Opposition Unity: क्या पटना में मिला मोदी को हराने का फार्मूला?

Opposition Unity: अगस्त 2022 में जबसे नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़ा है तभी से भाजपा विरोधी दलों को एकसाथ लाने की मुहिम में जुटे थे। आखिरकार 23 जून को पटना में वो अपने अधिकारिक आवास 1, अणे मार्ग पर विपक्षी एकता के नाम पर प्रमुख दलों को एक छत के नीचे लाने में सफल रहे। 15 विपक्षी दलों के 27 नेता विपक्षी एकता के इस मेले में जुटे थे। नीतीश के आवास पर ढाई घंटे चली बैठक में सभी दलों ने अपने-अपने विचार रखे। सबसे खास बात यह रही कि विपक्ष के सभी दलों ने मोदी के साथ साथ ईडी का जिक्र भी किया और दोनों से छुटकारा पाने के लिए एकसाथ आने पर सहमति दिखायी।

विपक्षी एकता में शामिल सबसे बड़े दल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी का कहना है कि सभी दलों में कुछ न कुछ मतभेद होने के बाद भी एकसाथ लड़ने पर सहमति बनी है और हिन्दुस्तान की नींव को बचाने के लिए यह एकता जरूरी है। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि पटना शहर जनआंदोलनों का गवाह रहा है और इस शहर से एक और जनआंदोलन की शुरूआत होने जा रही है।

Opposition party meeting Has the formula found to defeat Modi in Patna?

पटना में आयोजित विपक्षी एकता की बैठक मे भले ही 15 दल शामिल हुए हों लेकिन नीतीश की कोशिश किसी भी तरह मोदी विरोध में खड़े प्रमुख दलों कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, भारत राष्ट्र समिति, समाजवादी पार्टी, उद्धव की शिवसेना और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को एक साथ लाने की थी। इसमें नीतीश कुमार सफल रहे। नीतीश कुमार का आकलन है कि प्रमुख राष्ट्रीय दल कांग्रेस यदि बिहार, बंगाल, दिल्ली, पंजाब, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के क्षेत्रीय दलों के साथ सीट बंटवारे में अतिरिक्त उदारता बरते तो मोदी को स्पष्ट बहुमत पाने से रोका जा सकता है।

नीतीश कुमार का आकलन है कि बिहार, बंगाल, दिल्ली, पंजाब, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र इन 7 राज्यों से लोकसभा की कुल 247 सीटें आती हैं। भारतीय जनता पार्टी के पास इस समय इन 247 सीटों में से 133 सीटें है, जो इन सीटों का 54 प्रतिशत है। लेकिन विधानसभा गणित बताता है कि इन सात राज्यों में से पांच राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है। सिर्फ उत्तर प्रदेश में भाजपा की पूर्ण बहुमत और महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार है। ऐसे में नीतीश को लगता है कि इन राज्यों में कांग्रेस अतिरिक्त उदारता का परिचय दे और इन राज्यों के क्षेत्रीय दल कांग्रेस को अन्य राज्यों में मदद करें तो भारतीय जनता पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत लाने से रोका जा सकता है।

अगर विपक्षी एकता की आगामी शिमला बैठक सफल होती है और सभी दल एकसाथ मिलकर भाजपा के खिलाफ एक उम्मीदवार उतारने के फार्मूले में सफल हो जाते हैं तो इसका सीधा असर 12 राज्यों की 328 लोकसभा सीटों पर पड़ना तय है। इन 328 सीटों में अभी 128 विपक्षी पार्टियों और 165 बीजेपी के पास है। बाकी सीटें अन्य पार्टियों के पास हैं, जो किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं है।

2019 के आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में 97 लोकसभा की सीटें ऐसी हैं, जहां 2019 में क्षेत्रीय दल का किसी दूसरे क्षेत्रीय दल से मुकाबला था। इनमें क्षेत्रीय दल ही नंबर-1 और नंबर-2 पर थे। बीजेपी और कांग्रेस लड़ी भी तो नंबर-3 और नंबर-4 रही। 43 सीटें ऐसी हैं, जहां बीजेपी और कांग्रेस की सहयोगी पार्टियों के बीच मुकाबला हुआ।

