Opposition in Loksabha: अविश्वास प्रस्ताव बना नैरेटिव की लड़ाई का हथियार

ऐसा लगता है कि जुलाई का महीना भारत में अविश्वास प्रस्ताव का महीना है। 2008, 2018 और अब 2023 में मानसून सत्र के जुलाई महीने में ही विपक्ष द्वारा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है। आम तौर पर अविश्वास प्रस्ताव का मकसद सरकार को सांसत में डालना और अगर सरकार न भी गिर पाए तो उसके खिलाफ लोक में अविश्वास का माहौल बनाना होता है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर कांग्रेस की अगुआई में विपक्ष सचमुच ऐसा कर पाएगा? सवाल यह भी है कि जब सरकार की सेहत पर इस अविश्वास प्रस्ताव का कोई असर ही नहीं पड़ेगा तो क्या इसके जरिए विपक्ष मोदी सरकार के प्रति अविश्वासपूर्ण माहौल बनाने में कामयाब हो पाएगा? या फिर कहीं एक बार फिर नरेंद्र मोदी इस मौके को अपने पक्ष में भुनाने में सफल हो जाएंगे?

No confidence motion

साल 2018 में कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी थे। उन दिनों राफेल विमानों के सौदे में उन्होंने घोटाले का आरोप लगाया था। उस दौरान वे प्रधानमंत्री के बारे में खुलेआम 'चौकीदार चोर है' का नारा लगाने लगे थे। उनकी पूरी कोशिश मोदी सरकार को भ्रष्टाचारी साबित करने की थी। इसी सोच के साथ विपक्षी खेमे की ओर से उनकी अगुआई में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। लोकसभा में बीस जुलाई 2018 को पूरे ग्यारह घंटे बहस चली। इसके बाद मतदान हुआ था और सरकार 126 मतों के मुकाबले 325 वोट पाकर जीत गई थी।

तब प्रधानमंत्री मोदी ने एक बात कही थी, जो इस बार सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। 2018 के अविश्वास प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि विपक्ष एक बार फिर 2023 में उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आएगा। उनकी बात सच साबित हुई है। बहरहाल मोदी के इस कथन से यह साबित होता है कि उन्हें अगले साल यानी 2019 के आम चुनावों में फिर जीत हासिल करके संसद लौटने का भरोसा था। उनका यह भरोसा कायब भी रहा।

माना जाता है कि राफेल घोटाले के नाम पर प्रस्तुत अविश्वास प्रस्ताव पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने संसद को मंच के तौर पर इस्तेमाल किया। नतीजा अगले साल के आम चुनावों में दिखा, जब उन्हें 2014 की बनिस्बत ज्यादा यानी भाजपा को अकेले 303 लोकसभा सीटों पर कामयाबी मिली। जबकि आम चुनावों से पहले हुए कुछ उपचुनावों में भाजपा की सीटें कांग्रेस ने छीन ली थी। आम चुनावों में कांग्रेस वह कामयाबी हासिल नहीं कर पाई।

प्रधानमंत्री मोदी को लोगों को संबोधित करने और उन तक अपनी बात पहुंचाने में महारत हासिल है। अविश्वास प्रस्ताव की वजह से चूंकि सरकार का अस्तित्व दांव पर होता है। लिहाजा उसकी बहस और विशेषकर वोटिंग के नतीजों पर समूचे देश की निगाह होती है। कम से कम देश के तकरीबन समूचे सजग मतदाताओं की निगाह उस वक्त संसद पर टिकी होती है। वोटिंग के ठीक पहले प्रधानमंत्री विश्वास या अविश्वास प्रस्ताव पर होने वाली चर्चा का जवाब देते हैं, इसलिए उस वक्त देशभर की निगाहें प्रधानमंत्री पर भी रहती हैं।

याद कीजिए, 2018 के अविश्वास प्रस्ताव को। तब राफेल घोटाले की वजह से माहौल उत्तेजक और तनावपूर्ण था। जाहिर है कि तब समूचे देश की निगाह उस अविश्वास प्रस्ताव पर थी। अविश्वास प्रस्ताव सरकारों के लिए तनाव का जरिया होता है। लेकिन मोदी ने इसे मौके के रूप में लपक लिया। अपनी बात कहने के लिए उन्हें जहां सैकड़ों रैलियों की जरूरत पड़ती, उन्होंने संसद के मंच से अपनी बात कह डाली। इसका असर अगले साल के चुनावों में साफ तौर पर दिखा।

