and Narrative War in the Age of Social Media

युद्धों में सूचनाओं का क्या महत्व होता है, इसे दर्शाती हुई एक अंग्रेजी कविता शायद आपने कभी सुनी होगी। इस कविता में बताया जाता है कि एक घोड़े के नाल में ठुकी हुई कील गिर गयी, कील की वजह से नाल गिरी, नाल न होने से घोड़ा लंगड़ा हो गया, घोड़े के लंगड़े हो जाने से सवार सही समय पर नहीं पहुंचा और सवार नहीं पहुंचा तो वो चिट्ठी जिसे सवार को पहुँचाना था, वो भी समय पर नहीं पहुंची, सन्देश सही समय पर न मिलने के कारण सेना वो मोर्चा हार गयी। इस तरह एक कील की वजह से, कोई सेना एक युद्ध हार गयी।

जो आज के दौर का युद्ध होता है, उसे अक्सर फोर्थ जेनरेशन वारफेयर इसलिए कहते हैं क्योंकि उसमें सूचनाओं का प्रयोग भी हथियार की तरह होता है। खाड़ी देशों के युद्धों से पहले सद्दाम को जैविक हथियारों से लैस तानाशाह साबित करना भी ऐसे ही नैरेटिव का युद्ध था, जिसके काफी बाद अमेरिकी सेनाएं खाड़ी युद्ध में उतरी थीं। मौजूदा भारत में देखें तो ऐसे नैरेटिव का फैलना, कथानक का गढ़ा जाना, करीब-करीब हर महीने दिख जाता है।

कठुवा और मुजफ्फरनगर के स्कूलों से जुड़ा हुआ मुद्दा नैरेटिव का यही खेल समझाता है। एक दो दिन में जब भावनाओं का उद्वेग जरा ठहरने लगा है तो आम आदमी को ये समझ में आ गया है कि सारा खेल ही नैरेटिव का था। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर वाले केस में मामला कहीं से भी धार्मिक-मजहबी लड़ाई का था ही नहीं। अब पता चल चुका है कि बच्चे के पढ़ाई में कमजोर होने, ध्यान न देने के कारण उसके परिवार वालों ने ही सख्ती करने कहा था। जो वीडियो बना रहा था, वो कोई और नहीं बल्कि बच्चे का ही चाचा था। यानी जो हिन्दू-मुस्लिम का एंगल घुसेड़ा जा रहा था, वो कहीं से भी सच नहीं था।

कानूनी पक्ष जब सामने आने लगा तो पता चला कि जो तथाकथित फैक्ट चेकर मिस्टर जुबैर पहले भी लोगों के लिए "सर तन जुदा" के नारे लगवा चुके हैं, वो इस मामले में बच्चे की पहचान उजागर करके कानून तोड़ रहे थे। इसके विपरीत कठुवा कांड में बच्चे को इसलिए बुरी तरह पीटा गया था क्योंकि उसने ब्लैकबोर्ड पर "जय श्री राम" लिख दिया था। पीटने वाला अपराधकर्मी जो शिक्षक बना बैठा था, वो फारुख अहमद फिलहाल गिरफ्तार किया जा चुका है। उसका साथ देकर बच्चे को लात-घूंसों से कार्यालय में बंद करके पीटने वाला प्रधान शिक्षक मुहम्मद हाफिज फरार बताया जा रहा है।

कठुवा में हुए कांड के बारे में हम-आप केवल इसलिए जान पाए हैं क्योंकि उसी दौर में मुजफ्फरनगर की घटना को उछालने की गलती नैरेटिव गढने वालों ने कर डाली। वरना आमतौर पर भारत में हिन्दुओं को जिस घृणा का सामना करना पड़ता है, उसके बारे में कोई बात नहीं होती। ये सिर्फ भारत भर की ही बात नहीं, ये घृणा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाई जाती है। सितम्बर 2021 में "डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व" नाम से एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन हुआ जिसमें ऑड्रे त्रुस्की जैसे कथित इतिहासकारों ने हिंदुत्व को टुकड़े-टुकड़े करने के विषय पर व्याख्यान दिए थे। इस आयोजन से जुड़ी वेबसाइट पर दर्जन भर हिंदुत्व विरोधी पुस्तकों के नाम भी आसानी से मिल जाते हैं।

