No Confidence Motion: अविश्वास प्रस्ताव लाकर विपक्ष ने किया आत्मघाती गोल
विपक्ष ने लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया है, जिसका गिरना तय है क्योंकि एनडीए के 331 सांसद हैं, टीडीपी के 3 और जेडीएस का एक सांसद भी एनडीए के साथ हैं। दूसरी तरफ 210 सांसद बचते हैं, अगर अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 210 वोट नहीं पड़ते तो विपक्ष का यह दावा गलत साबित हो जाएगा कि इंडिया गठबंधन मोदी के खिलाफ खड़ा हो चुका है। विपक्ष, जिसे अब वे सदन से बाहर इंडिया कह रहे हैं, उसके लोकसभा में सिर्फ 142 सांसद हैं, टीआरएस के 9 सांसद भी अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट देंगे। 9 अन्य सांसदों पर भी विपक्ष को भरोसा है कि वे अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट करेंगे।

वाईएसआर कांग्रेस-22, बीजू जनता दल-12, और बसपा-9 सांसद भी तटस्थ हैं, लेकिन इन तीनों दलों के 43 सांसदों के विपक्ष के साथ वोट किए जाने की संभावना अभी तक नजर नहीं आती। इसलिए यह तय है कि पटना और बेंगलुरु बैठकों से उसने जो माहौल बनाने की कोशिश की है, उसकी हवा अविश्वास प्रस्ताव से निकल जाएगी।
विपक्ष ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर बड़ी राजनीतिक गलती कर ली है। वह मणिपुर के मुद्दे पर बात करना चाहता था, और सरकार उसके लिए तैयार थी। गृहमंत्री अमित शाह ने मल्लिकार्जुन खड़गे और अधीर रंजन चौधरी को चिठ्ठी लिख कर कहा था कि विपक्ष मणिपुर के मुद्दे पर जितनी लंबी बहस करना चाहता है, करे, सरकार उसके लिए तैयार है, लेकिन आप बहस करिए। जबकि विपक्ष बहस के बजाए हंगामा कर रहा था।
विपक्ष की जिद्द यह थी कि पहले प्रधानमंत्री दोनों सदनों में मणिपुर पर बयान दें, फिर बहस होगी। राज्यसभा में तो बयान के बाद सवाल उठाने के नियम हैं, लेकिन लोकसभा में तो यह नियम ही नहीं है कि मंत्री या प्रधानमंत्री के बयान के बाद उस पर स्पष्टीकरण मांगा जाए। विपक्ष के नेता सदन को अपनी मर्जी से चलाना चाहते हैं, जबकि सदन नियमों से चलता है।

विपक्ष का राजनीतिक दृष्टिकोण भी इतना कमजोर क्यों हो गया है कि अपना नफा नुकसान ही नहीं देख पा रहा। वैसे भी अगर मणिपुर पर बहस होती, तो प्रधानमंत्री मोदी बहस में दखल देते हुए अपना बयान देते ही, तब आप जितने चाहे सवाल दाग सकते थे। वह संसद सत्र के पहले दिन पत्रकारों के सामने मणिपुर की शर्मनाक घटना की न सिर्फ निंदा कर चुके हैं, बल्कि देश को आश्वासन भी दे चुके हैं कि अपराधियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जाएगी। दो महिलाओं को नग्न करके पीटने का वीडियो सामने आने के बाद सात लोग गिरफ्तार भी किए जा चुके हैं।
किसी भी प्रदेश में क़ानून व्यवस्था के मुद्दे पर बहस करनी हो तो वह गृह मंत्रालय के अधीन ही आती है। विपक्ष के नेता नियम पर भी अड़े थे कि फलां नियम में बहस होनी चाहिए, फलां में नहीं होनी चाहिए। सरकार किसी भी नियम में बहस करने को तैयार थी, लेकिन मणिपुर पर बहस के बजाए मोदी को कटघरे में खड़ा करने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देकर विपक्ष ने गलती कर दी है।
अब तो खुला खेल फर्रुखाबादी होगा, अविश्वास प्रस्ताव पर दो या तीन दिन की बहस होगी। भाजपा के सांसद ज्यादा हैं, तो बोलने का मौक़ा भी ज्यादा उन्हीं को ही मिलेगा। अब बहस सिर्फ मणिपुर पर नहीं होगी, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की घटनाओं पर भी होगी, जहां महिलाओं के खिलाफ करीब करीब मणिपुर जैसी ही घटनाएं हुई हैं। राजस्थान में तो सरकार के मंत्री राजेन्द्र गुढा ने ही कांग्रेस को यह कह कर कटघरे में खड़ा कर दिया था कि मणिपुर से पहले अपना घर तो संभालों, अपने गिरेबान में तो झांको।
