Pakistan: भारत के कितने हित में होगा पाकिस्तान के साथ व्यापार?

Pakistan: पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने लंदन में कहा है कि पाकिस्तान के बिजनेसमैन चाहते हैं कि भारत के साथ बंद हो चुका व्यापार दोबारा से शुरु किया जाए। इशाक डार के मुताबिक इसे लेकर पाकिस्तान सीरियस है।

पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने लंदन जाकर यह बयान ऐसे समय में दिया है जबकि भारत में आम चुनाव शुरू होने वाले हैं। इसलिए चर्चा के लिए तो इस बयान का महत्व हो सकता है लेकिन वास्तविक महत्व तभी होगा जब भारत में नयी सरकार बन जाने के बाद इस पर बातचीत होगी। लेकिन बुनियादी सवाल यह है कि क्या भारत को फिर से पाकिस्तान से व्यापारिक रिश्ता बहाल करना चाहिए?

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यह एक ऐसा सवाल है जिसके जवाब में हमें यह समझना होगा कि भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापारिक रिश्ता बंद क्यों हुआ था? भारत के लिए पाकिस्तान किसी अन्य देश जैसा ही नहीं है। पाकिस्तान का जन्म भारत को मजहबी हिंसा में झोंककर और लाखों लोगों की कुर्बानी तथा बर्बादी पर हुआ है। उसके साथ न भारत का रिश्ता कभी सहज रहा है और न रह सकता है। इसका कारण सिर्फ यह भर नहीं है कि पाकिस्तान पहले दिन से कश्मीर पर दावा किये बैठा है और उसे आतंकवाद के जरिए हासिल करना चाहता है। बल्कि जब जब भारत पाकिस्तान की ओर आगे बढेगा, उसके उन घावों से खून रिसने लगेगा जो पाकिस्तान ने अपने जन्म से अब तक भारत को दिए हैं।

सर सैय्यद अहमद हों या फिर अल्लामा इकबाल या फिर मोहम्मद अली जिन्ना। किसी न किसी तरह से समय समय इन्होंने यही डर दिखाया था कि अंग्रेजों के जाने के बाद हिन्दू अक्सरियत में मुसलमान दब जाएगा। पाकिस्तान भले ही जिन्ना ने मांगा हो लेकिन अविभाजित पंजाब, सिन्ध से लेकर अविभाजित बंगाल तक मुस्लिमों ने अगर अलग पाकिस्तान का समर्थन किया तो उसके मूल में एक बड़ा कारण हिन्दू बनियों का व्यापार में वर्चस्व होना भी था।

आज भी पाकिस्तान में हिन्दुओं की पहचान हिन्दू बनिया के रूप में की जाती है। उनके लिए व्यंग में एक कहावत वहां बहुत प्रचलित है कि हिन्दू वह बनिया है जिसके मुंह में राम और बगल में छूरी रहती है। इसलिए जब 1947 में भारत को काटकर पाकिस्तान बन रहा था तब वहां के मुस्लिम व्यापारियों ने इसे अपने लिए एक अवसर के रूप में देखा था। फिर वो सिन्ध के कारोबारी रहें हों या पंजाब के कारोबारी। उन्हें लगता था कि जो व्यापारिक संभावना हिन्दू बनिया छोड़कर जा रहा है वो उसे भुना लेंगे और आर्थिक रूप से समृद्ध हो जाएंगे।

शुरुआत के दो दशक जब भारत और पाकिस्तान दोनों ही सोशलिस्ट नीति पर चल रहे थे तब पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भारत से अच्छी थी। लेकिन बांग्लादेश के अलग होते ही पाकिस्तान ने जो मजहबी रफ्तार पकड़ी तो उसकी अर्थव्यवस्था दिनों दिन बिगड़ती चली गयी। वैसे तो आर्थिक रूप से पाकिस्तान के बर्बाद होने के बहुत से कारण हैं लेकिन सबसे प्रमुख कारण भारत और हिन्दुओं से नफरत ही बनी रही। पाकिस्तान कभी अमेरिका की गोद में बैठा तो कभी चीन के आगे बिछ गया। लेकिन जब जब हिन्दू बनिया से तिजारत (व्यापार) बढाने की बात आई तब तब वहां के मजहबी मुल्लाओं ने बांग दिया कि क्या पाकिस्तान हिन्दुओं से तिजारत करने और अच्छा रिश्ता रखने के लिए बना था?