इस संदर्भ में 22 जुलाई 2008 का वाकया याद आता है। उस वक्त अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के चलते वामपंथी दलों ने मनमोहन सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। समर्थन वापसी से उपजे हालात में मनमोहन सरकार के खिलाफ तब के विपक्ष ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा की शुरूआत नेता प्रतिपक्ष करता है। उस वक्त नेता प्रतिपक्ष भाजपा के शीर्ष पुरूष लालकृष्ण आडवाणी थे। आडवाणी ने अपनी चर्चा की शुरूआत अंग्रेजी में की। तब समाजवादी पार्टी के सहयोग से सरकार बच गई थी।

बहरहाल अंग्रेजी में आडवाणी के बहस शुरू करने पर मुंबई के एक वरिष्ठ पत्रकार ने सवाल पूछा था कि कौन था आडवाणी का सलाहकार, जिसने उन्हें अंग्रेजी में बहस शुरू करने की सलाह दी। पत्रकार का तर्क था कि अविश्वास प्रस्ताव आडवाणी के लिए बढ़िया मौका था। वे चाहते तो इस मौके का इस्तेमाल समूचे देश तक अपनी बात पहुंचाने के लिए कर सकते थे। लेकिन अंग्रेजी में बोलकर उन्होंने यह मौका खो दिया। कुछ इसी अंदाज में अब पूछा जा सकता है कि राहुल गांधी समेत विपक्ष के नेताओं का सलाहकार कौन है, जिसने उन्हें ऐन चुनावों के पहले अविश्वास प्रस्ताव लाने का सुझाव दिया।

राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि इस मौके का इस्तेमाल मोदी समूचे देश तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सफाई से कर लेंगे। जो कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष के लिए उल्टा पड़ सकता है। वैसे पांच साल पहले और अब के अविश्वास प्रस्ताव के बीच एक अंतर है। अंतर यह कि तब तेलुगूदेशम पार्टी भाजपा के विरोध में थी, इस बार वह साथ में है। इस बार भी पिछली बार की तरह हो सकता है कि बीजू जनता दल चर्चा के बाद वोटिंग के मौके पर सदन की कार्यवाही से बाहर निकल जाए। वह सरकार विरोधी मोर्चे में दिखना नहीं चाहेगा।

इस बार के अविश्वास प्रस्ताव का नुकसान विपक्ष को ही ज्यादा उठाना पड़ सकता है। दरअसल विपक्ष चाहता था कि मणिपुर पर चर्चा हो। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान वह मणिपुर में महिलाओं के साथ हुई बदसलूकी का मामला जरूर उठाएगा। मणिपुर की अशांति को भी वह सामने लाने की कोशिश करेगा। वहीं एनडीए के दल पश्चिम बंगाल और राजस्थान में जारी महिला विरोधी माहौल को भी सामने लाने की कोशिश करेंगे। इसी तरह छत्तीसगढ़ और दूसरे विपक्ष शासित राज्यों को भी फोकस में लाने का प्रयास होगा।

साफ है कि अविश्वास प्रस्ताव के जरिए जिस नैरेटिव के जरिए विपक्ष मोदी विरोधी माहौल बनाने की कोशिश करेगा, उसी हथियार से मोदी सरकार और उसके साथी दल विपक्ष शासित राज्य सरकारों की कलई खोलेंगे। ऐसे में नहीं लगता कि सरकार को नैरेटिव के स्तर पर भी कोई बड़ा नुकसान होने जा रहा है। वैसे इस चर्चा में अशांत क्षेत्र सुरक्षा कानून यानी आफ्सा का भी सवाल उठेगा। तब यह भी कहा जा सकता है कि मणिपुर के हालात के लिए इस कानून का वहां से हटाया जाना भी है। तब हो सकता है कि यह मांग जोर पकड़े कि मणिपुर में शांति बहाली के लिए एक बार फिर इस कानून को लागू किया जाए।

मौजूदा दौर विचारों की लड़ाई का है। कांग्रेस की अगुआई वाला विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव से वैचारिक जंग में मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करेगा तो मोदी की अगुआई में सत्ता पक्ष इस विपक्षी हथियार को नाकाम करने की तैयारी में जुटेगा। इस खेल में सरकार की तात्कालिक सेहत पर कोई असर तो नहीं पड़ने जा रहा, बस देखना यह है कि नैरेटिव की जंग में कौन सा पक्ष भारी पड़ता है और कौन कमजोर। अगले कुछ महीनों में होने वाले चार विधानसभा चुनावों और आगामी आम चुनाव पर कमोबेश इसी वैचारिक जंग का असर पड़ना तय है।

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