One Nation One Election: संघीय ढांचे और बहुदलीय लोकतंत्र के लिए खतरा है एक साथ चुनाव
One Nation One Election: एक देश एक चुनाव के पक्षधर लोगों के पास इसके समर्थन में कहने के लिए कुछ खास नहीं है, सिवाय इस बात के कि ऐसा होने पर बहुत सारे संसाधन और समय की बचत होगी। या फिर ऐसा होने से देश में पांच साल तक राजनीतिक स्थिरता का माहौल रहेगा।
एक देश एक चुनाव पर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द की अध्यक्षता में गठित समिति ने भी राष्ट्रपति को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कुछ खास तर्क प्रस्तुत नहीं किया है। समिति ने कुछ संवैधानिक संशोधन का सुझाव जरूर दिया है ताकि देश में एक साथ चुनाव संभव हो सके।

लेकिन ये संवैधानिक संशोधन अगर होते हैं तो सीधे तौर पर भारत के बहुदलीय लोकतंत्र और संघीय ढांचे को चुनौती पेश कर देंगे। मसलन कमेटी ने सुझाव दिया है कि एक देश एक चुनाव वाली व्यवस्था लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करना होगा। संविधान के ये सभी अनुच्छेद सामान्यतया संसद और विधानसभाओं के कार्यकाल, राष्ट्रपति और राज्यपाल के संबंधित अधिकार और राष्ट्रपति शासन से संबंधित हैं।
स्वाभाविक है कि अगर एक देश एक चुनाव के फार्मुले पर चलना है तो संविधान के इन अनुच्छेदों में संशोधन करना होगा। यही वो प्रावधान हैं जो तकनीकी रूप से देश के बहुदलीय लोकतंत्र और संघीय ढांचे का बचाव करते हैं। जैसे अनुच्छेद 83 में संसद का कार्यकाल 5 वर्ष के लिए निर्धारित किया गया है।
इसी में राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल लगाने का भी प्रावधान है। लेकिन आपातकाल किसी भी परिस्थिति में एक वर्ष से अधिक नहीं हो सकता। मतलब राष्ट्रपति किसी विषम परिस्थिति में अगर संसदीय अधिकारों को अपने हाथ में लेकर स्वयं प्रशासनिक कार्य संचालित करते हैं तो भी उन्हें एक साल के भीतर संसद को पुन: बहाल करना होगा।
अगर कभी ऐसी परिस्थिति आती है कि संसद में सत्ताधारी दल अपना बहुमत खो देता है तो भी संयुक्त दलों की सरकार के जरिए पांच साल का कार्यकाल पूरा किया जा सकता है। अगर ऐसी परिस्थिति नहीं बनती है तब दोबारा से आम चुनाव कराना राष्ट्रपति की मजबूरी बन जाएगा। लेकिन अगर यह संशोधन कर दिया जाए कि केन्द्र में चुनी हुई सरकार राजनीतिक अस्थिरता के कारण एक दो साल में ही गिर गयी तथा विपक्षी दलों की सरकार बना पाने की स्थिति नहीं है तो बाकी के तीन साल देश में राष्ट्रपति शासन ही रहेगा।
कमोबेश यही हालात राज्यों में भी हो जाएंगे। अगर किसी राज्य में पांच साल से पहले कोई सरकार गिरती है और दूसरे दल सरकार बना पाने की स्थिति में नहीं हैं तो वहां भी शेष अवधि के लिए राष्ट्रपति शासन ही रखना होगा। इसीलिए कोविंद कमेटी अनुच्छेद 172 और 174 में संशोधन का सुझाव दे रही है। ऐसा करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 356 में भी संशोधन करना होगा जो कि किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने से संबंधित है।
कुछ देर के लिए मान लिया जाए कि केन्द्र में बैठी कोई सरकार ये सभी संवैधानिक संशोधन करके एक देश एक चुनाव को लागू कर देती है तब संसद की बजाय राष्ट्रपति के पास असीमित शक्तियां केन्द्रित हो जाएंगी। यह सीधे तौर पर देश में बहुदलीय लोकतंत्र की बजाय राष्ट्रपति शासन या प्रेसिडेन्ट रुल को बढावा देने जैसा होगा। कानून बनाने की जो शक्ति अभी पांच साल संसद और विधानसभाओं के पास रहती है वो विषम परिस्थिति आने पर या तो राष्ट्रपति के पास केन्द्रित हो जाएगी या फिर उस शेष अवधि के लिए कानून बनाने का काम ही रुका रहेगा।
यहां एक समस्या और दिखती है। जो लोग आज यह तर्क दे रहे हैं कि लगातार चुनाव से राष्ट्र के संसाधनों पर बोझ बढ़ता है वो इस बात को नहीं समझ पाते कि चुनाव लोकतंत्र को जीवंत रखते हैं। अगर मध्यावधि चुनाव की परिस्थिति कभी आती भी है तो इसे बोझ मानने की बजाय राजनीतिक कमजोरी मानना चाहिए कि वो अपने निजी स्वार्थ के लिए जनता के पैसे का दुरुपयोग करके बार बार चुनाव में चले जाते हैं। सत्तर और नब्बे का दशक छोड़ दें तो बाकी के पचास साल भारत की जनता और नेताओं ने राजनीतिक परिपक्वता का ही परिचय दिया है और स्थिर सरकारों को ही चुना है।
