Pakistan Judiciary: क्या पाकिस्तान की बर्बादी की पटकथा वहां की अदालतों में लिखी जाती है?
क्या पाकिस्तान की अदालतें पाकिस्तान की बर्बादी का कारण हैं? क्या पाकिस्तान का ज्यूडिशियल सिस्टम पाकिस्तान के जम्हूरी सिस्टम को चलने नहीं देना चाहता?

Pakistan Judiciary: पंजाब और खैबर पख्तुनख्वा की एसेम्बलियां इमरान खान ने भंग करवा दी थी। वहां का संविधान कहता है कि भंग होने के 90 दिनों के अंदर एसेम्बली इलेक्शन हो जाना चाहिए। पर वहां का चुनाव आयोग कहता है कि इस समय ना तो उसे सरकार से पैसे मिल रहे हैं न चुनाव कराने के लिए आवश्यक फोर्स। सरकार कहती है कि मुल्क दिवालिया होने की कगार पर खड़ा है, इसलिए पहले इकोनॉमी ठीक करेंगे फिर चुनाव कराएंगे। पाकिस्तान के राष्ट्रपति ना तो सरकार की बात सुनते हैं न चुनाव आयोग की। सीधे चुनाव की तारीखों का ऐलान कर देते हैं। इसके बीच वहां का सुप्रीम कोर्ट कूद पड़ता है और चीफ जस्टिस उमर अता बांदियाल स्वतः संज्ञान लेते हैं और 9 जजों की एक खंडपीठ गठित कर देते हैं।
राजनीतिक हाराकिरी मचती है और सरकार में शामिल पीएमएल (एन) व पीपुल्स पार्टी कुछ जजों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती हैं और बेंच से चार जज बाहर हो जाते हैं। फिर भी चीफ जस्टिस चुनाव पर फैसला देने पर आमादा होते हैं और फिर यह कयासबाजी शुरू होती है कि क्या फिर से अदालत एक और सरकार को बेदखल करने की कहानी लिखने वाली है?
इतिहास गवाह कि जितनी बार भी पाकिस्तान लोकतंत्र की पटरी से उतरा है, हर बार उसमें पाकिस्तानी ज्यूडिशिरी का एक किरदार रहा है। इस फेहरिस्त में जुल्फिकार अली भुट्टो से लेकर नवाज शरीफ तक शामिल हैं। आशंका है कि शाहबाज शरीफ व इमरान खान भी ज्यूडिशियल एक्टिविज्म के शिकार होने वाले हैं। मौजूदा वजीर-ए-आजम शाहबाज को अदालत की तौहीन के मामले में उलझा कर सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है तो इमरान खान को तोशखाना (सरकारी खजाना) या बेटी होने की सूचना छिपाने के मामले में चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराया जा सकता है।
पाकिस्तान की ज्यूडिशियरी वैसे पूरी दुनिया में बदनाम है। 139 देशों की वर्ल्ड ज्यूडिशियरी रिपोर्ट में पाकिस्तान की रैंकिंग 130 वीं है। 25 लाख पेंडिंग केस की सुनवाई के लिए केवल चार हजार जज हैं। पैसे और पावर से फैसले किस तरह कराए जा सकते हैं उसके सबूत गली गली बिखरे पड़े हैं। किसी का वीडियो बाहर आ रहा है तो किसी का ऑडियो वायरल हो रहा है, कहीं कोई जज किसी का नकली हस्ताक्षर कर दे रहा है तो कोई जज अपने वरिष्ठ जज की बात मानने से इनकार कर दे रहा है।
पाकिस्तानी ज्यूडिशियरी और पाकिस्तानी पालिटिक्स एक दूसरे से ऐसे गुत्थम गुत्था हैं कि एक दूसरे से "देख लेंगे" की भाषा में बात करते हैं। पाकिस्तानी ज्यूडिशियल सिस्टम की कुछ बानगी देखते हैं। पाकिस्तान के जिस एकाउंटेबिलिटी कोर्ट के जज अरशद मलिक ने नवाज शरीफ को अल अजिजिया स्टील मिल में भ्रष्टाचार का दोषी करार दिया था, वही जज एक वीडियो क्लिप में यह कहता सुना गया कि उसने यह फैसला खुद नहीं किसी के दबाव में दिया था। मजे की बात यह है कि इस जज ने इस वीडियो में होने और अपनी बात से इनकार भी नहीं किया।
पाकिस्तान की ज्यूडिशियरी पर सबसे बड़ा धब्बा तब लगा जब प्रधानमंत्री भुट्टो को फांसी की सजा सुनाई गई। 18 मार्च 1978 को लाहौर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मुश्ताक हुसैन ने दिन में 2 बजे जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी की सजा सुनाई, जिसे बाद में ज्यूडिशियल किलिंग के रूप में जाना गया। 2011 में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी के यहां इस मामले पर समीक्षा अपील दायर की और दावा किया कि भुट्टो का ज्यूडिशियल मर्डर किया गया क्योंकि जस्टिस मुश्ताक हुसैन जुल्फिकार अली भुट्टो से व्यक्तिगत दुश्मनी रखते थे। जस्टिस मुश्ताक हुसैन को लगता था कि भुट्टो उनसे जूनियर जजों को प्रमोट कर रहे हैं और उनके साथ ज़्यादती कर रहे हैं। भुट्टो को फांसी की सजा सुनाने के बाद जस्टिस मुश्ताक हुसैन 2 साल की छुट्टियां मनाने स्विट्जरलैंड चले गए। सबको मालूम है कि उसके बाद पाकिस्तान में जनरल जिया ने क्या किया।
