Parliament Session: कानून बनाने वाली संसद फ्लाइंग किस पर क्यों अटक गयी?
Parliament Session: वह संसद जिसके बनाये कानून देश के 140 करोड़ लोगों पर बाध्यकारी होते हैं, वह अगर इस बात को मुद्दा बनाकर बैठ जाए कि संसद भवन से बाहर जाते समय किसी नेता ने फ्लाइंग किस क्यों दे दी, तो क्या इसे विकसित लोकतंत्र का लक्षण मानना चाहिए? वह भी ऐसे समय में जब संसद विपक्ष द्वारा लाये गये अनिश्वास प्रस्ताव पर बहस कर रही हो? मणिपुर हिंसा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा हो रही हो और हम एक नेता के फ्लाइंग किस को मुद्दा बनाकर बैठ गये।
इससे न सिर्फ संसद की गरिमा को चोट पहुंचती है बल्कि यह भी समझ में आता है कि सांसदों के लिए संसद नूरा कुश्ती का एक अखाड़ा भर होती है। सब अपने अपने राजनीतिक दांव से विरोधी पक्ष को पटखनी देने की फिराक में रहते हैं, जबकि उनके सामने ज्यादा गंभीर काम कानून निर्माण का होता है।

बुधवार को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते समय राहुल गांधी से स्वयं लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ही उलझते रहे और प्रधानमंत्री मोदी तथा उनके साथियों को रावण की तरह अहंकारी बताने पर "मर्यादित" भाषा के इस्तेमाल की नसीहत देते रहे। लोकसभा स्पीकर के हाव भाव से लग रहा था कि राहुल गांधी के कठोर शब्दों से वो खुद असहज हो रहे हैं। जबकि एक स्पीकर तटस्थ भाव वाला होता है। अगर कोई सांसद अपने भाषण में असंसदीय शब्दों का उपयोग नहीं कर रहा है तो उसे अपने हाव भाव, व्यवहार और शब्दों से यह संकेत नहीं करना चाहिए कि उसे कुछ अच्छा या बुरा लग रहा है। वह किसी पार्टी या सरकार का संरक्षक होने की बजाय पूरे सदन का संरक्षक होता है।
फिर भी जब राहुल गांधी ने सदन से जाते हुए "मोहब्बत की निशानी फ्लाइंग किस" किया तो भाजपा सांसदों को उन्हें घेरने का मौका मिल गया। भाजपा नेता और अमेठी से राहुल गांधी को हराने वाली स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी पर आरोप लगाया कि "उन्होंने जाते जाते एक अभद्र लक्षण के दर्शन दिये।"
स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी के फ्लाइंग किस वाले व्यवहार को न सिर्फ अभद्र बताया बल्कि इसे स्त्री विरोधी भी ठहरा दिया। राहुल के फ्लाइंग किस को ट्विस्ट देते हुए उन्होंने उसमें सदन में उपस्थित महिलाओं के साथ जोड़ते हुए कहा कि "ऐसा गरिमा विहीन आचरण इस देश के सदन में कभी नहीं देखा गया।" इसके बाद स्मृति ईरानी राहुल गांधी के खानदान तक पहुंच गयीं और कहा कि ये उस खानदान के लक्षण हैं। अगर राहुल गांधी के फ्लाइंग किस को अभद्र माना जाएगा तो फिर क्या इस खानदान वाली भाषा को भद्र कहा जाएगा?