लेकिन स्थिर सरकारों के साथ एक समस्या और पैदा होती है कि कोई एक दल जब लंबे समय तक शासन में रहता है तो उसके भीतर सत्ता का अहंकार और अधिनायकवादी प्रवृत्ति पनपने लगती है। ऐसी स्थिति में एक दल भले उसे चुनौती न दे सके लेकिन दलों का गठबंधन बनाकर ही ऐसे एकदलीय अधिनायकवाद को समाप्त किया जाता है।
इंदिरा गांधी के आपातकाल के विरुद्ध जनता पार्टी की अगुवाई में बना गठबंधन हो या राजीव गांधी के प्रचंड बहुमत के खिलाफ वीपी सिंह की अगुवाई में बना गठबंधन हो। दोनों ही समय में कोई एक दल सत्ताधारी दल को चुनौती नहीं दे सकता था इसलिए संयुक्त रूप से मिलकर इंदिरा गांधी की 'अधिनायकवादी' या फिर राजीव गांधी की 'भ्रष्ट' सरकार को उखाड़ फेंका था।
ऐसी परिस्थिति में मध्यावधि चुनाव जरूर हुए लेकिन वो लोकतंत्र की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी मजबूती की निशानी थे। अगर एक देश एक चुनाव वाला नियम होता तो लोकतंत्र का ऐसा जीवंत चरित्र कभी सामने नहीं आता। परंतु इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि दोनों ही मौकों पर विपक्षी गठबंधन का हिस्सा रही जनसंघ/भाजपा ही आज 'एक देश एक चुनाव' की मुखर वकालत कर रही है।
एक देश एक चुनाव का एक संकट और है। वह यह कि यह भारत के संघीय ढांचे पर भी प्रहार करता है। खतरा सिर्फ चुनी हुई सरकारों को हटाकर एकसाथ चुनाव करा लेने का ही नहीं होगा। जो लोग आज चुनावी खर्चे की बात कर रहे हैं कल को वो अलग-अलग विधानसभाओं के अस्तित्व पर भी सवाल खड़ा कर सकते हैं। जब एक केन्द्रीय कानून ही पूरे देश में लागू होता है तब हर राज्य में कानून बनाने के लिए विधानसभा औचित्य पर भी सवाल उठाया जा सकता है। एक देश एक चुनाव के समर्थक कल को यह सवाल भी उठा सकते हैं कि जब सारा कार्य नौकरशाही के जरिए ही होना है तो अलग अलग राज्यों में विधायकों, मंत्रियों, सरकारों का खर्च उठाने की जरूरत क्या है?
जहां तक राज्यों से प्रतिनिधित्व की बात है तो संसद का आकार बढाकर हर राज्य के प्रतिनिधित्व को केन्द्र में ही बढा दिया जाएगा। ऐसा होने पर राज्य सरकारों का लाखों करोड़ का खर्चा बचेगा जो देश के विकास में इस्तेमाल होगा। फिर यही लोग यह तर्क भी दे सकते हैं कि देश में द्विदलीय शासन प्रणाली लाई जाए ताकि छोटे दलों की किचकिच से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाए। क्योंकि अगर एक देश एक चुनाव के जरिए स्थिर सरकारों की ओर बढना ही है तो आज नहीं तो कल देश में द्विदलीय शासन व्यवस्था को लागू करना ही पड़ेगा। बिना इसके एक देश एक चुनाव के जरिए पांच साल तक स्थिर सरकार दे पाना संभव ही नहीं होगा।
इसलिए यह समझने की जरूरत है कि एक देश एक चुनाव को जिस तरह से दिखाया जा रहा है, उसका चरित्र वैसा है नहीं। इसे लागू करने पर भारत के उस संघीय ढांचे और बहुदलीय लोकतंत्र के सामने चुनौती खड़ी हो जाएगी जिसे आज से 75 साल पहले अंगीकार किया गया था। बार बार होनेवाले चुनाव को नियंत्रित करने का वह तरीका नहीं हो सकता जो एक देश एक चुनाव के नाम पर सुझाया जा रहा है।
अगर बार-बार के चुनावी खर्चे से बचना है और स्थिर सरकारों की ओर आगे बढना है तो राजनीतिक नेतृत्व को यह जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेनी होगी। येन केन प्रकारेण सरकार बनाने का लोभ, दूसरे दलों में तोड़ फोड़ या विपक्ष के अस्तित्व को समाप्त करने का प्रयास मध्यावधि चुनावों का बड़ा कारण बनते हैं। अगर देश में राजनीतिक स्थिरता चाहिए तो राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेवारी बनती है कि वो ऐसा जिम्मेदार व्यवहार करें कि जनता का उन पर भरोसा बने। एक देश एक चुनाव जैसे चुनावी जुमलों से लोकतंत्र का वह लक्ष्य हासिल नहीं होगा जिसका दिवास्वप्न दिखाया जा रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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