बंगाल में पंचायत चुनावों में मारे गए निरपराध कांग्रेस, वामपंथी और आईएसएफ के कार्यकर्ताओं की हत्याओं की भी चर्चा होगी। पंचायत चुनावों में 46 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है। बहस में जब यह मुद्दा उठाया जाएगा, तो कांग्रेस, कम्युनिस्ट और एआईएमआईएम किसके साथ खड़े होंगे। क्या वे तृणमूल कांग्रेस के साथ खड़े हो पाएंगे, जो इन हत्याओं के लिए जिम्मेदार है। अभी 18 जुलाई को जब सीताराम येचुरी का ममता बनर्जी का हाथ पकड़ते हुए फोटोवायरल हुआ था, तो बंगाल के उन कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने कम्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर में हंगामा किया, जिनके पारिवारिक सदस्यों ने तृणमूल कांग्रेस की हिंसा में अपनी जान गंवाई है।
अविश्चास प्रस्ताव लाकर विपक्ष ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है, क्योंकि न सिर्फ विपक्ष के आपसी मतभेद खुल कर सामने आयेंगे, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी को सदन में खुल कर बोलने का मौक़ा दे दिया है। वह दो घंटे बोलेंगे और धोकर रख देंगे। अविश्वास प्रस्ताव का हो हल्ला तो बहुत होगा, लेकिन अविश्वास प्रस्ताव लाकर विपक्ष ने पहली हार कबूल कर ली है, क्योंकि अब मोदी तो आखिर में बोलेंगे, वह शुरू में तो बोलेंगे नहीं। वह तो बहस का जवाब देंगे।
मोदी के विजन पर मोदी विरोधियों को कितना भी संशय हो, मोदी के विजन पर उनके समर्थकों को पूरा भरोसा है। खुद विपक्ष ने विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मोदी को अपनी नौ साल की उपलब्धियां गिनाने का स्वर्णिम अवसर उपलब्ध करवा दिया है। भाजपा का दावा है मोदी ने पिछले नौ साल में वह करके दिखाया है, जो 65 साल से नहीं हुआ था। देश ने आर्थिक मोर्चे पर बेमिसाल तरक्की की है, इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में बेमिसाल तरक्की की है। सड़कें, ट्रेन, हवाई अड्डे, पोर्ट, भारत एकदम बदल गया है। साईंस और विज्ञान के क्षेत्र में भी बेमिसाल तरक्की की है। कोरोना के दौरान भारत ने मेडिकल क्षेत्र में पूरी दुनिया में झंडे गाड़े हैं।
बहस के दौरान एनडीए के सांसद उन उपलब्धियों को गिनाएंगे और बताएंगे कि मोदी ने देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया है, आज पूरी दुनिया में इंडिया की पहचान मोदी से हो रही है। विश्व के बड़े बड़े नेता उनके विजन और कामों का लोहा मान रहे हैं, यह देश का बच्चा बच्चा जानता है, और आप उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर देश और दुनिया में क्या मैसेज दे रहे हो।
अब मुद्दा मणिपुर नहीं रहा, अब मुद्दा अविश्वास प्रस्ताव हो गया है, मणिपुर पर बहस न करके, और अविश्वास प्रस्ताव लाकर विपक्ष ने साबित कर दिया कि वह इतने दिन तक मणिपुर की शर्मनाक घटना को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा था। अविश्वास प्रस्ताव के जरिए विपक्ष शायद अपनी एकता का अहसास करवाना चाहता है। यह अहसास वह दिल्ली अध्यादेश के बिल पर भी करवा सकता था, जिसे केबिनेट ने मंजूरी दे दी है।
विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाकर मोदी को विधानसभा चुनावों में प्रचार का मौक़ा दे दिया है, क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव पर उनके जवाब को देश भर के चैनलों पर सीधा प्रसारित किया जाएगा। दूसरी तरफ लोकसभा में विपक्ष का कोई ऐसा नेता नहीं है, जो देश को प्रभावित करने की क्षमता रखता हो। कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी को कौन सुनेगा। सोनिया गांधी क्या और कितना बोलेंगी। समाजवादी पार्टी के पास कोई बोलने वाला नहीं है, राजद-जेडीयू में कोई बोलने वाला नहीं, लेफ्ट में भी कोई असरदार बोलने वाला नहीं। विपक्ष के बोलने वाले सभी नेता लोकसभा का चुनाव हार गए थे, वे सब अब राज्यसभा में हैं, और अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में पेश होता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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