मुल्लाओं का तर्क अकाट्य है। यही कारण है कि जैसे जैसे पाकिस्तान सच्चे इस्लाम के रास्ते पर आगे बढता गया वहां के लोगों के मन में भारत को लेकर नफरत बढती गयी। जिया उल हक के जमाने से आज तक तमाम उतार चढाव के बावजूद वहां की आम अवाम ही इस बात के हक में नहीं रहती है कि भारत के साथ तिजारती रिश्ते बढाये जाएं। उनकी इस नफरत के बावजूद अगर पाकिस्तान ने भारत के साथ कुछ व्यापारिक रिश्ते रखे हैं तो उसका कारण अंतरराष्ट्रीय बाध्यता और उनकी अपनी आर्थिक मजबूरियां थीं।

लेकिन इस दौरान भी पाकिस्तान ने भारत में आतंकवाद फैलाने में कभी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। कश्मीर और पंजाब में ही नहीं मुंबई पर आतंकी हमला जैसा जघन्य कुकर्म पाकिस्तान के हुक्मरानों ने प्लान किया। एक ओर पाकिस्तान भारत के साथ व्यापार करता रहा दूसरी ओर दो दशक तक देशभर में बम विस्फोट के जरिए हजारों लोगों की जान लेता रहा। इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह तक पाकिस्तान भारत के हर प्रधानमंत्री के साथ विश्वासघात करता रहा। वहां की फौज, वहां की आईएसआई सिर्फ भारत को लहुलुहान करने को अपनी जीत समझते रहे।

मानों पाकिस्तान का होना सिर्फ भारत को परेशान करने और उसे बर्बाद करने के लिए ही है। एक दशक पहले तक टीवी पर बैठकर आईएसआई के चीफ रहे हामिद गुल जैसे हुक्मरान भारत के मुंबई या बंगलौर जैसे शहरों को बर्बाद करने की धमकी देते रहे। परमाणु बम की धमकी तो मानों उनके लिए कंचे गोली खेलने जैसा हो।

इन्हीं परिस्थितियों में 2014 में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। अपने शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने आसियान देशों के प्रमुखों को बुलाया था जिसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी शामिल थे। लेकिन जल्द ही मोदी को समझ में आ गया कि अपने खिलाफ पाकिस्तानियों की नफरत को वो किसी व्यापारिक रिश्ते से नहीं ढांक सकते। दिल्ली आकर नवाज शरीफ भी इस्लामाबाद में घिर गये और उनके बाद आये इमरान खान ने तो मोदी को छोटा आदमी बताकर अपनी हेकड़ी दिखा ही दी थी।

इतना सब होने के बावजूद भारत ने 1996 में पाकिस्तान को दिया मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) का दर्जा खत्म नहीं किया। हालांकि एमएफएन में जितनी वस्तुएं शामिल की गयी थीं पाकिस्तान उसकी चौथाई का भी व्यापार बड़ी मुश्किल से कर रहा था। लेकिन 2019 में पुलवामा में सैनिकों के काफिले पर आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को दिया एमएफएन का दर्जा वापस ले लिया। मोदी तो पहले ही पाकिस्तान से विमुख हो गये थे लेकिन पुलवामा अटैक के बाद मोदी सरकार ने दुनिया में पाकिस्तान को अलग थलग करने की नीति पर काम शुरु कर दिया।

2019 में ही सरकार में दोबारा आने के बाद जब मोदी सरकार ने कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म किया तब पाकिस्तान ने एकतरफा अपनी ओर से न केवल भारत से हाई कमिश्नर वापस बुला लिया बल्कि सभी प्रकार के व्यापारिक रिश्ते भी खत्म कर दिये। उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि जब तक कश्मीर में अनुच्छेद 370 वापस नहीं लागू कर दिया जाता, भारत से कोई तिजारती रिश्ता कायम नहीं होगा।

आज महज पांच साल में ही पाकिस्तान को यह अहसास हो गया है कि हिन्दू बनिया से व्यापारिक रिश्ता रखे बिना उसका संभल पाना मुश्किल है। चीन की कठोर शर्तों के साथ मिले कर्जों से दबा पाकिस्तान अमेरिका के सामने अपनी वैल्यू पहले ही खत्म कर चुका है। इसलिए अब उसे यह बात समझ में आ रही है कि भारत से दोबारा व्यापारिक रिश्ता बेहतर किये बिना वह अपनी बर्बाद हो चुकी अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर नहीं ला सकता।

सवाल अब भारत के सामने होगा कि क्या वह पाकिस्तान के साथ व्यापार करके एक और बेलआउट पैकेज देगा? बीते एक दशक से मोदी सरकार ने पाकिस्तान को अलग थलग करने के लिए जो डिप्लोमेटिक कार्य किया है क्या उसे व्यापार की लालच में मिटा दिया जाएगा? सवाल यह भी है जब आर्थिक रूप से कमजोर पाकिस्तान भारत की बर्बादी में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा तब आर्थिक रूप से मजबूत पाकिस्तान भारत के लिए कितना हितकर होगा? 2024 में सरकार किसी की भी बने पाकिस्तान से दोबारा व्यापार शुरु करने से पहले इन बातों पर विचार जरूर करना चाहिए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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