Assembly Elections: तीन राज्यों के चुनावों में केजरीवाल की अहमियत
Assembly Elections: अरविन्द केजरीवाल के अगले राजनीतिक कदम से कांग्रेस आशंकित है| हाल ही में एक बड़े सर्वे संस्थान ने इस साल नवंबर और दिसंबर में होने वाले तीन राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सर्वे किया था, तो मध्यप्रदेश में 42 प्रतिशत, छतीसगढ़ में 41 प्रतिशत और राजस्थान में 47 प्रतिशत लोगों का मानना था कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकती है| इसलिए कांग्रेस हाईकमान चाहता है कि केजरीवाल इन राज्यों में उसके रास्ते की बाधा न बनें| लेकिन सबसे पहले जरूरी है कि कांग्रेस के भीतर केजरीवाल का विरोध करने वालों का मुहं बंद हो|
16 अगस्त को राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के नेताओं से लंबी बातचीत की थी| बैठक खत्म हो जाने के बाद राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस के उन नेताओं को अलग से बुलाया, जिन्होंने सुबह की बैठक में अरविन्द केजरीवाल के साथ किसी तरह का चुनावी तालमेल करने का विरोध किया था| कांग्रेस आलाकमान का इरादा उन्हें केजरीवाल के खिलाफ शांत करना था|

कांग्रेस नेतृत्व को इस बात का एहसास है कि गठबंधन में शामिल होने से अरविन्द केजरीवाल को ही ज्यादा फायदा होगा| लेकिन कांग्रेस ऐसा मान रही है कि अगर अरविन्द केजरीवाल को साथ लेने से भाजपा को नुकसान होता है, तो यह मुनाफे का सौदा है। क्योंकि केंद्र में सरकार बनने की स्थिति पैदा होती है तो केजरीवाल के सांसद कांग्रेस का समर्थन करने को मजबूर होंगे| कांग्रेस का दूसरा दृष्टिकोण मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों को लेकर भी है| कांग्रेस गुजरात और गोवा में यह सबक सीख चुकी है कि अरविन्द केजरीवाल इन तीनों राज्यों में कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं| गठबंधन में रखते हुए उन पर दबाव बनाया जा सकता है कि वह इन तीनों राज्यों में कांग्रेस का खेल बिगाड़ने का काम न करे|
इस संबंध में मल्लिकार्जुन खड़गे ने केजरीवाल की पैरवी कर रहे नीतीश कुमार से शुरुआती बात भी की है| हालांकि अरविन्द केजरीवाल ने इन तीनों राज्यों में चुनाव लड़ने का मन बनाया हुआ है| वह राजस्थान में तीन, मध्य प्रदेश में दो और छत्तीसगढ़ में भी तीन रैलियां कर चुके हैं| इंडिया गठबंधन में शामिल होने के बाद भी केजरीवाल ने इन तीनों प्रदेशों के दौरे किए हैं| शनिवार 19 अगस्त को भी केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान छत्तीसगढ़ में थे| पिछले तीन महीनों में छत्तीसगढ़ में यह उनका तीसरा दौरा था|

दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के नेताओं अजय माकन, संदीप दीक्षित, अनिल चौधरी, अरविन्दर सिंह लवली, देवेन्द्र यादव और रमेश सभरवाल ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को अपनी आवाज धीमी करने पर तो सहमति दी है, लेकिन आवाज़ बंद करने की गारंटी नहीं दी| अलबत्ता कांग्रेस के इन नेताओं ने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को सावधान किया है| संदीप दीक्षित, जो केजरीवाल के खिलाफ सबसे ज्यादा मुखर हैं, ने कहा कि कांग्रेस की बैठक में गठबंधन को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई, बैठक में सिर्फ पार्टी को दिल्ली में मजबूत करने की चर्चा हुई थी| लेकिन साथ ही उन्होंने आम आदमी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए यह भी जोड़ा कि "हम" केजरीवाल पर भरोसा नहीं कर सकते| अब यह एक पहेली है कि हम का मतलब कांग्रेस से है, या केजरीवाल का विरोध कर कर रहे दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के नेताओं से है|
शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित दिल्ली से सांसद रह चुके हैं, और उनका गांधी परिवार के साथ उतना ही घनिष्ठ रिश्ता है, जितना माधव राव सिंधिया का था| राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ अकेले में हुई बैठक के बावजूद उनके तेवरों में कोई कमी दिखाई नहीं दे रही| अटकलें यहां तक लग रही हैं कि वह अगले ज्योतिरादित्य सिंधिया हो सकते हैं| दिल्ली सेवा बिल पर कांग्रेस की ओर से समर्थन कर दिए जाने के बाद भी संदीप दीक्षित ने बयान दिया था कि यह बिल पास होना चाहिए| सच यह है कि उनकी मां शीला दीक्षित मुख्यमंत्री रहते हुए 2013 में केजरीवाल से विधानसभा चुनाव हार गई थी, वह हार अभी भी उन्हें हजम नहीं हो रही|
फिलहाल स्थिति यह है कि आम आदमी पार्टी ने नवंबर दिसंबर में होने वाले तीनों हिन्दी भाषी राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सारी सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान किया हुआ है| तेलंगाना में वह चुनाव मैदान में नहीं उतरेगी, क्योंकि वहां के मुख्यमंत्री केसीआर ने इंडिया गठबंधन में नहीं होने के बावजूद दिल्ली सेवा बिल का संसद के दोनों सदनों में विरोध किया था|
2018 में भी आम आदमी पार्टी ने इन तीनों राज्यों में चुनाव लड़ा था। राजस्थान में 142 सीटों पर, मध्यप्रदेश में 208 सीटों पर और छत्तीसगढ़ में 85 सीटों पर चुनाव लड़ा था| लेकिन तब लगभग सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई थी| उनके सभी उम्मीदवारों के वोटों को जोड़ दिया जाए, तो भी उन्हें नोटा से कम वोट मिले थे| लेकिन अगर तीनों राज्यों की तुलना करें, तो छत्तीसगढ़ में परफॉर्मेंस थोड़ी बेहतर थी| हालांकि छत्तीसगढ़ में उसका वोट प्रतिशत 0.9 प्रतिशत, मध्यप्रदेश में 0.7 प्रतिशत और राजस्थान में 0.4 प्रतिशत ही वोट मिले थे| इन तीनों राज्यों में 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी थी|
तीनों राज्यों में हार के बाद दिया गया केजरीवाल का बयान कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण बन गया है। वही बयान कांग्रेस को आश्वस्त कर रहा है कि केजरीवाल आखिरकार इन तीनों राज्यों में भी कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन कर लेंगे| तब केजरीवाल ने कहा था कि इन चुनाव नतीजों से स्पष्ट है कि जनता नरेंद्र मोदी को हराना चाहती है| इसलिए उसने उस पार्टी को वोट दिया, जो मोदी को हरा सकती है|
16 अगस्त को हुई कांग्रेस की बैठकों के तीसरे ही दिन अरविन्द केजरीवाल पंजाब के मुख्यमंत्री को साथ लेकर छत्तीसगढ़ पहुंच गए, जहां उन्होंने उसी तरह राज्य के वोटरों के लिए गारंटी पत्र जारी किए जैसे गुजरात में जारी किए थे| इन गारंटी पत्रों में बताया गया है कि राज्य में सत्ता में आने पर उनकी पार्टी क्या क्या लागू करेगी| अपने प्रचार से गुजरात में कांग्रेस का वोट बैंक बड़ी संख्या में अपनी तरफ आकर्षित करके कांग्रेस की शर्मनाक हार सुनिश्चित करने वाले केजरीवाल अब तीन राज्यों में क्या करेंगे, कांग्रेस की यही सबसे बड़ी चिंता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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