पश्चिम बंगाल- केवल मूर्ति नहीं, टूटी हैं लोकतांत्रिक परंपराएं भी
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में 'हिंसा' ही चुनाव प्रचार की सामग्री बन गयी। एक दिन पहले चुनाव प्रचार ख़त्म हो जाएगा। मतलब ये कि 'हिंसा' औपचारिक रूप से ख़त्म हो जाएगी। मगर, क्या वोटिंग के दिन यह हिंसा फिर से नहीं जागेगी? जवाब है- निश्चित रूप से जागेगी। तो क्या वोटिंग भी समय से पहले ख़त्म कर देंगे? यह सवाल चुनाव आयोग से है जिसका जवाब नहीं मिलना तय है। 'हिंसा' का मतलब सिर्फ आगजनी, पत्थरबाजी, तोड़फोड़ नहीं है। जंतर-मंतर पर बीजेपी के लोकतांत्रिक धरना, ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी का मार्च और वामदलों के नेतृत्व में ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही बीजेपी और तृणमूल की कोशिशों के विरोध में पैदल मार्च- ये सभी उस 'हिंसा' का ही हिस्सा हैं। वारदात तो राजनीति में पैदा हुई हिंसक भावनाओं के निश्चित परिणाम भर हैं।

कोलकाता पहुंचने से पहले अमित शाह ने कहा था कि "ममता दीदी, कल मैं आ रहा हूं। हिम्मत है तो मुझे गिरफ्तार कर लेना।" हिंसा इन शब्दों में है जो आहट दे रही थी कि कुछ हो सकता है। ईश्वर चंद्र विद्यासागर कॉलेज परिसर के बाहर अमित शाह की रैली पर पत्थरबाजी या उसकी कथित प्रतिक्रिया में आगजनी करती भीड़, जो रैली का हिस्सा थी- ये महज वारदात हैं। कौन घटना पहले घटी, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण ये है कि जो घटना घटी, वह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सबसे बड़ी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में हुई।
तब गांधी ने दंगाइयों को रोक दिया था
यह 1947 वाला कलकत्ता ही है जो आज कोलकाता है। 1947 में विभाजन के बाद कलकत्ता तब हिन्दू-मुस्लिम दंगों में जल रहा था और महात्मा गांधी ने वहां पहुंचकर दंगाइयों को शांत कराया था। 1947 के बाद यह 2019 है जब देश की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह की आंखों के सामने उनके कार्यकर्ता बेकाबू होते कैमरे में कैद हैं। ये कैसे नेता हैं जो अपने कार्यकर्ता तक को काबू में नहीं रख पाए? महात्मा गांधी का नाम सामने रखकर तुलना करने के लिए क्षमा करें। अमित शाह प्रेस कॉन्फ्रेन्स करके दिल्ली में बता रहे हैं कि उन पर टीएमसी के कार्यकर्ताओँ ने हमला किया। सीआरपीएफ थी इसलिए बचकर आ सके। जरा सोचिए 1947 में महात्मा गांधी की कौन सी सीआरपीएफ रक्षा कर रही थी? आप कैसे नेता हैं जो अपनी रैली में अपने कार्यकर्ताओँ के बीच भी सुरक्षित नहीं रह पाए? टीएमसी के लोग अगर हमला कर रहे थे तो आप क्या कर रहे थे? आपने शांति के लिए किया क्या? अगर शांति स्थापित करने में जुटी सीआरपीएफ का ही साथ देने लग जाते, अपने कार्यकर्ताओँ को प्रतिक्रिया देने से रोक लेते, आगजनी और पत्थरबाजी को एकतरफा रोक देते तो आपका कद भी बड़ा होता और सीआरपीएफ भी आपकी रक्षा की बजाए शांति के दायित्व के प्रति अधिक प्रतिबद्ध होती।
हिंसा के लिए दोषी है ध्रुवीकरण की राजनीति
'आक्रमणकारी' टीएमसी के कार्यकर्ता दोषी हैं तो महज एक उपद्रव के लिए, बीजेपी के कार्यकर्ता अगर दोषी हैं तो वे भी एक उपद्रव के ही दोषी हैं। मगर, पूरी हिंसा को प्रायोजित करने का दोष अगर किसी पर जाता है तो वे स्वयं बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह हैं जो चुनौती देकर ललकारते हुए ऐसे उपद्रवों के लिए वातावरण बना चुके थे। पहले पत्थर किसने मारा, पहले मुर्गी आयी या अंडा ऐसे सवाल हिंसा के लिए ज़िम्मेदार लोगों की पहचान नहीं कर सकते। हिंसा के लिए ममता बनर्जी भी उतनी ही ज़िम्मेदार हैं जितने अमित शाह। ध्रुवीकरण की राजनीति को दोनों ने चुनाव की आंच में अपने वोटों को पकाने का अवसर बनाया। शुरुआत हिन्दू-मुसलमान से हुई और ताजा वारदात के बाद यह बांग्ला और गैर बांग्ला में तब्दील हो गयी लगती है। ध्रुवीकरण की राजनीति में ममता ने अमित शाह को मात दे दी है। इसका सबूत यही है कि अमित शाह को प्रेस कॉन्फ्रेन्स करने के लिए भी दिल्ली आना पड़ा। उन्हें बंगाल छोड़ देना पड़ा।
बंगाल की हिंसा ममता और अमित शाह दोनों की राजनीति का आईना है। अमित शाह की रैली में हुए उपद्रव हिंसा की पूरी व्यूह रचना का हिस्सा मात्र है। ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति का टूटना हिन्दुस्तान की लोकतांत्रिक बनावट का टूटना है। कॉलेज के भीतर घुसा कौन, मूर्ति को तोड़ा कौन, कौन किसे फंसा रहा है- ये सारे सवाल उन चंद चेहरों को खोजने में कामयाब हो सकते हैं जिन्हें मूर्तिभंजक अपराधी घोषित कर दिया जाएगा। मगर, इस मूर्ति के टूटने का असली जिम्मेदार यही दोनों नेता हैं- अमित शाह और ममता बनर्जी। मूर्ति के टूटने की ज़िम्मेदार वही राजनीति है जिसे हिंसा प्रिय है, उपद्रव जिसके श्रृंगार हैं और नफ़रत जिसका सौन्दर्य है।












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