करीब-करीब इसी दौर में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में रश्मि सामंत नाम की हिन्दू छात्रा के साथ हुए अन्याय की ख़बरें भी आ गयी थीं। थोड़ी सी जाँच पर ही "डॉट-हेड" जैसा शब्द मिल जाता है। सर पर तिलक या बिंदी लगाने का मजाक उड़ाने के लिए "डॉट-हेड" शब्द इस्तेमाल होता है। ये तब है जब कथित रूप से विविधता को स्वीकारने के लिए विदेशी लोग कपड़े, रूप-रंग इत्यादि का मजाक न उड़ाने, बॉडी शेमिंग न करने की पैरोकारी करते कई मंचों से दिख जायेंगे।

बिलकुल यही नैरेटिव का खेल आपको उस समय भी दिखेगा जब आप हाल में किसान आन्दोलन के नाम पर दिल्ली में हुई हिंसा को देखेंगे। उस वक्त भी हिंसा करने वालों को "अन्नदाता" और "किसान" कहकर सुरक्षा दी जाती है लेकिन दूसरी तरफ किसी एक वारदात के लिए सारे हिन्दुओं पर माफी मांगने का दबाव बनाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नैरेटिव कहता है कि बहुसंख्यक (हिन्दू) आबादी, भारत में अल्पसंख्यक (मुहम्मडेन, ईसाई या सिख) आबादी का शोषण कर रही है। इसलिए अपने धार्मिक त्योहारों में हिन्दुओं को पत्थरबाजी भी झेलनी पड़ती है और पीड़ित ही अत्याचारी भी घोषित हो जाता है।

एक खास समूह के लोग हरियाणा के नूंह में, बिहार के मोतिहारी, दरभंगा, बागवा में हिन्दुओं की शांतिपूर्ण शोभायात्राओं पर पत्थर-गोलियां चलाएंगे, और वही विक्टिम-कार्ड निकाल कर पीड़ित-शोषित-वंचित भी बन जायेंगे। अपने ही देश में सावन के अंतिम सोमवार जैसे महत्वपूर्ण दिन पर नलहर के शिवमंदिर में जल चढ़ाने के लिए प्रशासन की लगाईं पाबन्दी इसी नैरेटिव से तो आती है।

नैरेटिव के युद्ध में भारत का पीछे जाना कुछ वैसा ही है जैसे कभी तलवार-तीरों के युग में तोपों के आने से हुआ था। भारतीय लोगों ने अपने हाथियार उतनी तीव्र गति से नहीं बदले हैं। हाथियों का सामना जब तोपों से होने लगा तो तोपें बेहतर होने के कारण, आक्रमणकारियों को विजय दिलाती रहीं। भारत में सिर्फ मौजूदा कानून ही नहीं, आम आदमी जो इस नैरेटिव की लड़ाई, इस कथानक के प्रहार को झेलता है, वो नए किस्म के युद्ध के नए हथियार को अपनाने के लिए तैयार नहीं है।

"हम तो प्रचार से दूर रहते हैं" जैसे जुमलों के पीछे छुपकर वो खुद को नैतिक और शत्रु से महान बताने पर तुला है। वो ये भूल जाता है कि इतिहास विजेता लिखते हैं और अगर वो हारा तो उसे इतिहास में खलनायक ही बताया जाएगा। बल्कि इतिहास तक भी प्रतीक्षा क्यों करनी है? उसे तो नैरेटिव (कथानक) में अभी ही सांप्रदायिक, अल्पसंख्यकों का दमन करने वाला, स्त्री विरोधी, पुरातनपंथी इत्यादि बताया ही जाता है। इतिहास से सीखकर या तो नैरेटिव (कथानक) की लड़ाई लड़ना सीखना होगा, या जैसा कभी तोपों से हुआ था, वैसे ही मोर्चा दर मोर्चा हार मिलती रहेगी। क्या चुनना है, वो विकल्प तो हमेशा अपने हाथ ही होता है।

लेकिन साफ तौर पर समाज के लोगों को यह समझ लेना होगा कि पुराने दौर की बनिस्बत आज के युद्धों में सीधा सेनाओं का सामना बहुत बाद में होता है। लड़ाई जब शुरू होती है तो वर्षों प्रचार तंत्र के जरिए चलती रहती है। जैसे यहां के राजाओं ने गोला बारूद को बहुत बाद में अपनी सेना में शामिल किया, वैसे ही भारतीय समाज नैरेटिव को भी अपने हथियार के रूप में स्वीकारने से हिचकिचा रहा है। उत्तर प्रदेश स्कूल काण्ड पर हंगामा और कठुआ स्कूल काण्ड पर चुप्पी, इसका उदाहरण भर है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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