ऐसा ही कुछ नवाज शरीफ के साथ भी हुआ। 20 अप्रैल 2017 को एकाउंटेबिलिटी कोर्ट ने मनी लांड्रिंग और भ्रष्टाचार के आरोप में नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद और चुनाव लड़ने से आजीवन अयोग्य ठहरा दिया। 2016 में पनामा केस में नवाज शरीफ का नाम आने के बाद पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेता इमरान खान और शेख रशीद ने नवाज शरीफ के खिलाफ मुकदमा दायर कराया था। बाद में पनामा केस में तो कुछ नहीं मिला पर नवाज शरीफ को अपने बेटे की कंपनी से वेतन लेने और उसे घोषित ना करने के आरोप में सभी पदों के लिए अयोग्य ठहरा दिया गया। जिस जस्टिस आसिफ सईद खान खोसा ने नवाज शरीफ को करप्शन का 'गाॅड फादर' करार दिया, उसी जज को बाद में पाकिस्तान का चीफ जस्टिस बनाया गया।
पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने एक और प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को अपदस्थ किया। इस बार थे चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी। एक कोर्ट रूम में कुछ लोगों के बीच ही जस्टिस इफ्तिखार चौधरी ने ऐलान कर दिया कि 26 अप्रैल 2012 से गिलानी पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम नहीं होंगे। उन पर आरोप लगा कि उन्होंने अदालत के हुक्म के बाद भी आसिफ अली जरदारी के खिलाफ घोटाले की जांच दुबारा नहीं खुलवा रहे है, इसलिए उन पर अदालत की तौहीन का मामला बनता है। पाकिस्तान में इसे ज्यूडिशियल डिक्टेटरशिप की संज्ञा दी गई।
वैसे जस्टिस इफ्तिखार के कारनामें और भी बड़े बड़े हैं। इन्हें सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में तानाशाह जनरल मुशर्रफ ने 30 जून 2005 को नियुक्त किया और डेढ साल बाद ही 9 मार्च 2007 को इस्तीफा देने के लिए कह दिया। चौधरी नहीं माने तो उन्हें निलंबित कर हाउस अरेस्ट कर लिया। इसे लेकर वकीलों ने पाकिस्तान में जबर्दस्त आंदोलन चलाया और जस्टिस चौधरी पुनः बहाल किए गए।
पाकिस्तान में जस्टिस इफ्तिखार चौधरी को सुओ मोटो जज भी कहते है। स्वतः संज्ञान के नाम पर इन्होंने गदर मचा दी। पाकिस्तान स्टील के निजीकरण का मामला हो, ब्लोचिस्तान में गायब किए गए लोगों का मामला हो या मुरी परियोजना में पर्यावरण का मामला हर जगह अपनी टांग अड़ाई।
पूर्व चीफ जस्टिस शाकिब निसार के शौक और मिजाज के किस्से पाकिस्तान में मनोरंजन और न्यायिक मसखरी के विषय हैं। जस्टिस निसार ने ही इमरान खान को सबसे ईमानदार नेता बताते हुए सादिक और अमीन की पदवी दी। अब वही इमरान घड़ी चोर से लेकर प्लेबॉय के रूप में मशहूर हो रहे हैं।
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मौजूदा चीफ जस्टिस बांदियाल भी लगातार विवादों में हैं। उन पर सुप्रीम कोर्ट में गुटबाजी, जजों की नियुक्ति में मनमानी और अपने दायरे से बाहर जाकर दखल और इमरान खान का पक्ष लेने का आरोप है। पाकिस्तान की ज्यूडिशियरी की स्थिति क्या है, यह विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी के इस वक्तव्य से समझ सकते हैं - "पाकिस्तान के जज अपने दोहरे चरित्र से खुद अपना माखौल उड़वा रहे हैं।"
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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