आपसी मतभेदों को सुलझाने पर जोर

बैठक में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राष्ट्रीय जनता दल के सुप्रीमो लालू यादव और महाराष्ट्र के दिग्गज नेता शरद पवार ने बैठक में कहा कि यह सारी कवायद राष्ट्रीय हित में बड़े लक्ष्य को सामने रखकर की जा रही है। ऐसे में सभी दलों को निजी राजनीतिक हितों को पीछे रखना होगा। नीतीश ने कहा कि राजद के विधायक ज्यादा होने के बाद भी बिहार के हित के लिए राजद ने मुख्यमंत्री पद की मांग नहीं की। वहीं शरद पवार ने अपने गृह राज्य महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहा कि हम और शिवेसना पिछले 25 सालों तक एक दूसरे के खिलाफ लड़े, लेकिन फिर हम सब कुछ भूलकर साथ आए। इस बैठक में नीतीश ने सभी दलों को आगाह किया कि भारतीय जनता पार्टी विरोधी दलों में तोड़फोड़ करने के लिए सभी हथकंडे अपनाती है। ऐसे में हमें अपने विधायकों, सांसदों और नेताओं को भाजपा से बचाना होगा। लालू प्रसाद यादव ने अपने अंदाज में भाजपा को नेता चोर पार्टी करार दिया, जिसके बाद बैठक में हंसी का माहौल बन गया।

विपक्षी दलों का मानना है कि इस एकजुटता को विपक्षी एकता या मोदी विरोध का रूप देने की बजाए इसे विचारधारा की लड़ाई के रूप में पेश कर 2024 के चुनाव में जाना चाहिए। बैठक के बाद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि 'यह विचारधारा की लड़ाई है, जिसमें हम सभी एक साथ खड़े हैं। हम सभी में थोड़े-बहुत मतभेद हो सकते हैं, लेकिन हमने तय किया है कि एक साथ काम करेंगे।' ममता बनर्जी ने इस एकता को आंदोलन के रूप में जनता के सामने पेश करने का प्रस्ताव दिया। ममता बनर्जी का कहना था कि इसे विपक्ष की लड़ाई न कहते हुए विचारधारा की लड़ाई रूपी आंदोलन के रूप में बताया जाए जिससे विपक्षी मंच की तस्वीर को कहीं एक ज्यादा बड़ा, गहरा और गंभीर स्वरूप मिल सके।

पटना में नीतीश की विपक्षी एकता में जो नेता पहुंचे उसमें तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके के नेता एम के स्टालिन, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी की नेता ममता बनर्जी, उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप नेता अरविंद केजरीवाल, पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, राघव चड्ढा, संजय सिंह, लेफ्ट से डी राजा, दीपांकर भट्टाचार्य, सीताराम येचुरी और पीडीपी की महबूबा मुफ्ती। कांग्रेस से मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी, एनसीपी से शरद पवार, सुप्रीया सुले, प्रफुल्ल पटेल, जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला, सपा के अखिलेश यादव, शिवसेना (यूबीटी) के उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे, संजय राऊत, झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन, बिहार के मुख्यमंत्री, जेडीयू नेता और विपक्षी एकता के शिल्पकार नीतीश कुमार, संजय झा, ललन सिंह और बिहार में नीतीश के साथ सत्ता मे शामिल राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और लालू यादव।

पटना की बैठक को सफलतापूर्वक आयोजित करके जहां नीतीश कुमार ने राजनीति की राजधानी पाटलीपुत्र में कई दिनों की चर्चा का मसाला दे दिया है वहीं पटना से आगे शिमला जाने का रास्ता भी साफ हो गया है। जुलाई में शिमला में होनेवाली बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे करेंगे। हांलाकि कांग्रेस ने नीतीश कुमार को विपक्षी एकता की पहली बैठक कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान में करने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन नीतीश कुमार ने कांग्रेस को समझाया था कि विपक्ष के कई दल पहली ही बैठक कांग्रेस के नेतृत्व में करने से असहज हो सकते हैं इसलिए पहली बैठक पटना में की जाए।

लेकिन पटना से आगे अब शिमला में कांग्रेस शासित राज्य में दूसरी बैठक होगी। वहां सबसे पहले विपक्षी एकता के मोर्चे का नाम और संयोजक तय किया जाएगा। इसके बाद उन सीटों पर विपक्ष की ओर से साझा उम्मीदवार देने पर सहमति बनायी जाएगी जहां कांग्रेस कमजोर है। प्रमुख विपक्षी दलों द्वारा पटना की तपती गर्मी से मोदी को हराने के जिस फार्मूले पर शोध शुरु हुआ है देखना यह है कि शिमला की सर्द वादियों में वह कितना ठोस आकार ले पाता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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