कारण चाहे जो हो लेकिन पक्ष और विपक्ष दोनों एक दूसरे को पचा नहीं पा रहे हैं। न तो कांग्रेस नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री और भाजपा को मिलने वाले पूर्ण बहुमत को पचा पा रही है और न ही भाजपा सदन में कांग्रेस की उपस्थिति को। अंदरखाने किसकी क्या राजनीति है यह जनता न देखती है और न जानती है। टीवी स्क्रीन पर जो दिख रहा है वह यह कि दोनों ओर के लोग अपनी अपनी राजनीति साधने में लगे हैं। तीन सौ सीटों के बाद भी भाजपा के भीतर वह सहिष्णुता नदारद है जो अटल बिहारी वाजपेयी के 180 सीटों वाले जमाने में दिखती थी। जबकि राजनीतिक पतन के रसातल में खड़ी कांग्रेस की हालत "रस्सी जल गयी पर बल नहीं गये" वाली हो गयी है।
इसलिए ऐसे माहौल में किसी एक को दोषी ठहराना दूसरे के दल में खड़े हो जाने जैसा हो गया है। परंतु जनता के सामने सवाल फ्लाईंग किस से ज्यादा व्यापक और गंभीर है। जिस संसद की कार्रवाई पर हर मिनट जनता से टैक्स के रूप में वसूला गया 2.5 लाख रूपया खर्च होता हो वहां बैठे जनप्रतिनिधि राजनीतिक नूरा कुश्ती लड़ेंगे तो इससे जनता का कौन सा हित सध जाएगा? हां, इससे उनके अपने अपने वोटबैंक को एक संदेश जरूर जाता है जिस पर कुछ देर की चर्चा हो जाती है लेकिन समग्रता में यह संसदीय मर्यादा को नुकसान पहुंचाने वाला ही कहा जाएगा।
राहुल गांधी यूरोपीय मूल की मां के बेटे हैं। वो आज भी यूरोप से रिश्ता रखते हैं। उनकी पढाई लिखाई और पालन पोषण भी यूरोपीय परिवेश में हुआ है। आजकल उन पर नफरत के माहौल में मोहब्बत की दुकान खोलने का नशा भी चढ़ा हुआ है। उन्हें संभवत: उनके सहयोगियों द्वारा यह समझाया गया है कि उन्हें अपने हाव भाव, व्यवहार और शब्दों से बार बार मोहब्बत का संदेश ही देना है। ऐसे में अगर उन्होंने फ्लाइंग किस दे भी दिया तो यह इतना आपत्तिजनक कैसे हो गया? यूरोप की राजनीति में इसे बहुत अच्छा शारीरिक संकेत माना जाता है। अब तो भारत की रैलियों में भी कुछ नेता फ्लाइंग किस देने लगे हैं।
जब हमारी पूरी संसदीय प्रणाली, न्याय प्रणाली, नौकरशाही, शिक्षा और कॉरपोरेट जगत आधुनिकता के नाम पर यूरोपीय मानकों पर ही चल रही है तब उसके प्रतीकों को लेकर हम कब तक उदासीन रह सकते हैं? फिर राहुल गांधी ऐसा किसी अभद्रता वश नहीं करते। यह हाव भाव उनके लिए प्रेम की निशानी है। अभी पिछले साल जब मध्य प्रदेश में वो भारत जोड़ो यात्रा पर थे तो मालवा में कुछ लोग छतों पर खड़े होकर मोदी मोदी के नारे लगाने लगे। उस समय भी उन्होंने एक फ्लाइंग किस देकर उन तक अपनी मोहब्बत का संदेश पहुंचाया था।
फिर एक सवाल और भी है। क्या यह फ्लाइंग किस वाला इशारा नारायण राणे के उस बयान से भी बदतर है जिसने उन्होंने कहा है कि अगर "माननीय पंत प्रधान और माननीय अमित शाह के बारे में किसी ने कुछ गलत बोला तो मैं उसकी औकात दिखा दूंगा।" या फिर तमाम नेताओं द्वारा बार बार एक दूसरे की ओर अंगुली से इशारा करके बात करने, संसद में छाती ठोंककर दावा करने वाले संकेतों से भी खराब है?
इसलिए मुद्दा राहुल गांधी का फ्लाइंग किस या स्मृति ईरानी की नाराजगी नहीं है। मुद्दा संसद की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्य का है। दुर्भाग्य से उसे नष्ट करने में कोई जनप्रतिनिधि किसी से पीछे नहीं है। जनता के समस्याओं पर विचार करने वाली और उनके लिए कानून बनाने वाली संसद अगर राहुल गांधी के फ्लाइंग किस पर हंगामा करती है तो यह भी उसके गिरते स्तर का ही उदाहरण है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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